Home उत्तराखंड देहरादून किटी न सिर्फ अवैध है,बल्कि सिर्फ ठगी है

किटी न सिर्फ अवैध है,बल्कि सिर्फ ठगी है

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बेवकूफी-लालच में हजारों के डूबे करोड़ों

दनादन भाग रहे खिलाने वाले

अभी भी होश में नहीं आ रहे लोग,खेले जा रहे

Chetan Gurung

किटी का अवैध धंधा सालों से चला आ रहा। इसके बावजूद पुलिस और बैंकिंग सेक्टर से जुड़े लोगों ने इस ओर से हमेशा आँखें मूँदी। लोग, जिनमें 90 फीसदी महिलाएं हैं, इस ठगी के खेल में एक के बाद एक मेम्बरशिप कार्ड खुद भी खरीदे फिर दूसरों को भी खरीदवाए। खुद तो डूबे, दूसरों को भी डुबो डाला। अब जब मंदी की मार पड़ने लगी तो किटी वालों के हाथ-पाँव सबसे पहले फूले। मोटा अनुमान है कि राजधानी में हजारों लोगों के करोड़ों रुपए डूब चुके हैं।  

मंदी के कारण लोगों के पास पैसे आसानी से नहीं आ रहे। इससे वे नए कार्ड्स नहीं खरीद रहे हैं। न ही वे आसानी से महीने की किश्त जमा कर पा रहे हैं। इससे किटी खिलाने वाले माफिया पर उल्टा दबाव पड़ रहा। लोगों को पैसे की जरूरत मंदी के दौर में ज्यादा पड़ रही। लोगों को पैसे मिलने में महीनों से दिक्कत हो रही वे परेशान हो कर माफिया के चक्कर लगा रहे हैं। इससे किटी बाजार में वैसी ही अफरा-तफरी मच गई। जैसी शेयर बाजार में। घबराहट का आलम मेंबर्स में छाया हुआ है।

पैसे की आवक कम और भुगतान बढ़ने से किटी माफिया पूरी तरह धोखा धड़ी, धमकियों और बेशर्मी पर उतर आए हैं। कई जेल जा चुके हैं। कई भाग गए हैं। कई जेल जाने की कगार पर हैं। जो अभी भी खिला रहे हैं, उनका मकसद अधिक से अधिक कैश इकट्ठा करना दिख रहा। ऐसा इसलिए लग रहा कि वे भुगतान तो कर नहीं रहे। सिर्फ किश्तें लिए जा रहे हैं। दफ्तरों-घरों से वे अब गायब रहते हैं। दोनों जगह CCTV लगा के उनको नेट से कनेक्ट किया हुआ है। इससे उनको पूरी खबर रहती है। कौन आ रहा है, कौन बैठा हुआ है। जब कोई नहीं होता, तब वे वहाँ जा रहे।

किटी माफिया बेहद शातिर और संगठित ढंग से ठगी कर रहे। ज़्यादातर के पास खुद के नाम अचल संपत्ति है ही नहीं। संपत्तियाँ बेनामी बताई जाती हैं। मेम्बर्स को धमका रही हैं। ज्यादा बोलोगी और चिल्लाओगे तो एक पैसा नहीं देंगे। जेल चले जाएंगे। फिर जमानत पर बाहर आ जाएंगे। क्या कर लोगी? GMS रोड से फरार किटी माफिया सिमरन ने तो पहले ही कार-स्कूटर तक बेच दिया था। वह करोड़ों समेत कब फरार हुई, भनक भी देर से लोगों को लगी। 

कई एजेंट्स भी बहुत शातिर हैं। उन्होंने मेम्बर्स से पैसे लिए। किटी माफिया को दिए ही नहीं। खुद ही खा गईं। वे ही मुनाफे में रहे। किटी माफिया के भागने से सबसे ज्यादा फाइदा ऐसे एजेंट्स को हो रहा। वे मेंबर्स को बोल रहीं कि क्या करें, पैसे ले के भाग गई, खिलाने वाली। मैं कहाँ से दूँ। किटी के दौर से पहले देहरादून में गोल्डन फॉरेस्ट, कुबेर फ़ाइनेंस और KP गोल्डन फाइनेंस ने भी लोगों को इसी तरह लूटा-ठगा था। इनमें से सभी कंपनियाँ पैसे लूट के भाग गईं। या डूब गईं।

जो लोग किटी में पैसा फंसा रहे, उनको समझ नहीं आ रहा कि आखिर किटी खिलाने वाले एजेंट्स को कमीशन, मेंबर्स को महंगे गिफ्ट्स कहाँ से और कैसे दे पा रहे? जिनको वित्तीय मामलों की तमीज नहीं। केबल टीवी-बूटिक चलाते हैं। वे कैसे और किस गणित से ऐसा वित्तीय समीकरण ला रहे? लोग बिना सोचे-समझे पैसे कई-कई कार्ड्स खरीद के डालते रहे। अब परेशान हो रहे। इसमें प्रशासन और पुलिस की भी कमी-लापरवाही कहीं से नहीं छुपती है।

इन दिनों लगातार किटी माफिया के भागने और भूमिगत होने की खबरें ज्यादा आने लगी है। इसके बावजूद देहरादून में आज की तारीख में भी दर्जनों किटियाँ खेली जा रही। लोगों को फंसाया जा रहा है। धमकाया जा रहा-नई किटी नहीं खेलोगी तो पुरानी का पैसा भूल ही जाओ फिर तो। साथ ही कैश देने की बात करने वाली किटी माफिया नकली किस्म के सोने के जेवरात (इसमें भी 750 रुपए/ग्राम बनवाई के काटे जा रहे) देने की बात कर रहे। या फिर अगले साल के चेक्स दे रहे। घरेलू सामान भी दिए जा रहे। भागते भूत की लंगोटी सोच के महिलाएं, रोते-धोते ये भी लेने को तैयार हैं। मिल ये भी नहीं रहीं। ये इसलिए भी गलत है कि उनको नगद के बदले नगद का ही वादा किया गया था।

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