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CoA-विनोद राय:CAU चुनाव में रहा UPCA-राजीव शुक्ला का भारी दखल

कल रात सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की खलबली मचाने वाली स्टेटस रिपोर्ट

माहिम वर्मा के BCCI प्रतिनिधित्व को हितों का टकराव करार दिया  

BCCI चुनाव में मामला गरमाने के आसार:Newsspace के पास है पूरी रिपोर्ट

भारी पड़ सकता CAU का यूपी प्रेम

UCA संग विलय भी वैधानिक फेर में उलझने के आसार

Chetan Gurung

देश में क्रिकेट के संचालन के लिए गठित प्रशासकों की समिति (CoA) ने 14 अक्टूबर (कल रात) को सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट सौंप कर क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के सचिव माहिम वर्मा को BCCI उपाध्यक्ष पद के लिए एक किस्म से अयोग्य ठहरा दिया है। इतना ही नहीं, CAU के कामकाज पर भी गंभीर टिप्पणी कर दी है। CoA मुखिया विनोद राय की तरफ से पेश की गई  रिपोर्ट में कहा गया है कि एसोसिएशन के कामकाज का तरीका भी BCCI के मुताबिक नहीं है। ये जिक्र भी किया गया है कि BCCI चुनाव से बाहर कर दिए गए राजीव शुक्ला और UPCA का CAU चुनाव में भारी दखल रहा है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उत्तराखंड से ले के उत्तर प्रदेश तक खलबली मचनी तय है।

ये सब CoA ने अपनी 11वीं स्टेटस रिपोर्ट में शामिल किया है। इसके साथ ही ये भी आशंका उत्पन्न हो गई है कि CAU के चुनाव रद्द भी किए जा सकते हैं। साथ ही BCCI में उपाध्यक्ष पद पर भी पुनर्विचार मुमकिन है। CoA का गठन BCCI के निरर्थक हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद किया है। ऐसे में उसकी रिपोर्ट की अहमियत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इस रिपोर्ट से ये भी साफ हो गया है कि उत्तराखंड क्रिकेट में CAU को BCCI मान्यता मिलने के फौरन बाद से यूपी के लोगों को ही क्यों आगे बढ़ाया जा रहा और क्यों उत्तराखंड के लोगों को दरकिनार किया जा रहा है।

CoA की सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि माहिम को अगर BCCI में ज़िम्मेदारी मिलती है तो ये हितों के टकराव (conflict of interest) का सीधा मामला बनेगा। इसकी वजह ये है कि CAU चुनाव में UPCA और शुक्ला का बहुत भारी दखल रहा है। शुक्ला और UPCA को BCCI चुनाव में वोट डालने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके बाद शुक्ला ने माहिम पर दांव खेला। माहिम और उनके पिता पीसी वर्मा भी कानपुर पृष्ठ भूमि से हैं और शुक्ला के बेहद विश्वासपात्रों में शुमार हैं। शुक्ला खुद CAU में अपने भाई सुधीर के साथ सदस्य हैं, जो खुद में हैरतनाक है। UPCA के निदेशक उत्तराखंड क्रिकेट को भी अपने हिसाब से चला रहे हैं। ये अब साबित-स्थापित होता जा रहा है।

टीमों के चयन और चयनकर्ताओं के चयन का मामला हो या फिर CEO अमृत माथुर, टीम मैनेजर्स, समन्वयकों, फिजियो, ट्रेनर्स की नियुक्ति का, अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला और उनके पहले के अध्यक्ष हीरा सिंह बिष्ट को कुछ नहीं पता। सारे फैसले कौन ले रहा है? ये पूछने पर बिष्ट यूपी के लोगों तथा शुक्ला का और गुनसोला BCCI का नाम लेते हैं। CoA की रिपोर्ट ने इन सभी आरोपों को सच और मजबूती से स्थापित कर दिया है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि CoA के पास CAU से मुताल्लिक कई शिकायतें आई हैं। ये शिकायतें CAU चुनाव के साथ ही काम करने के तौर तरीके को ले कर हैं। इन शिकायतों के बारे में उपयुक्त फोरम ही फैसला कर सकता है।

`Newsspace’ के पास वह पूरी रिपोर्ट उपलब्ध है, जो CoA ने कल रात सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है। अब ये भी मामला उछल रहा है कि CAU ने बैलेंस शीट में सिर्फ एक ऑल इंडिया क्रिकेट टूर्नामेंट का ही जिक्र क्यों किया? और क्या क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तरांचल और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के बैलेंस शीट को एक ही माना जाएगा? सबा करीम की रिपोर्ट को क्यों स्वीकार नहीं किया गया, जिसमें UCA के कामकाज की शैली को बेहतर करार दिया गया था? करीम को भी CoA ने ही उत्तराखंड भेजा था। CAU के काम करने के तरीके और UPCA-शुक्ला की बे-इंतहां दखलअंदाजी कहीं उत्तराखंड क्रिकेट और यहाँ के क्रिकेटर्स के सपनों पर भारी न पड़ जाए।

CoA की रिपोर्ट से उन लोगों को ताकत और अधिक जोश मिला है, जो CAU से न सिर्फ खफा हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट जाने की ताक में हैं। सरकार के लिए भी उत्तराखंड क्रिकेट में दिलचस्पी लेना इसलिए जरूरी हो सकता है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की एसोसिएशन (UCA) ने क्रिकेट हित में CAU को समर्थन दे कर उसमें विलय का फैसला किया था। इस फैसले पर पर ही शक पैदा हो गया है। रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी के एक अफसर का कहना है कि जब तक उनको विधिवत चिट्ठी और फाइल नहीं मिलती, विलय को वैधानिक दर्जा मिल ही नहीं सकता। खुद ही आपस में तय करने और अखबारों में छपने से एक्ट का अनुपालन नहीं होता है। रावत के भतीजे संजय रावत को CAU में उपाध्यक्ष बनाया गया है। इसको ले कर लोग मुख्यमंत्री को भी गाहे-बागाहे सोशल मीडिया में तंज़ कस रहे हैं। साथ ही सरकार ने सदा ही क्रिकेट हित में CAU की आर्थिक मदद की है।

23 अक्टूबर को होने वाले BCCI चुनाव में इन सबको देख कर इस अहसास को महसूस किया जा सकता है कि अभी गंगा-जमुना में बहुत पानी बहना बाकी है। UPCA और शुक्ला के ईशारे पर चलना कहीं घाटे का सौदा उत्तराखंड क्रिकेट के लिए न हो जाए। ताज्जुब है कि खुद UPCA-शुक्ला पर ये आरोप हैं कि वे यूपी की क्रिकेट उनके कारण फल-फूल नहीं पा रही। वहाँ अभी तक सिर्फ 35 जिलों को ही मान्यता UPCA ने दी है। वहाँ, सिर्फ चयन में दलाली के आरोप खूब लगते रहे हैं।

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