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मोदी-शाह के पास नहीं त्रिवेन्द्र का मजबूत विकल्प!

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मुख्यमंत्री के लिए एक भी दावेदार नाम दमदार नहीं

Chetan Gurung

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कुर्सी को क्या वाकई खतरा है? क्या वह हटाए जा सकते हैं? झारखंड में बीजेपी के विधानसभा चुनाव में फतह से बुरी तरह हाथ से धो बैठने के बाद ये कयास सियासी जगत में अचानक तेजी पकड़ रहे हैं। सियासत में कभी भी कुछ भी और किसी भी किस्म की होनी-अनहोनी आकार ले सकती है। इसमें शक नहीं है। ऐसे में मुख्यमंत्री के बदले जाने की हवा कब सही दिशा में बहने लगे, कहा नहीं जा सकता है। फिर भी इस बारे में एक विश्लेषण करना बनता ही नहीं है, उस पर गहराई से साफ तस्वीर भी निकाल के लाना लगता है जरूरी हो गया है।

झारखंड से पहले हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों से बीजेपी आला कमान जो, वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह, जो संगठन और सत्ता के असली बॉस हैं, सकते में हैं। उनके गड़बड़ाते बयान, बात-बात में तिलमिलाहट, विवादित फैसले लगता है, इसी का नतीजा है। महाराष्ट्र में तो पार्टी ने अपना चीर हरण कराया। झारखंड में नाक नीची हुई। हरियाणा में गठबंधन की सरकार बना के वैसी ही आबरू लुटाई, जैसी महबूबा के महबूब बन के जम्मू-कश्मीर में। हार-जीत का सीधा असर मोदी-शाह की प्रतिष्ठा पर पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं है।

भले फतह का रिश्ता दोनों से जोड़ा जाता है और शिकस्त के लिए स्थानीय नेताओं को दोषी ठहरा के खुद की टीआरपी गिरने से बचाने की कोशिश के जाती है। देश-विदेश में शायद ही ऐसा कोई सियासी विश्लेषक होगा, जो ये मानने में असमंजस रखेगा कि विधानसभा चुनावों में भी मोदी ही मैदान में थे। आगे भी रहेंगे। उनका ही नाम सामने रख के पार्टी हर विधानसभा चुनाव लड़ती है। खुद मोदी अपना प्रधानमंत्री वाला काम छोड़-छाड़ के विधानसभा चुनावों में व्यस्त दिखते रहे हैं। ऐसे में शिकस्त के लिए सिर्फ स्थानीय नेताओं को दोषी ठहरा दिया जाना, उनके साथ ना-इंसाफ़ी और मोदी-शाह की प्रतिष्ठा तथा बाजार भाव चढ़ाए रखने की कोशिश से इतर नहीं है।

ये ठीक है कि वह दौर था जब मोदी के नाम के जलवे पर विधानसभा चुनाव बीजेपी ने फतह किए, लेकिन अब गंगा बहुत मैली हो चुकी है। अब मोदी नाम असरदार तो लगता है, लेकिन करिश्मा नहीं रह गया है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी मोदी का नाम ही आगे किया जा रहा है। इसके बावजूद चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ईशारा कर रहे हैं कि एक बार फिर अरविंद केजरीवाल की सुनामी आने वाली है। इसमें मोदी-शाह की जोड़ी शायद तिनकों की मानिंद उड़ जाए तो अचंभा नहीं होगा।

तो जब हर विधानसभा चुनावों में मोदी-शाह ही मैदान में हैं। मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ा जा रहा है। आगे भी लड़ा जाना है तो फिर उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र को पार्टी ये सोच के कैसे हटा देगी कि उनके रहते बीजेपी 2022 का विधानसभा चुनाव शायद न जीत पाए। अगर मोदी-शाह के नाम का जादू है और उनका करिश्मा कायम है तो फिर उत्तराखंड फतह क्यों नहीं होगा? अगर नहीं होता है तो फिर सिर्फ त्रिवेन्द्र को दोष क्यों? क्या त्रिवेन्द्र का कामकाज यूपी के योगी आदित्यनाथ से खराब हैं? या हरियाणा के मनोहरलाल खट्टर उनसे बेहतर हैं?

