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आबकारी इंस्पेक्टर शुजआत पर हाईकोर्ट में सरकार लाजवाब!

महकमे का पक्ष रखने कोई नहीं पहुंचा नैनीताल

एडवोकेट विकेश ने दी है उर्दू अनुवादकों की निरंतर नौकरी को चुनौती

Chetan Gurung

आबकारी महकमे के बहुचर्चित इंस्पेक्टर शुजआत हुसैन की नौकरी को चुनौती मामले में सरकार की तरफ से नैनीताल हाई कोर्ट कोई नहीं पेश हुआ। इस मामले में देहरादून के वकील विकेश सिंह ने हुसैन की नौकरी को चुनौती देते हुए कहा है कि उनको यूपी सरकार ने सिर्फ एक साल के लिए उर्दू अनुवादक रखा था। उनके साथ राहिबा इकबाल को भी इसी पद पर रखा गया था। दोनों कैसे 24 साल बाद भी कैसे सेवा में हैं? साथ ही इंस्पेक्टर भी कैसे बन गए?

हाई कोर्ट में सरकार को इस बारे में अपना पक्ष रखने के लिए पिछले हफ्ते पहुँचना था, लेकिन उसकी तरफ से कोई पेश नहीं हुआ। इसकी वजह सरकार के पास इस बारे में कोई ठोस जवाब न होना और दिलचस्पी न लेना भी समझा जा रहा है। सरकार के इस रुख और ताजा हालात के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि शुजआत के लिए अपनी नौकरी बचाए रखना मुश्किल हो गया है। राहिबा को भी ऐसी ही हालात का सामना करना पड़ेगा।

शुजआत को देहरादून में पथरिया पीर शराब कांड में 7 मौतों के बाद निलंबित कर दिया गया था। उसके बाद वह हाई कोर्ट बहाल तो हो गए लेकिन अब नौकरी बचाने के लाले पड़ गए हैं। विकेश के मुताबिक शुजआत की सेवा एक साल बाद यानि, 1996 में ही खत्म हो चुकी है। उनको 1995 में यूपी की मुलायम सरकार ने उर्दू अनुवादक और कनिष्ठ लिपिक पद पर सिर्फ भरण पोषण के लिए रखा था।

शुजआत और राहिबा के पद बुंदेलखंड और उत्तराखंड में थे ही नहीं। तकनीकी और वैधानिक तौर पर दोनों सेवा में होने नहीं चाहिए। विकेश ने इसलिए शुजआत को पथरिया पीर मामले में सस्पेंड करने पर भी ये कहते हुए अंगुली उठाई थी कि जो सेवा में ही न हो, उसको सस्पैंड कैसे किया जा सकता है? शुजआत शराब महकमे में एक खास लॉबी के खासमखास लोगों में शुमार हैं। उर्दू अनुवादक से वह कैसे इंस्पेक्टर बन गए और कैसे सालों तक देहरादून सर्किल के इंस्पेक्टर बने रहे, इस पर लोग हैरान रहते हैं।

एक संयुक्त आयुक्त की अगुवाई में चल रही लॉबी के कई डीईओ और इंस्पेक्टरों के कारनामों से त्रिवेन्द्र सरकार को ख़ासी बदनामी का सामना करना पड़ा है। इस बार मुख्यमंत्री इस लॉबी को ध्वस्त करने का इरादा जता रहे हैं। इसके बावजूद नौकरशाही में मजबूत पकड़ के बूते ये लॉबी लाइसेंसिंग और माफिया लॉबी को अपने कब्जे में रखे हुए है। ये सवाल उठ रहा है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत आखिर कैसे इच्छा के बगैर इस लॉबी को सरकार और महकमे की छवि के साथ खेलने दिया जा रहा है। कहीं उनके इर्द-गिर्द वही लोग तो नहीं हैं, जो दागी शराब अफसरों-माफिया लॉबी से वास्ता रखते हैं।

पथरिया पीर कांड से भी इस लॉबी ने सबक नहीं लिया और डोईवाला में शराब का जो ट्रक पुलिस ने पकड़ा था, उसके पीछे भी इसी लॉबी और माफिया की मिलीभगत थी। पुलिस के एक डीएसपी रैंक के अफसर ने `Newsspace’ को बताया कि ये मामला पूरी तरह महकमे के अफसरों की माफिया संग मिलीभगत से जुड़ा था।  

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