मनोज उपाध्याय पर सरकार की नजरें इनायतों से उठ रही अंगुली

बिना गाड़ी मसूरी,चकराता,ऋषिकेश,देहरादून की ज़िम्मेदारी वाला ही निशाने पर!

चेतन गुरुंग

पथरिया पीर जहरीली शराब कांड में हुई मौतों पर प्रवर्तन इंस्पेक्टर मनोहर पतियाल सस्पेंड कर दिए गए पर जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय को अभी तक क्यों बख्शा हुआ है? खास तौर पर ये देखते हुए कि मनोहर के पास महज पाँच आदमियों का स्टाफ था। उपाध्याय के पास 10 इंस्पेक्टर समेत 62 के करीब लोगों का लंबा-चौड़ा स्टाफ है। महकमे में सरकार के इस कदम को ले कर अंगुली-असंतोष के बादल उठने लगे हैं।

बात और तर्क वाजिब लगते हैं। मनोहर के निलंबन को अगर जायज ठहराया जा सकता है तो फिर मनोज को बचना सरकार की तरफ से जान बूझ के किया गया गुनाह। डीईओ के तौर पर मनोज को तमाम इंस्पेक्टर मिले हुए हैं। सरकार से गाड़ी मिली हुई है। लगातार दो सालों से देहरादून और वह करोड़ों के घपलों-घोटालों को ले कर सुर्खियों में है। हाई कोर्ट से स्टे ले के पिछले साल बहाल हुए। फिर देहरादून की कुर्सी भी कोर्ट से ली। फिर रिटायरमेंट से पहले एसीएस (आबकारी) डॉ. रणवीर सिंह से बिना किसी जांच के क्लीन चिट भी ले ली।

मनोज इस साल भी विभागीय जांच में दोषी पाए जा चुके हैं। फिर से करोड़ों के घोटालों के आरोपों में फँस गए हैं। इसके बाद अब शराब मौत कांड के बावजूद मनोज पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई किस पर हुई? महज पाँच सिपाहियों के साथ चकराता, मसूरी, ऋषिकेश, पूरा देहरादून शहर को देखने की ज़िम्मेदारी उठा रहे प्रवर्तन इंस्पेक्टर मनोहर को। इस फैसले पर महकमे के एक सहायक आयुक्त ने कहा कि सरकार ऐसा कर के अपनी जीरो टालरेंस नीति पर प्रहार करने का मौका तो दे ही रही, साथ ही खास लॉबी के असर में काम करने वालों को हतोत्साहित और नाराज कर रही है।

मनोहर ने चालू वित्तीय वर्ष में 52 मुकदमे किए हैं। जो पिछले साल से दुगुना औसत है। जिस सर्किल इंस्पेक्टर शुजात हुसैन को सस्पेंड किया गया है, उससे भी दुगुने मुकदमे कर मनोहर पहले ही लोगों की नजरों में खटक रहे थे। इनमें महकमे के अफसर और शराब माफिया दोनों शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक मनोहर को सिर्फ डीईओ की तरफ से ध्यान हटाने के लिए बलि चढ़ाया गया। डीईओ जिले का प्रभारी है। तमाम दाग लगे हुए हैं। फिर भी शराब मौत कांड में अभी तक की सरकार की कार्रवाई उनको बचाने वाली ही दिख रही है।

महकमे के लोगों का कहना है कि नैतिक आधार पर अगर मनोहर को सस्पेंड किया गया है तो फिर डीईओ कैसे बच सकता है? बड़ी घटना होने पर मंत्री, डीएम, एसएसपी के खिलाफ कार्रवाई सरकारें करती रही हैं। फिर शराब से मौत मामले में जिला आबकारी अधिकारी कैसे बच सकता है। तमाम संसाधन और सुविधाओं के बावजूद। कहानी ये है कि सरकार में रसूख रहने वालों का बाल भी बांका नहीं हो रहा है। इसकी कई मिसालें सामने आ चुकी हैं। प्रमुख सचिव (आबकारी) आनंदबर्धन की प्रतिष्ठा बहुत अच्छी है, लेकिन उन पर लगता है डीईओ पर कार्रवाई में जल्दबाज़ी न करने का दबाव है। उनके नवीनतम बयानों से ऐसा एहसास हो रहा है।

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