अगर दोनों बात नहीं है तो फिर त्रिवेन्द्र पर बदलाव की गाज भला कैसे गिराई जा सकती है। और फिर देखना ये भी होगा कि क्या मुख्यमंत्री बदलने से उत्तराखंड की सूरत वाकई बदल जाएगी? सियासी और प्रशासनिक हालात बहुत बेहतर हो जाएंगे? इससे भी बड़ा सवाल ये है कि मुख्यमंत्री के लिए मोदी-शाह के पास उचित विकल्प है? मान लिया कि त्रिवेन्द्र को बदलने का मन मोदी-शाह बना लेते हैं। तो फिर विकल्प क्या है उनका? जो नाम गाहे-बागाहे मुख्यमंत्री के तौर पर चर्चाओं में उठते रहते हैं, उनमें सतपाल महाराज, अजय भट्ट, डॉ॰ धन सिंह रावत और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक हैं।

महाराज कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन उनके पीछे काँग्रेस पृष्ठभूमि का पुछल्ला है। उनको बीजेपी में आए अधिक वक्त नहीं हुआ है। उनसे वरिष्ठ राजनेता और भाजपाई दिग्गज पार्टी में अनेक हैं। उनको पार्टी और संघ आसानी से हजम कभी नहीं कर पाएगा। धन सिंह को युवा और प्रतिभावान मंत्रियों में शुमार किया जाता है। उनमें सांगठनिक कौशल और लोगों को मोहने की कला भी है। संघ का साथ उनके पास है। फिर भी उनकी कम आयु और सियासी अनुभव उनके आड़े नहीं आएगी, ये दावा कौन कर सकता है।

डॉ.निशंक के दिन मानव संसाधन मंत्री बनने के बाद से खराब से चल रहे हैं। देश के हर उच्च शैक्षिक और तकनीकी संस्थानों में इन दिनों जबर्दस्त बवाल है। जेएनयू ताजी मिसाल है। उनके साथ दिक्कत ये है कि पार्टी के भीतर उनके विरोधियों और शत्रुओं की तादाद ख़ासी है। वे निशंक के केंद्रीय मंत्री बन जाने भर से ही गले तक भरे हुए हैं। वे निशंक को मुख्यमंत्री बनने देंगे और कोई अड़ंगा नहीं लगाएंगे, ऐसा सोचना भी बेकार होगा।

भट्ट को भी लोग मुख्यमंत्री के दावेदारों में शुमार कर रहे हैं। पहले भी इस मामले में चर्चाओं में उनका नाम रहा है। उनके साथ ऋणात्मक पहलू उनकी सियासी पृष्ठभूमि बहुत सशक्त न होना है। वह चुनावों में लगातार जीतते रहने की कला अभी नहीं सीख पाए हैं। ये बात अलग है कि वह अपने बर्ताव और बतौर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष के गहरे अनुभव के चलते उत्तराखंड बीजेपी में मजबूत हस्ताक्षर बन चुके हैं।

इस सबके बावजूद अगर मोदी-शाह को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर किसी और चेहरे को लाना ही है तो इसमें वे पीछे नहीं हटेंगे। फिर भी ये कहा जा सकता है कि जो नाम मुख्यमंत्री के विकल्प के तौर पर समझे जा रहे हैं, उनमें वह सियासी तिलिस्म नहीं दिखता है कि नाहक मुख्यमंत्री को बदल के उत्तराखंड में पार्टी सियासत को उथल-पुथल के रख डालें। कुछ महीने पहले मरहूम प्रकाश पंत और पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी को त्रिवेन्द्र के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाता था।

दुर्भाग्यवश पंत असमय काल कलवित हो गए। बलूनी कैंसर से गंभीर रूप से पीड़ित हो के मुंबई में अस्पताल में भर्ती हो के ईलाज करा रहे हैं। ये समझा जा रहा है कि बीजेपी आलाकमान अगर वाकई मुख्यमंत्री बदलने के मामले में गंभीर होगी तो उसकी कार्रवाई 2 महीने के भीतर सामने आ जाएगी। ज्यादा से ज्यादा वह दिल्ली विधानसभा चुनाव तक रुक सकती है। तो ये सवाल बना हुआ है कि क्या वाकई मुख्यमंत्री बदलने की कानाफूसियों में दम है? इसकी हकीकत पर सभी सियासी विश्लेषकों और गंभीर किस्म के पत्रकारों के साथ ही नौकरशाही की भी पैनी नजर है।

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