IFS-IPS काडर मजबूत और हावी!

IAS-IPS वीक साथ कराने पर भी विचार !

अन्य काडरों ने कब्जा ली सबसे शक्तिशाली काडर की कुर्सियाँ

Chetan Gurung

धरती के देवताओं का दर्जा भारत में सिर्फ IAS काडर के अफसरों को हासिल है। ब्रिटिश राज के ICS की तरह ही IAS को आजाद भारत में वैसी ही शक्तियाँ और अहमियत हासिल है। देश की नीति बनानी हो या फिर अहम फैसले करने हों या फिर फरमान जारी करने हों, IAS ही शीर्ष भूमिका में होते हैं। केंद्र सरकार में लेटरल एंट्रीज़ के जरिये भले विशेषज्ञ गैर सरकारी लोगों को सीधे संयुक्त सचिव-निदेशक के पदों पर लाया जा रहा है, लेकिन राज्यों में अभी ऐसा नहीं हुआ है। इसके बावजूद उत्तराखंड में कई मिसालें ऐसी सामने आ रही हैं, जो साफ करती है कि देश की सर्वोच्च सेवा के नौकरशाह अब न सिर्फ कमजोर पड़ने लगे हैं, बल्कि खुद के हाल के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं। नई मिसाल है-IAS और IPS week का सालाना आयोजन एक साथ करने की सोच का पैदा होना।

हाल ही में IAS week के दौरान तब नौकरशाह हैरान और कसमसा गए, जब एक आला नौकरशाह ने अपने उद्बोधन के दौरान ये निजी प्रस्ताव औपचारिक तौर पर रख दिया कि क्यों न IAS-IPS week का आयोजन एक साथ किया जाए? इसके पीछे उनकी जो दलील थी, वह IPS काडर का छोटा होना था। बेहद बड़े नौकरशाह के इस प्रस्ताव पर वहाँ मौजूद जूनियर नौकरशाहों के सामने न तो हाँ न ही ना कहने की सूरत थी। बहरहाल उन्होंने कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा। प्रस्ताव मंजूर तो नहीं हुआ लेकिन गिर गया भी नहीं कहा जा सकता है।

इस प्रस्ताव ने IAS अफसरों में खलबली मचा दी है। उनको ये बेचैनी होने लगी है कि आखिर ये सोच और प्रस्ताव क्यों और किस लिए आया? ये किसके मस्तिष्क की उपज है या फिर क्या इसके पीछे IPS अफसरों की सोची-समझी सोच छिपी है। उनको ऐसा भी लग रहा है कि क्या IPS काडर उनके समकक्ष आने या उन पर हावी होने की कोशिश कर रहा है। उत्तराखंड में इस सोच के पीछे कुछ आला IPS और IAS अफसरों के पति-पत्नी होना भी है। ऐसा कहा जा सकता है। अभी भी राधा रतुड़ी (IAS-अपर मुख्य सचिव)-अनिल रतुड़ी (IPS-DGP), भूपेन्द्र कौर (IAS-सचिव)-एपी अंशुमन (IPS-IG), रविनाथ रमन (IAS-आयुक्त)-विम्मी सचदेवा (IPS) ऐसे दंपत्ति हैं, जो अलग-अलग काडर से हैं।

पहले भी सुनील कुमार मुट्टू (IAS-अपर मुख्य सचिव) ऐसे नौकरशाह रहे, जिनकी पत्नी IPS थीं। ऐसे में दोनों काडर में विवाह संबंध भी रहने के कारण उत्तराखंड में दोनों काडर में रिश्ते तल्ख नहीं रहे। ये बात अलग है कि जो नौकरशाह खुद को सर्वोच्च मानते हैं, वे अन्य काडर को समकक्ष स्वीकार करने को राजी नहीं हैं। ऐसे में ज़्यादातर अनाधिकारिक तौर पर IAS Week के दौरान IPS को भी मिलाने की सोच से इत्तफाक नहीं रख रहे हैं। उनके मुताबिक कल IFS फिर PCS भी यही प्रस्ताव रखने लग जाएंगे। IAS को अन्य काडर से जुदा ही रखना ठीक है। रिश्ते भले अच्छे रखे जाएँ।

IAS काडर पर हावी होने या फिर खुद को मजबूत करने की कोशिश IPS अफसर करते रहे हैं। उत्तराखंड पुलिस एक्ट में IAS की अहमियत कम की गई। शासन में अपर सचिव स्तर पर IPS काडर ने प्रवेश किया। IAS काडर में शामिल IG-जेल और निदेशक (ITDA) भी IPS के हवाले हो चुके हैं। CRPF के कमांडेंट, IFS (विदेश सेवा), IDAS और ITS भी सचिव बन चुके हैं। IFS तो अपर सचिव बनते रहे हैं, लेकिन अशोक पै तो प्रमुख सचिव भी बन गए। एक और IFS RBS Rawat को अपर मुख्य सचिव बनाने की भी कवायद चल पड़ी थी। जो बाद में थम गई।

अपर सचिव पद पर तो सचिवालय सेवा के प्रशासनिक और निजी सचिव काडर तक के लोग भी पहुँच चुके हैं। वे समीक्षा अधिकारी (पहले के UDC) और PS काडर से आते हैं। इसको IAS अफसरों और काडर की कमजोरी माना जा रहा है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में बाकी काडर के घुसपैठ के बावजूद कुछ नहीं कर पा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह IAS काडर में ही आपसी विभाजन-मतभेद-एकता की कमी मानी जा रही है। उत्तराखंड-गैर उत्तराखंड, UP-बिहार-अन्य तथा दक्षिण भारतीय-अन्य में IAS काडर भीतर ही भीतर बंटा हुआ है। इससे भी ये काडर अपनी शक्ति को कायम नहीं रख पाया है।

जिस तरह IAS काडर कमजोर हुआ है, उससे Week को ले कर भी IAS अफसरों में उत्साह कम हुआ है। एक नौकरशाह के मुताबिक Week अपनी अहमियत खो रहा है। कभी इसमें बहुत अहम फैसले होते थे, नहीं तो प्रासंगिक विचार-विमर्श होते थे। वरिष्ठों को आगे आ के काडर के सम्मान और अहमियत को बचाने की कोशिश करनी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here