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उर्दू अनुवादक:सरकार का आया जवाब-भर्ती रेकॉर्ड ही नहीं हैं

जबर्दस्त फर्जीवाड़ा, एक साल के लिए थे,ढाई दशक गुजर गए

आबकारी इंस्पेक्टर तक बन गए,पुलिस, अन्य महकमों में भी हैं कई

Chetan Gurung

उत्तराखंड में आबकारी और पुलिस समेत कई महकमों में नौकरी कर रहे कई उर्दू अनुवादकों की नियुक्तियों पर सरकार का जवाब आ गया है। हमारे पास कोई रेकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ये नियुक्तियाँ उत्तर प्रदेश की मुलायम सरकार ने एक साल के लिए भरण-पोषण के नाम पर की थी। साल तो ढाई दशक पहले ही खत्म हो गया, लेकिन नौकरियाँ बादस्तूर जारी रही। ये उर्दू अनुवादक कम कनिष्ठ सहायक सरकार की ढिलाई या फिर मिलीभगत से न सिर्फ आज तक नौकरियों में कायम हैं, बल्कि स्थायी कर्मचारियों की तरह प्रोन्नति भी पाते चले गए। आबकारी महकमे में तो इंस्पेक्टर तक बन गए। ऐसा ही रहा तो सहायक आयुक्त बनने में भी देरी नहीं।

उर्दू अनुवादकों की फर्जी नियुक्तियों का मामला आबकारी महकमे से निकल के सामने आया। देहरादून के वकील विकेश सिंह नेगी ने इसकी मुहिम शुरू की। इसके बाद धीरे-धीरे खुलासा होता गया कि इसमें क्या-क्या खेल हुए। उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो उर्दू अनुवादक यहाँ भी सैकड़ों की तादाद में थे। धीरे-धीरे कई रिटायर भी हो गए।

इस मामले में हैरानी इस बात पर है कि उर्दू अनुवादक कम कनिष्ठ सहायकों की ये नियुक्ति 1995 में जब की गई थी तो बुंदेलखंड के साथ ही गढ़वाल-कुमाऊँ को भी इसमें आच्छादित नहीं किया गया था। इसके बावजूद यहाँ सैकड़ों उर्दू अनुवादक उस वक्त रख दिए गए।

इससे भी बड़ा घोटाला ये रहा कि साल गुजर गया तो भी उनको हटाया नहीं गया। इसके विपरीत हुआ ये कि उनको स्थायी कर्मचारी सरीखे सुविधाओं से सज्जित किया गया। कुछ कर्मचारियों के बारे में ये जरूर पता चला कि उन्होंने बाद में नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल हो के स्थायी दर्जा हासिल कर लिया था। ऐसे लोग अंगुली पर गिने जा सकते हैं। RTI में मिले सरकार के कार्मिक विभाग ने विकेश को जवाब दिया है कि उसके पास उर्दू अनुवादकों की नियुक्तियों से संबन्धित कोई रेकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ये नियुक्तियाँ उत्तर प्रदेश सरकार ने की थीं। वहीं से जानकारी इस बाबत ली जा सकती है।

ताज्जुब की बात ये है कि राज्य गठन के दो दशक गुजर जाने के बावजूद सरकार (काँग्रेस-बीजेपी दोनों) इतने अहम और बड़े घोटाले से जुड़े मामले के बारे में न तो जान सकी, न ही आज भी जानने और कुछ कदम उठाने को राजी दिख रही। मामला जानकारी में आने के बावजूद वह ठंडी ऐसी दिख रही, मानो वह खुद नहीं चाहती कि इन फर्जी नियुक्ति धारकों के साथ कोई दंडात्मक कार्रवाई हो। विकेश ने खास तौर पर आबकारी महकमे को निशाने पर रखा है।

उन्होंने महकमे के दो इंस्पेक्टरों सुज़आत हुसैन और संजय रावत के बारे में प्रधानमंत्री तक को शिकायत की है। रावत की शिकायत आय से अधिक संपत्ति के बारे में है, लेकिन सुज़आत उर्दू अनुवादक हैं। विकेश ने दोनों की अकूत संपत्ति और रहन-सहन की शिकायत PMO को की है। राहिबा इकबाल भी उर्दू अनुवादक भर्ती हुई थी। वह भी अल्मोड़ा में आबकारी इंस्पेक्टर है। विकेश ने उर्दू अनुवादकों की नियुक्तियों का रेकॉर्ड भी RTI में मुख्य सचिव कार्यालय से मांगा। मुख्य सचिव कार्यालय ने इसकी सूचना का जिम्मा कार्मिक विभाग को सौंपा। वहाँ से जवाब आया कि सरकार के पास इस बारे में कोई रेकॉर्ड ही नहीं है। यूपी जाएँ। उत्तर प्रदेश सरकार ने 28 फरवरी 1996 को सुज़आत की सेवा समाप्त कर दी थी। इसका प्रमाण मौजूद है।

विकेश के मुताबिक इतना सब कुछ होने के बावजूद सुज़आत पर उत्तराखंड सरकार की दरियादिली और जबर्दस्त नजरें इनायत उस पर शक जताने के लिए बाध्य करती है। मौजूदा त्रिवेन्द्र सरकार ने कई इंजीनियरों और कर्मचारियों को कम गंभीर मामलों में दंडित किया है। बस आबकारी महकमें में वह लाचार या फिर मिली हुई नजर आती है।

सरकार परीक्षण कराएं तो आज भी सैकड़ों उर्दू अनुवादक भर्ती हुए लोग पुलिस समेत कई महकमों में बड़े और स्थायी पदों पर नौकरी करते हुए मिल जाएंगे।

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