पार्टी मुखिया के चयन पर भी ढुलमुल आलाकमान

खत्म होगा मंत्री-अध्यक्ष के मजबूत दावेदार धामी का इंतजार!

युवा चेहरों पर बात होगी तो कैलाश पंत भी सशक्त नाम

Chetan Gurung

उत्तराखंड BJP का नया बॉस कौन होगा? ये सवाल इन दिनों पार्टी और प्रदेश की सियासी फिज़ाओं में जम कर तैर रहा। मीडिया में कयासबाजी चरम पर है। एक से के नाम रोजाना बतौर अध्यक्ष सामने आते जा रहे। कोई किसी अनुभवी और वरिष्ठ को तो कोई एकदम नए और युवा-काबिल चेहरे का नाम ले रहा। कोई मौजूदा अध्यक्ष अजय भट्ट को ही फिर से मौका मिलने के समीकरण देख रहे। महीने भर के भीतर शायद नए अध्यक्ष का खुलासा हो जाएगा। जो भी हो। इतना साफ और कनफर्म माना जा रहा कि नया प्रदेश प्रमुख वही होगा, जिस पर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत हाथ रख देंगे। या फिर हामी भरेंगे।

अगर समीकरणों को देखा जाए तो नया अध्यक्ष कुमायूं से होगा। ब्राह्मण होगा। पार्टी की लाइन को देखे तो युवा और प्रतिभावान होगा। लंबी रेस का घोड़ा होगा। संघ का आशीर्वाद उसके साथ होना चाहिए। ये सब ठीक है। इसमें कहीं कोई लोचा नहीं है। ये देखा ही जाता है। इस सबके साथ इस बार एक नया समीकरण और जुड़ा होगा। वह है, मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र का हाथ किसके कंधे या सर पर रहेगा। ये तय है कि त्रिवेन्द्र की इच्छा का सम्मान आला कमान पूरी तरह करेगा। त्रिवेन्द्र को ले कर ये पहलू सामने आने की वजह है।

अव्वल तो बीजेपी आला कमान, खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनसे भी अधिक पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के वह ब्ल्यू आइड बॉय (आँख का तारा) माने जाते हैं। जो वह चाहते हैं, या जो भी वह करते हैं, उसको मोदी-शाह का सदा समर्थन मिलता रहा है। त्रिवेन्द्र पर जितने भी सियासी हमले हुए हों या आरोप लगते रहे हों, मोदी-शाह का विश्वास त्रिवेन्द्र पर सदा बना रहा। बीजेपी राज में नित्यानन्द स्वामी (मरहूम), बीसी खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक को हाई कमान का आँख मूँद समर्थन कभी नहीं मिला। तीनों इसलिए कार्यकाल के बीच में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए गए। तीनों के खिलाफ पार्टी और सरकार में जम के बगावत का बिगुल बजा।

त्रिवेन्द्र से भले मंत्री या पार्टी के लोग बहुत खुश न दिखते हों, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं कि उनके खिलाफ कहीं जा के जुबान खोल भी सके। ये ही त्रिवेन्द्र की असल ताकत है। एक बात और। मोदी-शाह की प्रतिष्ठा मुख्यमंत्रियों को बदलने में यकीन रखने वाली नहीं है। ऐसा होता तो यूपी के योगी और हरियाणा के मनोहरलाल खट्टर की विदाई बीच में ही हो चुकी होती। त्रिवेन्द्र फिर भी दोनों से बेहतर सरकार चला रहे। ऐसा माना जाता है। मोदी-शाह की जोड़ी मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष में तालमेल में यकीन रखने वाली जोड़ी है। ऐसे में उत्तराखंड में वह यही चाहेंगे कि त्रिवेन्द्र को वैसा ही प्रदेश अध्यक्ष दिया जाए, जो उनकी पसंद का हो।

इस समीकरण में युवा चेहरे अधिक चमकते हैं। इनमें खटीमा विधायक पुष्कर सिंह धामी, संघ के पुराने सिपहसालार कैलाश पंत और राज्यमंत्री धन सिंह रावत शामिल हैं। पंत को संगठन का बहुत अनुभव है। सभी के साथ तालमेल रख के चलने में यकीन रखते हैं। भगत सिंह कोश्यारी के कभी करीबी थे, लेकिन अब वह त्रिवेन्द्र का भरोसा भी जीत रहे हैं। संगठन चलाने के मामले में धामी ने भी छाप छोड़ी है। आज वह मंत्री बनने के दावेदारों में भी शीर्ष पर हैं। मंत्रिपरिषद में जब भी नई भर्ती या फिर फेरबदल होगा, धामी को कुर्सी देने पर गंभीरता पूर्वक विचार होगा, ये तय है।

