शराब में घोटालों के उस्तादों का कुछ नहीं बिगड़ा है, विजिलेन्स जांच क्यों नहीं?  

नौकरी देने की पॉलिसी, फिर प्रो. अरविंद की नौकरी कैसे खा दी?

सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों के निदेशकों की जांच क्यों न हो?

चेतन गुरुंग

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरपरस्ती में बीजेपी सरकार ने ढाई साल पूरे किए। सरकार (पार्ट-1) ने इस दौरान कुछ भी काबिलेगौर नहीं किया हो, ऐसा नहीं। कई उपलब्धियां सरकार ने अर्जित की। इसकी आज पूरे दिन धूम रही। मुख्यमंत्री-सरकार की तारीफ़ों में अनेक लोगों ने जमीन-आसमान एक कर दिया। अच्छा है। कई अच्छे काम हुए हैं भी। उसका श्रेय सरकार के मुखिया को बेशक मिलना चाहिए। फिर भी कई मामलों में इन ढाई सालों में सरकार दोराहे पर या फिर ढुल-मुल दिखी। ऐसा लगा कि वह या तो अंजान है, या फिर किसी के दबाव में है। ये कैसे कह दिया जाए कि तमाम कामयाबियों का हिमालय खड़ा करने वाली सरकार तंत्र बेहतर ढंग से चलाना नहीं जानती है।

सफलताओं की भीड़ के दावों के बावजूद कुछ सवाल उठाना त्रिवेन्द्र और सरकार के साथ ही बीजेपी के हक में भी रहेगा। इससे तीनों ही अधिक खुश फहमी में रहने की गलती नहीं करेंगे। जो उनको ही फायदा देगा। उनके सलाहकार ये शायद कभी न बताएं। या फिर उनकी नजरों में कभी न आए। मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका है। कोई शक नहीं कि उन्होंने NH-74 घोटाले में कई नौकरशाहों के साथ ही अन्य लोगों को जेल भेज कर अपनी सख्ती का प्रदर्शन किया।

इसके बावजूद इस पहलू को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि हर मामले में टांग डालने वाले सियासी लोगों ने इतने बड़े घोटाले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई! कुछ सियासी लोगों के नाम इस घोटाले में आए भी। उनके खिलाफ एसआईटी जांच एक मिमी आगे नहीं बढ़ी। मानो सारा खेल अफसरों ने किया। अफसर भी एक-एक कर के जेल से बाहर आ गए। आईएएस अफसरों डॉ. पंकज पांडे और चंद्रेश यादव के खिलाफ भी सरकार का पक्ष वक्त गुजरने के साथ कमजोर पड़ गया। ऐसा लगा मानो सरकार ने अपनी वाहवाही के लिए नौकरशाहों की बलि चढ़ाई।

छोटे-मोटे मामलों में बाबू और पटवारी कुछ हजार घूस लेते पकड़े गए। जेल गए। इसका जवाब कौन देगा कि लगातार दो सालों से शराब महकमे में कई अरब का घोटाला हो चुका है। शराब पॉलिसी सिंडीकेट के फायदे को देख कर बनाई गई। सारे अहम जिलों में दागी डीईओ तैनात हैं। उनके खाते में लगातार करोड़ों के घोटाले हैं। फिर भी उनको पूजा जा रहा। ऐसा भी नहीं है कि सरकार की जानकारी में नहीं है। ये मामले। फिर भी क्या मजबूरी है सरकार के सामने? उन पर कार्रवाई न करने की। क्यों नहीं घोटालों पर विजिलेन्स जांच बिठाई जा रही?

देहरादून के डीईओ मनोज उपाध्याय के खिलाफ तो जिलाधिकारी सी रविशंकर तक ने नोटिस दिया है। महकमे की जांच रिपोर्ट तक बहुत कड़क है। कार्रवाई तो दूर, रिपोर्ट का ही अता-पता नहीं लग रहा। अल्मोड़ा के डीईओ दुर्गेश्वर त्रिपाठी पिछले साल नैनीताल में तैनात थे। वहाँ छह करोड़ का घाटा सरकारी खजाने को लगा के दूसरे जिले में डीईओ बन गए। क्या दागी और इतने बड़े घोटाले वालों को जीरो टालरेंस सरकार में ऐसी आजादी और परितोषिक दिए जाने चाहिए?

