Home उत्तराखंड गोरखा फौज की बहादुरी को जीवंत करती फिल्म `नालापानी’

गोरखा फौज की बहादुरी को जीवंत करती फिल्म `नालापानी’

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रिमेश अधिकारी के निर्देशन में नेपाल में बनी फिल्म मचा रही धूम

वह युद्ध जिसके बाद नेपाल-फिरंगियों में सुगौली संधि हुई

नालापानी युद्ध के बाद ही ब्रिटिश-इंडियन फौज ने गोरखा भर्ती शुरू की

Chetan Gurung

206 साल पहले गोरखा कौम की वीरता और बहादुरी की मिसाल एतिहासिक नालापानी युद्ध पर नेपाल में फिल्म बनाई गई है। नेपाल के अब तक की सबसे महंगी फिल्मों में शुमार भव्य `नालापानी’ का प्रदर्शन देहरादून समेत भारत के भी कई हिस्सों में करने की योजना है। बलभद्र कुँवर के नेतृत्व में 1814 में ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज के साथ ये युद्ध हुआ था। देहरादून शहर से 10 किमी की दूरी पर स्थित नालापानी के खलंगा किले में तब गोरखा फौज की अद्भुत वीरता और बहादुरी ने एक बार तो फिरंगी फौज के कदमों को उखाड़ डाले थे। उनके छक्के छुड़ा दिए थे।

दुनिया में इस युद्द को छापामार युद्ध के तौर पर भी शानदार मिसाल समझा जाता है। फिल्म का निर्माण रिमेश अधिकारी प्रॉडक्शन ने किया है। उन्होंने ही फिल्म का निर्देशन भी किया है। फिल्म का अभी सिर्फ विशेष प्रदर्शन किया जा रहा है। रिमेश के अनुसार जल्द ही इसका सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाएगा।  फिल्म के कलाकारों में देशभक्त खनाल, अर्जुन जंग शाही, संतोष पंत, मनोज शक्य, विशाल प्रहरी, विजय विस्फोट, पूजना प्रधान, गीता अधिकारी, साहिना भट्टराई, गीता बिष्ट, युग जंग कार्की सरीखे नेपाली कलाकारों के साथ ही अंग्रेज़ कलाकार भी शामिल हैं।

फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट लेखन का कार्य डॉ. धनराज कुँवर तथा रामराज कुँवर ने किया है। रिमेश इससे पहले देहरादून के ही भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी शहीद दुर्गा मल्ल पर वृत्त चित्र का निर्माण भी कर चुके हैं। इसके लिए वह 2013 में देहरादून अपनी फिल्म यूनिट के साथ आए थे। नालापानी युद्ध को नेपाली और गोरखा फौज-कौम के लिए बहुत बड़े सम्मान के तौर पर देखा जाता है। इतिहास में इस युद्ध को विशेष रूप से याद किया जाता है। नेपाली और भारतीय फौज में गोरखा और नेपाली सैनिकों की भर्ती भी इसी युद्ध का नतीजा है।

नेपाली शासक अमर सिंह के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज ने खलंगा किले पर हमला बोल दिया था। किले के सेनापति बलभद्र कुँवर के पास न सिर्फ 300 के करीब की नफ़री थी, बल्कि हथियार के नाम पर सिर्फ तलवारें, खुखरियाँ, कुछ भरवा बंदूकें और भाले थे। किले में महिलाएं और बच्चे भी थे। युद्ध में सभी ने जबर्दस्त वीरता से फिरंगी फौज के पाँव उखाड़ दिए थे। कंपनी फौज के ब्रिगेडियर जनरल जिलेस्पी तो पहले दिन ही खेत रहे थे। कंपनी फौज के पास तकरीबन 5500 सैनिक थे। तोपें और अन्य उस वक्त के आधुनिक हथियार भी थे। फिर भी कंपनी फौज के लिए गोरखा फौज, जिसमें कुछ स्थानीय गढ़वाली और कुमाऊँनि लड़ाके भी शामिल थे, को परास्त कर पाना आसान नहीं रहा।

