आजीवन सदस्य शुक्ला बंधु,कपूर,रामप्रसाद समेत कई नाम गायब

वोट डालने का अधिकार कैसे और क्यों खत्म?

माहिम सचिव चुने जाने के बाद क्या सह सचिव भी है?

रजिस्ट्रार ऑफिस को दी एक और झूठी सूचना!

Chetan Gurung

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड की पोथी जितनी बाँचो उतनी ही हैरान-दंग कर डालने वाली धांधलियों-अनियमितताओं पर से पर्दा उठता जा रहा है। `Newsspaace’ के पास जो दस्तावेज़ उछल-उछल के सामने आ रहे, वे साबित करते हैं कि एसोसिएशन का प्रबंधन न सिर्फ अनाड़ी किस्म के लोगों के हाथों में है, बल्कि वे नियमों को पूरी तरह ध्वस्त कर धांधलियों को अंजाम देने से किंचित नहीं हिचकिचा रहे। 27-28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में ये सब मुद्दे प्रमुखता से उठने तय हैं। एसोसिएशन के लिए सर्वोच्च अदालत में सफाई पेश करना कोई मज़ाक नहीं होगा।

एसोसिएशन को बीसीसीआई के निर्देश के मुताबिक अपने संविधान में संशोधन 13 अक्तूबर 19 तक करना ही था। इसमें भी वह हीला हवाली कर गया। 11 अक्तूबर को छुट्टी के दिन फर्म,सोसायटीज़ एंड चिट्स के उप निबंधक कार्यालय को खुलवा के ये काम कराया गया। इसके लिए एसोसिएशन से जो आवेदन दफ्तर को दिया गया, उसमें भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ या फिर जालसाजी की गई है। 11 अक्तूबर को माहिम एसोसिएशन के सचिव चुने जा चुके थे। फिर वह सह सचिव पद के साथ दस्तखत कैसे कर सकते थे? आवेदन में माहिम ने खुद को सह सचिव बताया है। जो पूरी तरह गलत तथ्य पेश करने की मिसाल है।

पत्र में ये भी लिखा गया है कि संविधान संशोधन की अंतिम तारीख 23 अक्तूबर है। ये 13 अक्तूबर बताई गई थी। अगर 23 अक्तूबर अंतिम समयसीमा थी तो इस सवाल का जवाब CAU को जरूर देना चाहिए कि छुट्टी के दिन दफ्तर खुलवा के संविधान संशोधन रजिस्टर्ड कराने की क्या बाध्यता थी? सवाल तो रजिस्ट्रार दफ्तर से भी बनता है कि छुट्टी के दिन दफ्तर खोल के विशेष रूप से एक एसोसिएशन को ऐसी सेवा क्यों प्रदान की गई? क्या ऐसा वह पहले भी करती रही है? आगे भी किसी और को ये सुविधा देगी?

चुनाव में जिन लोगों ने वोट दिए, उनकी सूची भी शक और धांधलियों की जद में है। आखिर जो लोग आजीवन सदस्य और संस्थापक सदस्य थे, उनके नाम क्यों सूची से बाहर हुए? कैसे बाहर हुए? `Newsspace’ के पास वोटर्स लिस्ट और पुराने आजीवन सदस्यों की सूची भी है। इस सूची में राजीव शुक्ला, उनके भाई सुधीर शुक्ला, रविनाथ रमन, हरबंस कपूर, रामप्रसाद, कमल सिंह चौहान, राजीव सिंह समेत तमाम नाम गायब हैं। चुनाव अधिकारी पूर्व चुनाव आयुक्त और पूर्व IAS अफसर सुबर्द्धन का कहना है कि उनके पास जो सूची उपलब्ध थी, उन्होंने उससे ही चुनाव कराए। इसका मतलब ये हुआ कि एसोसिएशन ने चुनाव अधिकारी और रजिस्ट्रार कार्यालय को गुमराह किया।

ये भी अहम मुद्दा तो है कि जो माहिम साल 2009 में CAU के विधिवत सदस्य बने, वे कैसे 2002 से ही CAU के अहम दस्तावेजों पर दस्तखत करते रहे? बिना सदस्य बने वह 2008 में संयुक्त सचिव कैसे बन गए? कोर्ट में CAU के खिलाफ याचिका स्वीकार हुई है और ये खुद में बहुत बड़ी बात है। अदालत में हर तरह के मुद्दे और तथ्यों का खुलासा हुना तय है। ऐसे में CAU के लिए इस महीने के आखिर में होने वाली सुनवाई बहुत कठिन और उत्तराखंड क्रिकेट के लिए निर्णायक साबित हो तो हैरानी नहीं होगी।

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