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UTU-VC के खिलाफ पीएचडी शोधार्थियों की आर-पार की जंग

चौधरी के सिर्फ SCI में 2 पेपर्स के प्रकाशन के फैसले से उबाल

PMO-UGC-राज्यपाल के दरवाजे पर दस्तक देंगे

छह साल बाद भी डिग्री नहीं दे पाया है विवि प्रशासन

Chetan Gurung

सदा विवादों में रहने की शौकीन यूटीयू के VC नरेंद्र चौधरी के खिलाफ पीएचडी शोधार्थी अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। वे विवि प्रशासन के उस फैसले के खिलाफ PMO-UGC और राज्यपाल से मिलने का वक्त मांग रहे हैं, जिसमें अचानक ही उनके लिए एससीआई में ही दो जर्नल्स प्रकाशित करने के लिए बाध्यता तय की गई है।

उनका तर्क है कि ये फैसला सिर्फ तुगलकी है। इस फैसले की जद में उन सभी को शामिल कर लिया गया है, जिनको अभी डिग्री नहीं मिली है। कईयों ने वाइवा दो साल पहले दे दिया था। वे डिग्री का इंतजार कर रहे थे। नए फैसले के बाद उनके लिए अब दो जर्नल्स SCI में प्रकाशित करने की मजबूरी नए सिरे से आन पड़ी है। विवि प्रशासन के इस फैसले की आलोचना इसलिए हो रही है कि वाइवा के छह महीने के भीतर एकेडमिक काउंसिल और कार्य परिषद की बैठक बुलाने की बाध्यता है। इसके बाद डिग्री सौंप दी जाती है।

UTU दोनों ही बैठक नहीं बुला पाया। शोधार्थी, जो वाइवा दे चुके थे, इस बैठक और डिग्री का इंतजार कर रहे थे। कुलपति चौधरी ने ऐसा करने के बजाए SCI में दो जर्नल्स का फैसला पिछली तारीख से लागू कर शोधार्थियों के अरमानों पर घड़ों पानी डाल दिया। सभी PHD शोधार्थी अब शासन के साथ ही कुलपति के नकारात्मक रवैये आजिज़ आ चुके हैं। वे PHD समन्वयक अंबरीष विद्यार्थी से भी बात कर चुके हैं। कहीं से भी कोई उम्मीद की किरण नजर न आने के बाद अब वे आक्रामक कदम उठाने जा रहे हैं। 

उन्होंने अपनी भावी योजना तैयार कर ली है। वे राजभवन से वक्त मांग रहे हैं। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से मुलाक़ात कर वे अपना दुखड़ा सुनना चाहते हैं। साथ ही कुलपति चौधरी के फैसलों को भी चुनौती देने के लिए कमर कस चुके हैं। इसके बाद विवि अनुदान आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) भी दस्तक देंगे। उनका कहना है कि जिस तरीके से यूटीयू प्रशासन काम कर रहा है, उसको देखते हुए पीएचडी आठ साल में भी पूरी नहीं होगी। न ही डिग्री मिलेगी।

चौधरी जब से कुलपति बने हैं, तमाम गंभीर और बड़े विवादों के साए में ही रहे हैं। THDC-IHET टिहरी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अरविंद कुमार सिंह की बर्खास्तगी के मामले में उन पर बहुत छींटे पड़े हैं। यूटीयू के इम्तिहान में तमाम गड़बड़ियों के कारण भी उनकी प्रशासनिक काबिलियत पर अंगुली उठी है। PHD शोधार्थियों की डिग्री लटकाए जाने और नए मानकों के लागू होने से आग में पेट्रोल पड़ गया है। खुद कुलाधिपति राज्यपाल बेबी रानी मौर्य भी उनसे संतुष्ट होना तो दूर, उल्टे खफा बताई जाती हैं। वह कुलपतियों की बैठक में सारे आम उनको फटकार लगा चुकी हैं।

बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष उषा नेगी भी उनको सम्मन दे के बुला चुकी हैं। वह नाबालिगों से उत्तर पुस्तिका की कोडिंग-डिकोडिंग जैसे अहम और गोपनीय कार्य कराने को ले कर कुलपति पर बरस पड़ी थीं। फटकार और डांट इतनी ज्यादा मारी गई थी कि चौधरी रूआँसे हो गए थे। उनकी आँखें भर आई थीं। आयोग के सचिव आईएएस अफसर विनोद रतुड़ी को उन्हें सांत्वना देने के लिए आगे आना पड़ा था। PHD शोधार्थियों की मुहिम कुलपति के लिए निश्चित रूप से संकट पैदा करेगा।  

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  1. माननीय कुलपति महोदय ने तो ऐसा लगता है कि कसम खा के आए हैं कि तकनीकी विश्वविद्यालय व यहां से लाभान्वित सभी लोगों को वर्वाद करके ही छोड़ना है। वो आज भी तोमर जैसे अयोग्य लोगों के अहसानों तले दबे हुए लगते हैं तथा सभी अयोग्य निदेशकों की मंडली तोमर की छत्र छाया में पल्लवित एवं प्रफुल्लित हो रही है । इन तोमर ने हाल फिलहाल उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश को एक पत्र लिखवा कर पौड़ी व द्वारहाट तथा तकनीकी विश्वविद्यालय के खिलाफ एक बहुत ही भयंकर मुहिम चला रखी है जिसमें सीधे सीधे माननीय मुख्यमंत्री व प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा ओम प्रकाश जी का ही फंसना तय है। लगभग सभी आरोप इन्हीं लोगों के ऊपर हैं। THDCIHET संस्थान में किसी भी प्रकार का पेमेंट टोमारजो की लाखों में होता है, के मैसेज के बाद ही किया जाता है।शोध के विषय में वे ही लोग निर्णय ले रहे हैं जो या तो जगह जगह से बर्खास्त रहे हैं या नियम कायदे का कोई ज्ञान भी नहीं है। यदि सरकार ऐसे ही सोती रही तो कहीं ऐसा न हो कि लोग कहने लगें कि अब पछताए हो त क्या जब चिड़िया चुग गई खेत……

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