VC की अध्यक्षता वाली कमेटी को करना है अंतिम फैसला

को-ऑर्डिनेटर विद्यार्थी ने कहा-SCIE-SCOPUS की गुणवत्ता SCI से नीचे

PHD स्टूडेंट्स देहरादून पहुँच के करेंगे संघर्ष

Chetan Gurung

रिसर्च डिग्री कमेटी (RDC) के कॉमेंट्स UTU के पीएचडी शोधार्थियों को अभी तक नहीं मिले हैं। 15 दिन की तय अवधि भी गुजर गई है लेकिन को-ऑर्डिनेटर अंबरीष विद्यार्थी नहीं बता पा रहे हैं कि कॉमेंट्स कब तक मिलेंगे। उनका जवाब सिर्फ इतना है कि इसी महीने ये दे दिए जाएंगे। कुलपति नरेंद्र चौधरी RDC के प्रमुख हैं, और वही इस बारे में अंतिम रूप से इस बाबत कुछ बता सकते हैं। पीएचडी शोधार्थी यूटीयू की हीला-हवालियों से नाखुश हैं। वे देश के अनेक हिस्सों से अब देहरादून पहुँचने वाले हैं। राज्यपाल तथा शासन से इस बारे में मिल के अपनी गुहार करने वाले हैं।

यूटीयू लगातार अपने फैसलों और अंदरूनी लड़ाइयों से कुख्यात हो चुका है। सही माने में ये तकनीकी शिक्षा से जुड़ा विवि सरकार के लिए भारी सिर दर्द साबित हो रहा है। कभी बाल मजदूरों से उत्तर पुस्तिका से जुड़े काम लेने, कभी सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों के निदेशकों की विवादित नियुक्तियों और कई तरह के आरोपों से विवि प्रशासन हाल के सालों में बुरी तरह घिरा हुआ है।

आलम ये है कि रजिस्ट्रार अनीता रावत और कुलपति नरेंद्र चौधरी में घमासान चल रहा है। कुलपति ने रजिस्ट्रार की तनख्वाह रोकी हुई है। इसकी शिकायत रजिस्ट्रार और कुलपति ने शासन से की हुई है। कुलपति ने तनख्वाह रोकने की अपनी वजह बताई है, जबकि रजिस्ट्रार ही नहीं किसी की भी तनख्वाह सामान्य परिस्थितियों में नहीं रोकी जा सकती है। इस बीच पीएचडी से जुड़े कुलपति के नए फरमानों से शोधार्थियों में खलबली मचा डाली है। वे ऐसी सभी शोधार्थियों के लिए सिर्फ SCI में ही दो शोध पत्र प्रकाशित करने की शर्त और वाइवा के डेढ़ साल बाद तक भी डिग्री अवार्ड न होने से भड़के हुए हैं।

उनका तर्क है कि उनको वक्त पर डिग्री अवार्ड हो जाती तो इस बाध्यता के दायरे में वे नहीं आते। विवि प्रशासन की ढिलाई और अकर्मण्यता का दंड वे क्यों भुगतें? वे इस लिए भी नाराज हैं कि अभी तक उनको RDC कॉमेंट्स भी नहीं मिले हैं। 15 दिन का वक्त विद्यार्थी ने दिया था, जो पूरे हो चुके हैं। इस बाबत विद्यार्थी ने `Newsspace’ से कहा-`कॉमेंट्स के लिए उन्होंने कमेटी बिठा तो दी थी। कुलपति इसके अध्यक्ष हैं। उनको ही अंतिम फैसला करना है। मेरा काम तो सिर्फ चीजें तय करना हैं’। इसी महीने कॉमेंट्स हो जाने चाहिए’।

शोध पत्र सिर्फ SCI में ही प्रकाशित करने की शर्त पर उन्होंने कहा-`सभी विवि के अपने अलग-अलग मानक होते हैं। उसके हिसाब से ही वे फैसले करते हैं। SCOPUS के कुछ जर्नल्स SCI में भी हैं, लेकिन SCI श्रेष्ठ है। SCOPUS कमतर माना जाता है। SCIE में जर्नल्स प्रकाशित करना आसान होता है। पेड प्रकाशन भी होता है इसमें। UGC ने अभी अपने 2015 के फैसले को ही मंजूरी दी है। इसमें SCI ही शामिल है। बाकी जर्नल्स क्या अवैध हैं? इस पर उन्होंने कहा-बस गुणवत्ता के बात है। वैध या अवैध पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

1 COMMENT

  1. दुर्भाग्य है इस तकनीकी विश्वविद्यालय का जिसमें केवल गैरकानूनी कार्य हो रहे हैं। कुछ नौकरशाह व उनकी बीवियां पूरी तरह से तकनीकी शिक्षा को अपने कब्जे में ले चुके हैं तथा सिर्फ अयोग्य व जगह जगह से बर्खास्त लोगों को पूरे विश्वविद्यालय में निदेशक, कोऑर्डिनेटर, असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफ़ेसर इत्यादि पदों पर खुले आम भर्ती कराने पर अडिग हैं। कुलपति जिनकी लड़ाई कुलसचिव से हो रखी है ऐसा लगता है कि माननीय कुलपति जी को सिस्टम का कोई अनुभव नहीं है या किसी दूसरे के कहने पर कार्य कर रहे हैं। कुलसचिव विश्वविद्यालय का कस्टोडियन होने के नाते कुलपति की सहमति व आदेश पर सभी आदेश जारी करने का अधिकारी होता है। पर मैंने देखा है कि माननीय कुलपति अपने कार्यालय में आदेश तैयार करवा कर खुद आदेश पर हस्ताक्षर करते हैं व कॉपी कुलसचिव को सूचनार्थ भेजते हैं। विश्वविद्यालय से निकलने वाले आदेशों की प्रतियां जिनको सूचनार्थ भेजी जाती हैं उनमें प्रोटोकॉल का क्रम भी गलत होता है। कुछ अयोग्य निदेशकों, प्रोफेसरों, डेपुटेशन पर गलत तरीके से आए कुछअतिरिक्त लोगों ने जिनकी योग्यता भी संदिग्ध होती है विश्वविद्यालय को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह सब कुछ तब। होरहा है जब तकनीकी शिक्षा खुद माननीय मुख्यमंत्री जी के जिम्मे है। तकनीकी शिक्षा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इस विश्वविद्यालय में गैर कानूनी कार्य बहुत ही द्रुत गति से स्वयं माननीय कुलपति महोदय के नेतृत्व में चल रहा है।……..सैयां भए कोतवाल अब डर काहे का।

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