दिल्ली चुनाव के बाद दबाव में या खुली आँख?

एक के बाद एक उठा रहे अहम कदम

शराब सिंडिकेट्स को हिला डाला

क्या अब मंत्रिपरिषद विस्तार की बारी?

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को कुर्सी से हटाने की कोरोना Virus की तरह फैली अफवाह दम तोड़ चुकी है। इससे लेकिन त्रिवेन्द्र ने लगता है अहम सबक ले लिए हैं। उन्होंने एक के बाद एक कई बड़े कदम बदलाव दर्शाने वाले उठाए हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में BJP की एक और शर्मनाक शिकस्त के बाद आए ये फैसले क्या इंगित कर रहे? क्या त्रिवेन्द्र वाकई जान चुके हैं कि अब कुछ बड़ा-नया करने की जरूरत है? या फिर वह भारी दबाव से निकलने की कोशिश कर रहे हैं?

त्रिवेन्द्र ने दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद जो बड़े फैसले किए, उन पर एक नजर। अपने सलाहकार के तौर पर डॉ. राकेश कुमार की नियुक्ति की। आबकारी नीति में माफिया तंत्र को नाराज कर के भी कई सख्त प्रावधान। विधानसभा में बैठने और मंत्रियों को भी बैठने के लिए आदेश करना। पार्टी के लोगों को सरकार में दायित्व सौंपे गए। अब ये आसार भी दिख रहे हैं कि वह मंत्रिपरिषद में विस्तार करेंगे।

पार्टी में त्रिवेन्द्र विरोधी कई हैं। ये कोई ढँकी-छुपी बात नहीं है। उनकी गिद्ध निगाहें लंबे समय से उनकी कुर्सी पर है। वे ऐसा कोई मौका गंवाना नहीं चाहते, जो सत्ता पलट में मुफीद साबित हो। इनमें कई दिल्ली में भी पैठ रखते हैं। उत्तराखंड में उनकी जड़ें मजबूत हुआ करती थीं। अब भले कमजोर हो गई हैं। इसके बावजूद उनका मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब उफान पर है। पिछले दिनों जब सल्तनत के मुखिया बदलने की बयार में तेजी आई तो इसको पंखा झलने में सबसे ज्यादा सक्रिय उनके चेले ही थे।

अपने खिलाफ चल रही रणनीति से त्रिवेन्द्र वाकिफ न हो, ये नामुमकिन है। उनको भी सारी खबर सत्ता के सूत्रों के साथ ही संगठन में आला कमान में बैठे हितचिंतकों के जरिये हासिल होती रहती है। ऐसा लग रहा है कि आकाओं ने भी उनको कुछ नए बदलाव के साथ कामकाज-राजकाज करने का ईशारा किया है। जो दिखने भी लगा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में पूरी BJP के फुंक जाने के बावजूद जैसी दुर्गति अरविंद केजरीवाल ने मुख्य विपक्षी दल की कर दी, उससे त्रिवेन्द्र ने भी सबक ले लिया है। वह समझ गए हैं। काम ही जितवाएगा।

यह झलकने लगा है। विधानसभा को उन्होंने फिर गुलजार करने का फैसला किया है। एनडी तिवाड़ी राज के बाद विधानसभा में हमेशा श्मशान घाट वाली मुर्दनगी ही दिखी है। सिवाय विधानसभा सत्र काल को छोड़ के। विधानसभा बैठने की मजबूरी पहले न होने के चलते मंत्री देहरादून आते ही नहीं थे। कभी आ भी गए तो अपने सरकारी आवास से ही काम करते रहे हैं। दफ्तरी संस्कृति और अनुशासन इसके चलते खत्म हो गया। मंत्री लोग अपनी विधानसभा में ही व्यस्त रहते रहे हैं।

मुख्यमंत्री के बैठना शुरू होने से मंत्रियों पर भी विधानसभा में बैठने का दबाव-मजबूरी हो गई है। सरकार तक लोगों की पहुँच इससे आसान तो हुई है। सरकार में नौकरशाही के ढंग से काम न करने के साथ ही मनमौजी-तानाशाह हो जाने के भी खूब आरोप लगते रहे हैं। ये भी कहा जाता रहा है कि नौकरशाही बेलगाम हो चुकी है। मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह के रिटायरमेंट मोड में दिखने और उनकी सरलता का नाजायज फायदा मातहत ले रहे हैं।

डॉ. राकेश कुमार को अपना सलाहकार नियुक्त कर त्रिवेन्द्र ने इस दिशा में लगता है गंभीरता दिखाई है। 1992 बैच के इन नौकरशाह की IAS से VRS की जिस फ़ाइल को मुख्यमंत्री ने मंजूरी दी, उसी फ़ाइल में उन्होंने उनको अपना सलाहकार नियुक्त करने का भी फैसला-अनुमोदन दे दिया। डॉ. राकेश की बतौर नौकरशाह सख्त टास्क मास्टर वाली प्रतिष्ठा रही है। छवि के मामले में भी वह काफी ऊंचे रहे। वह किस कदर नौकरशाही को काबू में कर के काम कराने में सफल रहते हैं, ये देखने वाली बात होगी।

अहम बात ये भी होगी कि क्या मुख्यमंत्री खुद उनकी सलाह पर भरपूर अमल करेंगे? संगठन के लोगों को सरकार में दायित्व दे कर त्रिवेन्द्र ने उस मोर्चे पर भी नियंत्रण पाने की कोशिश की है। ये भी संभावना दिख रही है कि वह जल्दी ही मंत्रिपरिषद विस्तार को भी अंजाम दे देने वाले हैं। इससे पार्टी में उनसे असंतुष्ट रहने वाले सुर खामोश या फिर धीमे पड़ सकते हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत खुल के कह रहे हैं-मंत्रिपरिषद विस्तार होने वाला है। एक और बड़ा फैसला मुख्यमंत्री ने नई आबकारी नीति में माफिया तंत्र पर जबर्दस्त प्रहार कर के किया है। सालों बाद ऐसी नीति आई है, जिसने माफिया-शराब सिंडीकेट में बुरी तरह खलबली-हलचल मचा डाली है। वे नीति में संशोधन के लिए सरकार पर हर मुमकिन दबाव डलवाने की कोशिश कर रहे हैं।

शराब सस्ती होने से UP-HP-HARYANA-Punjab के सिंडिकेट्स तकरीबन हिल गए हैं। इस नीति से उनकी उत्तराखंड में तस्करी को गहरी चोट पहुंची है। उत्तराखंड की सरहद से लगी UP की दुकानों का बंद होना भी तय हो गया है। UP में उत्तराखंड से शराब महंगी हो गई है। इसका फायदा उत्तराखंड को मिलेगा। त्रिवेन्द्र क्या शराब माफिया के दबाव में आते हैं? या फिर वह मौजूदा नीति पर डटे रहते हैं? ये देखने वाली बात होगी। इतना सब कर के अब त्रिवेन्द्र वाकई पूरी तरह सुरक्षित हो गए हैं? या फिर सिर्फ कुछ और मोहलत ले पाए हैं? आने वाले कुछ महीने इसको साफ कर देंगे।

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