Home उत्तराखंड भगत को कुर्सी का मतलब! त्रिवेन्द्र का तख्त और सुरक्षित

भगत को कुर्सी का मतलब! त्रिवेन्द्र का तख्त और सुरक्षित

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ठाकुर-ब्राह्मण का समीकरण अब हो गया फिर फिट

मंत्रिपरिषद में कुमायूं से एक दावेदार की जगह और मजबूत

Chetan Gurung

पुराने बासमती चावल बंशीधर भगत उत्तराखंड BJP के नए सरदार बन गए। इसके साथ ही दो बातें एक साथ हो गईं। ऐसा सियासी समीक्षक मान के चल रहे। सबसे बड़ा पहलू तो ये कि अब शायद मुख्यमंत्री की कुर्सी को ले कर बदलाव की गर्म हवा शीतल हवा में तब्दील हो जाएगी। दूजा ये कि मंत्रिपरिषद विस्तार में कुमायूं से जो भी दावेदार हैं, उनमें से किसी एक की सीट पक्की जानिए। भगत के अध्यक्ष बनने से युवा और कर्मठ कैलाश पंत को निराश तो होना पड़ा लेकिन उनके लिए अच्छा ये कि वे पार्टी की अंदरूनी सियासत की मुख्य धारा में पूरी धमक संग लौट आए।

भगत को ले के अचानक ही माहौल बना। चंद दिनों पहले तक ये तस्वीर साफ नहीं हो रही थी कि अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन सा चेहरा दिखाई देगा। कई नाम चल रहे थे। इनमें पंत भी प्रमुखता के साथ शामिल थे। दावा तो विश्वास डावर भी ठोक रहे थे। उनको एक बार फिर राज्यमंत्री का दर्जा और बदला महकमा दे दिया गया तो इसके पीछे उनका अध्यक्ष पद पर दावा ही अहम कहा जा सकता है। भगत ब्राह्मण हैं। कुमायूं से हैं। मंत्री रह चुके हैं। मेल-जोल में यकीन रखते हैं। व्यवहार से लोकप्रिय हैं। पार्टी के पुराने खुशबूदार चावल कहे जा सकते हैं। संघ को उनके नाम पर कोई ऐतराज नहीं था। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी उनके नाम पर सहमत थे।

इसके बाद भगत को ले कर पसोपेश कल ही तकरीबन खत्म हो चुका था। सिर्फ घोषणा की औपचारिकता रह गई थी। वह आज पूरी हो गई। त्रिवेन्द्र के लिए भगत का अध्यक्ष बनना निजी तौर पर भी बहुत अच्छा हुआ। एक तो अब इस चर्चा को पूर्ण विराम मिल जाएगा कि सरकार के सरताज भी बदले जा सकते हैं, दूसरा ये कि गढ़वाल में कोई इतना बड़ा ठाकुर नेता है ही नहीं, जो त्रिवेन्द्र को हटाने जैसा फैसला करने में हाई कमान को सहूलियत प्रदान करे। जो नाम बड़े हैं, वे या तो ब्राह्मण हैं या फिर काँग्रेस पृष्ठभूमि वाले। ये तो कोई भी नहीं मानेगा कि अध्यक्ष-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ब्राह्मण चेहरे को एक साथ मौका मिलेगा।

गढ़वाल में अगर बड़ा नाम तलाशा जाए तो डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज, मदन कौशिक हैं। निशंक के बारे में कहा जा रहा है कि वह केंद्र में मानव संसाधन मंत्रालय के लिए खुद को शायद मुफीद नहीं पा रहे हैं। लिहाजा, वे मुख्यमंत्री के तौर पर उत्तराखंड वापसी करने की चाह रखते हैं। बहुगुणा काँग्रेस से छोटा सा ही सही, लेकिन लश्कर ले कर बीजेपी में गए थे। वहाँ, समुद्र में मोती की तरह गायब हो गए हैं। निशंक-बहुगुणा दोनों पहाड़ी ब्राह्मण हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी दावेदारी मजबूत नहीं थी। ब्राह्मण कोटा भगत ने अध्यक्ष बन के खत्म कर दिया।

एक अन्य ब्राह्मण और मंत्री कौशिक रेकॉर्ड तोड़ जीत हासिल करते रहे हैं। हर बार मंत्री बनने से उनको कोई रोक नहीं पाया है। इसके बावजूद उनको कभी भी मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए गंभीर तो छोड़िए, हल्का दावेदार भी नहीं समझा गया। ये बात अलग है कि उनको काफी सूझ-बूझ वाला मंत्री माना जाता है। उनकी कमी सिर्फ उनका हरिद्वार यानि मैदान से विधायक होना है। बतौर मुख्यमंत्री हल्का-फुल्का दावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद अजय भट्ट का भी उभरता रहा है। भगत ने सभी ब्राह्मण के साथ ठाकुर दावेदारों के रास्ते अब बंद ही नहीं कर दिए हैं। उन्होंने अलीगढ़ी ताला भी ठोंक दिया है।

बहुगुणा की तरह ही मंत्री सतपाल भी काँग्रेस से आए। मंत्री के तौर पर उनका प्रदर्शन बहुत काबिले तारीफ नहीं रहा है। ऐसे में उनको मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जाना भी अतिश्योक्ति समझा जा रहा। फिर किसी काँग्रेस से आए शख्स को बीजेपी सत्ता के मुखिया की चाबी सौंप देगी, इसकी कल्पना भी जल्द से नहीं की जा सकती है। इस सूरत में ये कहा जा सकता है कि त्रिवेन्द्र ने भगत के नाम पर सहमति दे के न सिर्फ अध्यक्ष लॉबी को खुद से जोड़ लिया बल्कि खुद की भी सुरक्षा के नजरिए से सशक्त किलाबंदी कर ली। ये समीकरण कितना और कब तक सही साबित होता है, सवाल सिर्फ इस पर है।

भगत को मंत्रिपरिषद के लिए भी दावेदार समझा जा रहा था। कुमायूं से अनुभवी और वरिष्ठ होने के नाते उनका दावा काटना आसान नहीं था। उनको प्रदेश अध्यक्ष बना के पार्टी ने उनके मंत्री बनने की चाह को भी खत्म कर दिया। अब कुमायूं से किसी कम मजबूत नाम के लिए मंत्रिपरिषद में प्रवेश का दावा मजबूत हो गया है। इसका मतलब सिंह धामी और बलवंत सिंह भौर्याल के लिए रास्ता और आसान हो गया है। दिवंगत प्रकाश पंत की पत्नी, भले पहली बार विधायक बनी हैं, लेकिन उनको भी मंत्री बना दिया जाता है तो ताज्जुब नहीं होगा। तीनों नाम कुमायूं से हैं। वहाँ से और नाम भी छलक के सामने आ सकते हैं। भगत के अध्यक्ष बनने से गढ़वाल से किसी के भी मंत्री बनने के पूर्व समीकरण पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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