वह बीजेपी युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष जब थे तो सत्तारूढ़ काँग्रेस का बैंड बजाए रखते थे। उनको सरकार में मंत्री के मजबूत दावेदार के तौर पर शुरू से ही देखा जाता रहा है। ये संयोग ही कहा जाएगा अगर वह मंत्री या प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सियों में से किसी पर भी फिट नहीं होते हैं। उनकी करीबी हाल के सालों में त्रिवेन्द्र के साथ बढ़ी है। वह भी एक वक्त पर कोश्यारी के कट्टर समर्थक थे, लेकिन वक्त के साथ वह पार्टीमैन बन गए। धामी-पंत संघ में भी मजबूत पैठ रखते हैं। त्रिवेन्द्र को धामी या पंत के नामों पर ऐतराज होगा, इसकी संभावना आज के दौर में नहीं के बराबर मानी जा रही है।

मंत्री धन सिंह को भी संगठन चलाने के मामले में अद्भुत दक्षता हासिल है। उनको भावी मुख्यमंत्री बताने वाले भी मिल जाएंगे। उनका प्लस पॉइंट ये भी है कि मोदी-शाह उनको निजी तौर पर भी जानते हैं। त्रिवेन्द्र के साथ उनके रिश्ते बेहद संतुलित हैं। ये बात अलग है कि संगठन में जाने की दिलचस्पी उनके भीतर फिलहाल नहीं दिखती है। धामी और धन सिंह ठाकुर हैं। ये देखना अहम होगा कि मुख्यमंत्री-प्रदेश अध्यक्ष क्षत्रीय रखने का जोखिम क्या हाई कमान ले सकेगा। धन सिंह गढ़वाल से हैं। त्रिवेन्द्र भी यहीं से हैं। कुमायूं और ब्राह्मण वाले ब्रेकेट में पंत अधिक मुफीद दिखते हैं। नाम तो और भी कई चल रहे हैं।

इनमें मंत्री मदन कौशिक, बलराज पासी, विश्वास डावर के साथ ही मौजूदा अध्यक्ष अजय भट्ट के नाम शामिल हैं। डावर के नाम पर गंभीरता भले नहीं दिखती, लेकिन वह इन दिनों इस कुर्सी के लिए दौड़ धूप कर रहे हैं। मोदी-शाह के अलावा वह पार्टी के दिग्गजों से दिल्ली जा के मिल चुके हैं। संघ वालों के दरबार में भी जा रहे हैं। कौशिक और पासी पुराने और अनुभवी हैं, लेकिन सिर्फ तराई के भरोसे बीजेपी सियासत करना चाहेगी, इसकी संभावना कमजोर दिखती है। भट्ट की ताजपोशी फिर से हो सकती है, लेकिन इसके लिए आला कमान को विकल्प शून्य दिखना चाहिए। ऐसा अभी दिख तो नहीं रहा।

आला कमान प्रदेश अध्यक्ष पर जिस तरह फैसला करने में देर पर देर कर रहा है, उससे उसकी निर्णायक क्षमता पर अंगुली उठ रही है। ये भी कहा जा रहा है कि उत्तराखंड को वह अहमियत नहीं दे रहा। यहाँ मंत्रिपरिषद में तीन कुर्सियाँ खाली हैं। सरकार का कामकाज मंत्रियों की कमी के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रहा। खुद मुख्यमंत्री इच्छा जता चुके हैं कि मंत्रियों की कुर्सियाँ भर दी जानी चाहिए। इसके बावजूद आला कमान उत्तराखंड में मंत्रियों की कुर्सियाँ भरने के लिए फैसला करने का वक्त नहीं निकाल रहा है। ऐसा न हो कि प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर भी वह ऐसी ही लेट लतीफी दिखाए। ऐसा हुआ तो उत्तराखंड बीजेपी में पसोपेश की सूरत रहेगी। इसका नुकसान पार्टी को ही विधानसभा चुनावों में उठाना भी पड़ सकता है। तब इसका दोष हाई कमान के माथे ही जाएगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here