जो मामले हाई कोर्ट में, उन पर कैसे फैसला कर सकती?

प्रोफेसर से ले के क्लर्क तक की भर्ती में इतनी जल्दबाज़ी क्यों?

वित्त समिति की बैठक बुला के बिन्दुओं पर अनुमोदन नहीं किया गया

प्रशासनिक नाकामी से बेहाल-टाइटेनिक हो चुका है विवि

बर्खास्त निदेशक को भी विवि में प्रोफेसर बना के लाने का शोर

Chetan Gurung

UTU कार्य परिषद की बैठक में शिक्षकों-कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति पर फैसला होना या फिर उस पर विचार तक भी सरकार और राज भवन के परेशानी पैदा कर सकता है। ये मुद्दा अभी हाई कोर्ट में लंबित है। इसको हरी झंडी मिल जाती है तो ये हाई कोर्ट की अवमानना होगी। UTU के पीएचडी और वित्तीय मामलों समेत कई अन्य मुद्दों को वित्त समिति में रखे और पास किए बगैर कार्य परिषद में पेश किए जाने के प्रस्ताव को ले कर भी विवि प्रशासन-सरकार पर अंगुली उठ रही है।

हाई कोर्ट ने WIT में नियुक्तियों पर पहले ही रोक लगाई है। इसकी पूरी संभावना है कि इसी तरह के मामलों में अदालत का फैसला UTU को ले के भी आ सकता है। जिस शासनादेश को नैनीताल हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया हो, उसके आधार पर विवि प्रशासन कार्य परिषद में इसको पारित कर के भर्तियाँ कराने को आखिर इतना बेकरार क्यों है, इस पर अलग-अलग किस्म के आरोप-शोर हैं। ये नियुक्तियाँ कोई ऐसी-वैसी किस्म की नहीं हैं। इनमें लिपिकों से ले कर प्रोफेसरों तक की भर्ती नियमित कार्मिक के तौर पर होनी है।

सूत्रों का कहना तो ये भी है कि निदेशक पद से हटाए गए एक विवादित शख्स भी प्रोफेसर से ले के एसोसिएट प्रोफेसर पद के दावेदार हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की इच्छा के खिलाफ इस शख्स को पहले कुलपति नरेंद्र चौधरी ने विवि में अहम जिम्मा दे के एक किस्म से मुख्यमंत्री को खुली चुनौती दे डाली थी। त्रिवेन्द्र के बेहद नाराज होने पर उसको हटाने के लिए विवि प्रशासन को मजबूर होना पड़ा था। खास बात ये है कि नियुक्तियों के बाबत काफी आरोप-शक के बादल उमड़ रहे हैं। पीएचडी या फिर अन्य मामलों की जांच जिस समिति ने की थी, उसने रिपोर्ट में किसी को दोषी नहीं ठहराया था। सिर्फ सामान्य किस्म के आरोप लगाए थे।

ऐसे मामलों की जांच पुलिस की एसआईटी से कराने के शासन के फैसले पर भी अंगुली उठाई जा रही है। ये कोई वित्तीय भ्रष्टाचार नहीं है। घपला साबित भी होता है तो ये बौद्धिक अनियमितता में आएगा। पुलिस के दारोगा और जवान इतनी गंभीर विषयवस्तु पर कितनी बारीकी से जांच कर पाएंगे, ये देखने वाली बात होगी। खास बात ये है कि पीएचडी मामलों की जांच में साल 2009 को समयसीमा माना जा रहा है। तब प्रो. दुर्ग सिंह चौहान कुलपति थे। उनके कार्यकाल में यूटीयू ने जो प्रगति की, वह छिपी नहीं है। पीएचडी मामलों में एक तरफ तो एसआईटी जांच की पैरवी सरकार कर रही, दूसरी तरफ पीएचडी की डिग्री गैर जरूरी तौर पर रोके जाने और लंबे समय से डिग्री का इंतजार कर रहे शोधार्थियों को अब नई शर्तों में बांध दिया गया है।

इसके बाद आक्रोशित शोधार्थी देहरादून पहुँच के हंगामा करने और अपनी बात राज्यपाल-मुख्यमंत्री के सामने रखने के लिए देश भर से आने वाले हैं। उनका आरोप है कि कुलपति चौधरी का ये आदेश और फैसला पूरी तरह अव्यवहारिक है। ये सिर्फ शोधार्थियों का उत्पीड़न और उनके भविष्य से खेलना है। पीएचडी मामलों में चौहान के खिलाफ अंदरखाने कार्रवाई की कोशिशें चलने का हल्ला है। चौहान भी बड़े और पुराने संघी हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के करीबी मित्रों में शुमार हैं। उनको इतनी आसानी से शिकार बनाना मुमकिन नहीं होगा। इन सबको देखते हुए पीएचडी मामलों की जांच में दिलचस्प और अहम मोड़ आता है तो हैरानी नहीं होगी। सरकार और राज भवन के लिए ये लज्जा जनक है कि यूटीयू में पिछले एक साल से सकारात्मकता और प्रगति खत्म सी हो गई है। सिर्फ और सिर्फ विवादों में ये डूबा हुआ है। तकनीकी शिक्षा का इससे बहुत नुक्सान हो रहा है।

UTU की दशा देखते हुए ही कुलाधिपति राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने कुलपतियों की बैठक में यूटीयू के चौधरी को खरी-खरी डांट तक लगा डाली थी। यूटीयू आज की तारीख में टाइटेनिक हो चुका है। ऐसा कहा जाना अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालात ये है कि विवि में एक भी नियमित और स्थायी तो छोड़ो प्रतिनियुक्ति पर भी कोई अधिकारी नहीं है। परीक्षा नियंत्रक अतिरिक्त चार्ज में हैं। परीक्षा शाखा का काम अतिरिक्त रूप से देखने वाले माहिम वर्मा भी उपनल से हैं। वह भी लंबे समय से क्रिकेट सियासत में व्यस्त हैं। दफ्तर नहीं आ रहे हैं। रजिस्ट्रार की तनख्वाह कुलपति ने ही रोक दी है। उनकी छुट्टियों और बायोमेट्रिक हाजिरी सरीखी छोटी-मोटी बातों को भी मुद्दा बनाया गया है। रजिस्ट्रार-कुलपति में औपचारिक को छोड़ अन्य किसी भी किस्म की बातचीत एकदम बंद है।

ऐसे में UTU की दुर्दशा सरकार के नाहक दखल ने बढ़ा दी है। UTU के कई मामलों को ले कर नैनीताल हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे अरुण शर्मा ने कहा कि कार्य परिषद की 22 अक्तूबर की बैठक होती है तो ये सीधे-सीधे हाई कोर्ट की तौहीन होगी। सरकार के साथ ही तब राजभवन को भी तब अवमानना का नोटिस झेलना पड़ सकता है। शर्मा के अनुसार एसआईटी बिठाने का अधिकार भी सरकार और मुख्यमंत्री को इस मामले में नहीं है। इसकी फ़ाइल मुख्यमंत्री के बाद राज भवन जरूर जानी चाहिए। वही सक्षम प्राधिकारी हैं। साथ ही जीएस तोमर की अगुवाई वाली अवैध समिति की रिपोर्ट पर एसआईटी बिठाने का सरकार का फैसला कहीं से भी वैध नहीं है।

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