जांच में दोषी फिर भी लटकाई जा चार्जशीट

नौकरी फर्जी,सरकार ने हाई कोर्ट में माना

शिकंजे में इंस्पेक्टर राबिया भी

आयुक्त सुशील ने कहा-बर्खास्तगी की कार्रवाई होगी

Chetan Gurung

शराब महकमे में अफसर सरकारी रसूख और दौलत पर भरपूर मौज कर रहे। उनको न तो आला अफसरों का डर है न ही कोर्ट का। सरकार भूले भटके दबाव में कोई कदम उठा भी लेती है तो वे खुद हाई कोर्ट पहुँच के उसको ठंडा कर देते हैं। देहरादून और अल्मोड़ा के जिला आबकारी अधिकारियों का तमाम धांधलियों के बावजूद कुछ न बिगड़ना हैरान करने वाली मिसाल है। देहरादून के DEO मनोज उपाध्याय के खिलाफ एक बार फिर जांच रिपोर्ट में साफ हुआ कि उन्होंने तमाम धांधलियाँ की हैं। इसके बावजूद उनको चार्जशीट तक जारी नहीं हुई है। देहरादून में तैनात इंस्पेक्टर शुजआत हुसैन कानूनन नौकरी में हैं ही नहीं। सरकार ने खुद हाई कोर्ट में इसको स्वीकार कर लिया है। इसके बावजूद हुसैन को सेवा में अभी तक कैसे रखा है, इसका जवाब सरकार के पास नहीं है। उनके साथ ही अल्मोड़ा में तैनात इंस्पेक्टर राबिया का मामला भी शुजआत की तरह का ही है।

आबकारी आयुक्त सुशील ने `Newsspace’ से ये माना कि DEO उपाध्याय पर लगे आरोप बेहद गंभीर किस्म के हैं। सरकारी खजाने को उन्होंने जम के चोट पहुंचाई। अब उनके खिलाफ चार्जशीट तैयार की जा रही है। उन्होंने ये साफ नहीं किया कि कब तक चार्जशीट दे दी जाएगी। क्यों अभी तक आरोपी डीईओ उपाध्याय कुर्सी पर है? इतने गंभीर आरोपों के बावजूद DEO सरीखी कुर्सी पर आखिर उपाध्याय कैसे बने हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक शासन स्तर पर अभी भी उपाध्याय को बचाने की कोशिश हो रही है। बीजेपी के भी ऐसे नेताओं का सहारा लिया जा रहा है, जो सत्ता के करीबी समझे जाते हैं।

उपाध्याय के खिलाफ पहले संयुक्त आयुक्त बीएस चौहान की जांच रिपोर्ट में तमाम गंभीर आरोप सही पाए गए थे। इस पर कार्रवाई के बजाए सरकार ने फिर अपर आयुक्त पीएस गर्ब्याल को यही जांच सौंप दी। गर्ब्याल ने भी जांच में तमाम अनियमितता और घोटालों के आरोपों को सही पाया। सूत्रों के अनुसार इसके बाद सबसे पहले तो DEO को मुअत्तल करना चाहिए था। उसके बाद आगे की कार्रवाई की जानी थी। सभी महकमों में यही दस्तूर है। सिर्फ उपाध्याय को विशेष छूट और राहत दी जा रही है। ये सवाल उठ रहा है कि आखिर उनको बचाने के लिए क्या शासन का कोई अफसर वीटो पावर का इस्तेमाल कर रहा है? पिछले साल ACS डॉ. रणबीर सिंह के पास आबकारी महकमा होने के दौरान शासन ने बहुत बेहयाई के साथ उपाध्याय को क्लीन चिट दी थी। अब रिटायर हो गए रणबीर ने बिना जांच के ही लिख दिया था कि शासन के आरोपों में बल नहीं पाया गया।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ही प्रकाश पंत के दिवंगत होने के बाद से आबकारी मंत्रालय संभाले हुए हैं। ऐसे में सारे आक्षेप उन पर ही लगने स्वाभाविक हैं। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि पिछले कई सालों से जिस अफसर ने आबकारी नीति का ड्राफ्ट तैयार किया, उसको अभी तक अहम कुर्सी पर कैसे रखा हुआ है। मुख्यमंत्री खुद उसको हटाने के आदेश कर चुके हैं। आखिर उस अफसर को बचाने या मौजूदा वित्तीय वर्ष में 10 अरब से ज्यादा का घाटा सरकार को होने के बावजूद फिर यही खेल करने की छूट देने के लिए कौन जिम्मेदार है? आयुक्त कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री अफसरों की ज़िम्मेदारी बदलने को कह चुके हैं। इस पर अमल किया जाएगा। ऐसा कब होगा, इसका जवाब उनके पास नहीं है।

शुजआत को यूपी सरकार ने 1995 में सिर्फ एक साल के लिए रखा था। उर्दू अनुवादक और कनिष्ठ लिपिक के तौर पर। राबिया के साथ। 1996 में ये अवधि खत्म हो गई। आज तक दोनों न सिर्फ सेवा में हैं, बल्कि इंस्पेक्टर जैसी कुर्सी पर पहुँच गए। शुजआत को शराब की खास लॉबी का शार्प शूटर माना जाता है। आयुक्त के अनुसार हाई कोर्ट में सरकार ने जवाब दाखिल कर के बता दिया है कि शुजआत को सिर्फ एक साल के लिए काम पर रखा गया था। यूपी सरकार ने ऐसी नौकरी का कोई गज़ट नोटिफिकेशन भी नहीं निकाला था। साथ ही बुंदेलखंड और उत्तराखंड (तब गढ़वाल-कुमायूं) के लिए ये तैनाती थी भी नहीं।

सुशील के अनुसार हाई कोर्ट के आदेश के बाद शुजआत की बर्खास्तगी पर कार्रवाई होगी। सरकार का ये तर्क इसलिए अजीब समझा जा रहा है कि जब उसने खुद मान लिया कि शुजआत सेवा में है ही नहीं, तो फिर कोर्ट के आदेश का इंतजार क्यों किया जा रहा है। शुजआत पर कार्रवाई होती है तो राबिया भी स्वतः हटा दी जाएगी। मुख्यमंत्री के जीरो टालरेंस को चुनौती दे रहे इन मामलों पर सरकार कब तक वाजिब कार्रवाई कर के अपनी छवि-प्रतिष्ठा बचाती है, इस पर नजरें जमी हुई है।

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