कंपनी फौज को इस युद्ध में कई दिन गुजर जाने के बाद भी फतह नहीं मिल रही थी। उल्टे भारी जान-माल की क्षति उठानी पड़ी थी। गोरखा फौज भी लड़ते-लड़ते धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी। गोला-बारूद और खाने-पीने का सामान भी तकरीबन खत्म हो चुका था। छोटा सा कमजोर किला ध्वस्त हो कर बेकार हो चुका था। महिलाएं और बच्चे भी घायल हो गए थे। इसके बाद हाथों में हथियार थामे बलभद्र ने बचे हुए करीब 55 पुरुष, महिला और बच्चों के साथ किला छोड़ दिया था। फिरंगी फौज ने भी मुट्ठी भर दुश्मन का सामना करने के बजाए उसको जाने दिया। इस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने देहरादून के सहस्त्रधारा मार्ग पर अपने शहीद सैनिकों तथा जिलेस्पी के साथ ही बलभद्र कुँवर के भी सम्मान में युद्ध स्मारक का निर्माण साथ-साथ किया।

दुनिया में ये इकलौता उदाहरण है। दुश्मन ने दुश्मन की वीरता का सम्मान करते हुए युद्ध स्मारक का निर्माण किया। इस युद्ध में गोर्खा फौज की अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल को देख ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखा शासक के साथ अगले साल संधि की। इसके बाद से ही गोरखा जवान ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश फौज में भी सेवा देने लगे। सुगौली (भारत) में ये संधि हुई थी। जब भारत आजाद हुआ तो ब्रिटिश सरकार अपने साथ चार गोरखा रेजीमेंट्स भी ले गई। छह रेजीमेंट्स भारत में रह गई। ये गोर्खा फौजी चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत के लिए बहादुरी दिखा के गौरव गाथा को आगे बढ़ा रहे हैं।

आज भी नेपाल की इतिहास की किताबों में नालापानी युद्ध को बहुत गर्व के साथ पढ़ा और पढ़ाया जाता है। फिल्म निर्देशक रिमेश के मुताबिक नालापानी युद्ध के अद्भुत कथानक से नेपाल के लोग बेहद प्रभावित हैं। इसलिए इस पर फिल्म बनाने का फैसला किया। सबसे बड़ी समस्या फिल्म की युद्ध पृष्ठ भूमि के कारण उस काल के हथियारों की नकल को जुटाना तथा बजट का बंदोबस्त करना था। फिल्म निर्माण में नेपाली सेना ने बहुत मदद की। उसके फ़ौजियों ने भी युद्ध दृश्यों में भाग लिया। नेपाली फौज के सेनापति पूर्ण थापा ने भी शूटिंग में बहुत मदद की। फिल्म का प्रदर्शन अभी सार्वजनिक रूप से नहीं किया गया है। शूटिंग नेपाल में चितवन तथा अन्य हिस्सों में की गई है। साथ ही एतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ न हो, इसका विशेष तौर पर ख्याल रखा गया है।

शुरुआती दौर में नेपाली फौज और स्कूल-कॉलेजों के लिए ही स्पेशल स्क्रीनिंग की जा रही है। इसके बाद इसको नेपाल भर में प्रदर्शित किया जाएगा। इस सिलसिले में इसको देहरादून के साथ ही भारत के अन्य हिस्सों व दुनिया के भी कई अन्य देशों में प्रदर्शित किया जाएगा। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद ऐसी उम्मीद जताई जा सकती है कि नालापानी-खलंगा पर्यटन के नजरिए से उत्तराखंड सरकार के लिए भी बहुत अहम केंद्र साबित हो सकता है। अभी इस एतिहासिक स्थल की उपेक्षा हो रही है। वहाँ साफ-सफाई की कमी है। अराजक किस्म के लोग पहुँचते हैं। कुछ साल पहले वहाँ बलात्कार का मामला भी सामने आया था। खलंगा में हर साल स्थानीय गोरखा समाज के लोग नालापानी युद्ध की याद में मेले का आयोजन करते हैं, लेकिन सरकार से अभी इसको कोई मदद नहीं मिल रही है।

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