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करोड़ों का खेल..44 गंभीर आरोप..फिर भी बचने का हुनर

दागी DEO उपाध्याय को बचा रहा शासन!

आबकारी आयुक्त के घेराबंदी की साजिश

Chetan Gurung

देहरादून के जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय ने लगता है कोई अमृत चख लिया है। या फिर अपने सियासी और अफ़सरी आकाओं के आगे तगड़ी अगरबत्ती जला दी है। ऐसा न होता तो ये क्या मुमकिन है? 44 गंभीर आरोप और करोड़ों का घोटाला..फिर भी सस्पेंड होना तो दूर..कुर्सी से हटाए तक नहीं गए हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को ले कर अंदरखाने की खबर ये है कि वह भी इस मामले में सख्त कदम चाहते हैं। सवाल ये कि फिर कौन उपाध्याय को बचा रहा है?

उपाध्याय पिछले साल भी सस्पेंड हुए थे। शराब की दुकानों का ठेका सस्ते में उठवाने समेत अनेक गंभीर वित्तीय अनियमितता के आरोप उन पर थे। पहले हाई कोर्ट से स्टे ले आए। सरकार की मेहरबानी से। जिसने अदालत में अपनी बात मजबूती से रखी ही नहीं। फिर सरकार की ही मेहरबानी से कुर्सी भी वही पा ली, जिस पर रह के जम के चूना सरकार को लगाया था। सरकार पर आरोप इसलिए बनता है कि डीईओ को सस्पेंड तो किया गया लेकिन उनकी जगह किसी और को चार्ज नहीं दिया गया। एडीएम को अतिरिक्त चार्ज दिए गए।

साफ था कि सरकार इंतजार कर रही थी कि वे फिर से पुरानी सीट हासिल करने का आदेश भी हाई कोर्ट से ले आए। ऐसा आदेश मिला भी। इसके बाद आज तक सरकार ने उपाध्याय को कुर्सी पर बिठाया हुआ है। 21 तोपों की सलामी वाली बात तो ये रही कि जिस सरकार ने आरोप लगाए थे, उसने ही गुपचुप ढंग से उपाध्याय को क्लीन चिट दे दी कि उन पर लगाए गए आरोपों में बल नहीं पाया गया। बिना जांच और परीक्षण के दिए गए इस क्लीन चिट पर डॉ. रणबीर सिंह ने दस्तखत किए। खुद के रिटायर होने से एन पहले। बेहद खामोशी संग। जाहिर है शासन के हर स्तर के अफसरों की मिलीभगत इस मामले में रही।

ये ताज्जुब की बात है कि उपाध्याय लगातार दूसरे साल भी करोड़ों के खेल में फिर फंस गए। डीएम सी रविशंकर ने सबसे पहले जांच बिठाई। सुनने में आया कि उन पर सियासी दबाव भारी पड़ गया। उनको क्लीन चिट देनी पड़ी। जो पूरी तरह गलत है। फिर महकमे के संयुक्त आयुक्त और अपर आयुक्त की अलग-अलग जांच बिठाई गई। दोनों में ही फँसने के बाद अब उपाध्याय के लिए मुश्किलों का दौर शुरू तो हुआ है, लेकिन अभी तक सरकार का इस अफसर को डीईओ बनाए रखने से हैरानी होनी स्वाभाविक है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करने का दावा करते हैं। उपाध्याय का मामला इस दावे को जीभ दिखा रहा है। क्या ये हैरानी की बात नहीं कि चार्ज शीट में 44 संगीन आरोप हैं। इनमें वित्तीय घोटालों के साथ ही दुकानों को लुटा देने समेत तमाम तरह के आरोप हैं। इतने आरोपों के बावजूद कोई अफसर कैसे कार्रवाई से बच सकता है, ये नई और अद्भुत मिसाल आबकारी महकमे ने पेश की है। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में शासन की भूमिका संदिग्ध है। आबकारी आयुक्त सुशील कुमार इस मामले में सख्त रुख अपनाए हुए हैं।

सुशील ने मुख्यालय में बैठने वाले रसूख वाले संयुक्त आयुक्त टीके पंत से लाइसेन्स, एल्कोहल और शीरा सरीखे अहम काम छीन के सुलझे हुए तथा साफ छवि वाले बीएस चौहान को सौंप कर खास लॉबी और उनकी सियासी आकाओं को एक किस्म से बिदका डाला है। चौहान भी संयुक्त आयुक्त हैं। पंत से वरिष्ठ हैं। सूत्रों के अनुसार आयुक्त शासन को उपाध्याय के निलंबन की सिफ़ारिश कर चुके हैं। शासन फ़ाइल दबा के बैठा हुआ है। इस पर क्या कार्रवाई शासन में होती है, इस पर मुख्यमंत्री खुद भी नजर रखे हुए हैं। पंत के महकमों को भी मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद ही छीना गया।

अब आबकारी में खास लॉबी इस कोशिश में है कि किसी तरह सुशील को आबकारी आयुक्त की कुर्सी से हटाया जाए। शासन में पकड़ के बावजूद आयुक्त के पास तमाम शक्तियों के रहते इस लॉबी के लिए मौजूदा दौर बहुत खराब चल रहा है। मुख्यमंत्री के भी तीखे तेवर के चलते उनको दिक्कत आ रही है। ये देखना होगा कि उपाध्याय पर वाकई कार्रवाई होती है या फिर से पिछली बार वाले किस्से की पुनरावृत्ति होगी।

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