क्या मुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं है कि उत्तराखंड के ज़्यादातर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों के निदेशक किस कदर फर्जी हैं। किसी की डिग्री में जान नहीं। किसी की नौकरी गलत तथ्यों के आधार पर या फिर तथ्य छिपा कर लगी। कोई प्रतिनियुक्ति गलत ढंग से ले के निदेशक बने हैं। क्या ये भ्रष्टाचार नहीं? जो सीधे युवाओं के भविष्य के साथ के साथ खेल रहे हैं। इसमें शक नहीं कि त्रिवेन्द्र की कोशिश ईमानदारी के साथ लोगों और युवाओं को रोजगार देने की हो सकती है। डेढ़ लाख के करीब के औद्योगिक निवेश के करार उनकी कोशिश का अच्छा नतीजा है।

फिर भी, उनके पास इसका जवाब होना चाहिए कि आखिर THDC-IHET टिहरी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अरविंद कुमार सिंह की नौकरी कैसे फर्जी बोर्ड ऑफ गवर्नर ने खा दी। वह भी हाई कोर्ट के आदेश की तौहीन कर के। जिस निदेशक की कुर्सी पर ही सवाल, वह और कुलपति मिल के अगर किसी की स्थाई  नौकरी फर्जीवाड़े से खा जाते हैं, तो ये सरकार के खिलाफ सीधी-खुली बगावत है। मुख्यमंत्री को दुस्साहसिक चुनौती है। अटल आयुष्मान योजना की सोच के लिए त्रिवेन्द्र को बधाई दी जा सकती है। शाबास कहा जा सकता है।

ये भी तो सुनिश्चित हो कि अस्पतालों में चिकित्सक उपलब्ध भी हों। दून मेडिकल कॉलेज में कई मौकों पर एक जूनियर डॉक्टर ही मिल पाता है। मुफ्त योजना का फायदा इसके कारण निजी अस्पताल-मेडिकल कॉलेज उठा रहे हैं। कार्ड भी तभी बनेंगे, जब राशन कार्ड होगा। जिन लोगों ने राशन कार्ड गरीबों के लिए छोड़ दिए, वे आयुष्मान कार्ड से वंचित हैं। इस पर सरकार को सोचना होगा। त्रिवेन्द्र की पीठ पहाड़ी-दुर्गम राज्य होने के कारण सस्ती विमान-हेली सेवाएँ शुरू कराने के लिए जरूर ठोंकी जानी चाहिए। ये बहुत बड़ी उपलब्धि है सरकार की।

कुछ विसंगतियों और खामियों पर भी सरकार को ध्यान देना होगा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टिहरी झील में सी-प्लेन सेवा शुरू करने की सोच है। इसका फायदा तभी जब वहाँ ढंग के शौचालय और रेस्तरां और पार्क तो विकसित हों। पिथौरागढ़ में ट्यूलिप गार्डन को विकसित करने की सोच और सारी मेहनत युवा आईएफ़एस विनय भार्गव, जो वहाँ डीएफ़ओ है, की थी। जब उनकी मेहनत रंग लाने लगी, उसको आईएएस अफसरों ने हथिया लिया। ये एक युवा-उत्साही अफसर को हतोत्साहित करना हुआ। क्यों नहीं उसी आईएफ़एस को ये परियोजना खत्म होने तक के लिए सौंप दी जाए?

सरकार को नौकरशाह ही चलाते हैं। यही सच है। मुख्य सचिव (मधुकर गुप्ता, एम रामचंद्रन, सुभाष कुमार, आलोक कुमार जैन, राकेश शर्मा) जब भी दमदार रहे, सरकारी कामकाज की रफ्तार बुलेट ट्रेन वाली रही। त्रिवेन्द्र को ये जरूर देखना-सोचना होगा कि क्या उन्होंने वाकई दमदार-काबिल-कार्य कुशल और साफ छवि वाले नौकरशाहों को ही आगे बढ़ाया है? जिस नौकरशाह पर कलेक्टर रहने के दौरान करोड़ों का जमीन घोटाला करने का संगीन आरोप हो। जिसके खिलाफ खुद मुख्य सचिव ने एक वेतन वृद्धि रोकने और एसीआर में प्रतिकूल प्रविष्टि के आदेश दिए हों, उसको पीएम मोदी की विशेष दिलचस्पी वाले महकमे कैसे सौंपे जा सकते हैं? देखते हैं, त्रिवेन्द्र सरकार, पार्ट-2 की शुरुआत इस गलती को दुरुस्त कर के होता है या इसी ट्रैक पर सरकार आगे चलती है। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here