1000 करोड़ से ज्यादा का चूना लगाने वाले और कई मौतों के गुनहगार मौज में

सरकार को बदनाम करने वाले अफसरों पर चाबुक बरसा दीजिये

आरोपियों ने डाले सीएम के खासमखासों पर डोरे

Chetan Gurung  

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उन तीन इंजीनियरों को सबक सिखा दिया, जो थानों-रायपुर रोड पर बने फ्लाई ओवर में गड़बड़ी के आरोपी हैं। तीनों को रिवर्ट किया जा रहा है। सवाल ये है कि उनसे बड़े गुनहगार आबकारी महकमे में हैं। जिनके कांडों ने सरकार को बदनाम कर के रखा है। अरबों का चूना सरकारी खजाने को लगाया। राजधानी में ही कई मौतों के गुनहगार हैं। उम्मीद की किरण दिखने लगी है कि त्रिवेन्द्र अब शायद उनके गुनाहों पर भी फैसला सुनाने का हौसला करेंगे।

जीरो टालरेंस पर सरकार की खूब खिल्ली उड़ती रही है। ये नारा त्रिवेन्द्र का ही दिया हुआ है। ये दीगर बात है कि इस पर अमल या तो होता कम ही दिखा है या फिर इतनी देर से हुआ कि होना न होना बहुत अहम नहीं रह जाता है। ऐसा लग रहा है कि मुख्यमंत्री ने इस बार कुछ मन मजबूत किया है। इसके कारण पीडबल्यूडी के उन तीनों इंजीनियरों पर उनका चाबुक बरस पड़ा, जो थानों-रायपुर मार्ग पर बने फ्लाई ओवर के निर्माण में शामिल थे। आरोप है कि ये फ्लाई ओवर इतनी खराब गुणवत्ता वाला है कि सरकार को इस पर इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी।

अब तीनों इंजीनियरों, जिनमें एक अधिशासी अभियंता, एक अपर अधिशासी अभियंता और एक सहायक अभियंता हैं, को दंडित करते हुए एक पद नीचे करने का फैसला शासन ने किया है। इसकी फ़ाइल उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को कार्रवाई के लिए भेज दिया गया है। इससे ये तो साफ हुआ कि मुख्यमंत्री हर मामले में न तो सुस्त हैं न ही दोषियों को बख्शने वाले। फिर वह आबकारी महकमे के उस्ताद अफसरों पर क्यों नर्म रुख अपनाए हुए हैं, ये सोच के सभी हैरान हैं।

सबसे पहले तो मौजूदा वित्तीय वर्ष की आबकारी नीति और अफसरों के नाकारापन के कारण सरकार को संभावित आय में सीधे 1000 करोड़ रुपए का झटका लगा। ये उस राज्य के लिए कितनी बड़ी रकम है, ये इसी से समझा जा सकता है कि सरकार के पास कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तक देने के लिए पैसे की भारी किल्लत रहती है। विकास कार्यों के लिए पैसे की कमी तो आम बात हो चुकी है। इतना ही नहीं। आबकारी महकमे के अफसरों की मिलीभगत का आलम है कि लोग बिना बैंक गारंटी और लाइसेन्स फीस तक दिए शराब की दुकानों से मोटा माल कमा रहे। सरकार को ठेंगा दिखाया जा रहा है।

क्या ये जांच नहीं होनी चाहिए कि आखिर आबकारी नीति का ड्राफ्ट मुख्यालय में किसने बनाया? किस वजह से शासन ने उसको मंजूरी दे दी? क्या शासन के अफसरों को नीति से होने वाले भारी नुकसान का कतई अंदाज नहीं था? देहरादून के जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय के खिलाफ कितनी जांच बिठाई गई, खुद सरकार भी भूल चुकी है। पिछले एसीएस (आबकारी) डॉ. रणवीर सिंह ने रिटायर होने से पहले सरकार को ही निशाने पर लेते हुए घोटालों के आरोप में उपाध्याय को क्लीन चिट दे दी थी। नए आरोपों और देहरादून के पथरिया पीर में हुई 7 लोगों की मौतों के बावजूद एक बार फिर उपाध्याय कुर्सी पर हैं।

समझा जा रहा ही कि उन्होंने शराब दुकानदारों को इतनी खुली छूट मिलीभगत से दी कि सरकार को इस साल भी करोड़ों का चूना सिर्फ राजधानी में ही लग गया। ताज्जुब की बात ये है कि पीडबल्यूडी के जिन तीन इंजीनियरों को पदावनत किया गया है, वे सिर्फ 8.8 करोड़ के प्रोजेक्ट को कर रहे थे। आबकारी महकमे में 1000 करोड़ से ऊपर का घाटा सरकारी खजाने को पहुंचाने और साजिश-मिली भगत के कारण सरकार को करोड़ों का नुक्सान पहुंचाने वाले शराब के अफसरों पर त्रिवेन्द्र सरकार का नरम रुख किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा है।

अब ये सवाल उठने लगा है कि इन अफसरों ने कौन सा अमृत छका है। या फिर सरकार को कौन सा अमृत छका दिया है? जो सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने से इस कदर हिचक ही नहीं रही, बल्कि उनके साथ खड़ी दिख रही है। खास बात ये है कि जितनी जाँचें उपाध्याय के खिलाफ हो चुकी हैं और जितनी बार इस अफसर को बचाया गया है, वह रेकॉर्ड साबित हो सकता है।  

ये भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री को इस बारे में असलियत से दूर रखा जा रहा है। उनको जो फीड बैक दिया गया है, वह हकीकत से कोसों दूर है। शराब वालों ने मुख्यमंत्री के करीबियों के साथ ही बीजेपी के भी उन नेताओं पर कंबल डाला हुआ है, जो मुख्यमंत्री के करीबी समझे जाते हैं। ये आरोप झूठा साबित तभी होगा, जब सरकार इस मामले में उससे भी सख्त कार्रवाई शराब के अफसरों पर करें, जो उसने पीडबल्यूडी वालों पर की गई है। ये भी ध्यान में रखना होगा कि बाकी जिलों के डीईओ भी तमाम आरोपों से घिरे हुए हैं। उनको मुख्यमंत्री का नहीं तो फिर किस शक्तिशाली शख्स का संरक्षण मिला हुआ है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here