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महफिल लूट गए त्रिवेन्द्र, गैरसैण अब ग्रीष्मकालीन राजधानी

सिर्फ सियासी ड्रामा न बन के रह जाए ऐलान,फौरन काम भी शुरू हो

तो देहरादून से ही चलेगी ज़्यादातर समय सरकार

सुधार की कोशिश में जुटे मुख्यमंत्री का एक और अहम कदम  

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर सुस्त और बहुत वक्त ले कर फैसला करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं, पर इन दिनों उन्होंने नया अवतार दिखाने का लगता है संकल्प लिया हुआ है। पिछले कुछ हफ्तों से वह लगातार अहम कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठा के सभी को चौंका रहे थे। भराड़ीसैण में बुधवार को ये ऐलान कर उन्होंने एक बार फिर सभी को हैरान कर दिया कि गैरसैण गर्मियों में उत्तराखंड की राजधानी होगी। समझा जा रहा है कि आने वाले सालों में वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में स्थाई राजधानी भी ले जाने पर फैसला कर सकते हैं।

हाल ही में शराब माफियाओं और आबकारी महकमे के अफसरों को ठिकाने लगा के त्रिवेन्द्र ने सुर्खियां बटोरी हैं। अब गैरसैण पर उनका अहम ऐलान मायने रखता है। ये उत्तराखंड के पहाड़ी जनमानस से जुड़ा और उसको बहुत करीब से भीतर तक जा के स्पर्श करने वाला भावनात्मक-सियासी मुद्दा है। त्रिवेन्द्र की छवि एक जिद्दी मुख्यमंत्री की भी है। वह जो ठान लेते हैं, उस पर न तो पीछे हटने को जल्दी राजी होते हैं न ही बदलने को। गैरसैण में गर्मियों के मौसम में राजधानी ले जाने का उनका फैसला न तो टल सकता है न ही बदलेगा, ये माना जा रहा है।

विधानसभा के बजट सत्र के दौरान त्रिवेन्द्र का ऐलान सियासी नजरिए से बीजेपी के साथ ही खुद उनको भी बहुत मजबूती दे सकता है। मुख्यमंत्री ने आज राज्य के 53 हजार करोड़ के करीब का बजट पेश किया। फिर गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का ऐलान किया तो सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग नई नहीं है। पिछली सदी के अंतिम दशक के मध्य में तब कौशिक समिति (मुलायम सरकार के मंत्री हुआ करे थे, रमाशंकर कौशिक) ने अलग राज्य के साथ ही राजधानी भी सुझाई थी।

उन्होंने राजधानी के तौर पर गैरसैण की सिफ़ारिश की थी। साल 2000 के नवंबर शुरुआत में उत्तरांचल (तब यही नाम था) राज्य बना तो इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस वीरेंद्र दीक्षित को स्थाई राजधानी के लिए नाम सुझाने का जिम्मा दे दिया गया। एकल सदस्य वाले दीक्षित आयोग ने साल 2008 में रिपोर्ट उस वक्त के मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी को सौंपी थी। काँग्रेस-बीजेपी ने बारी-बारी से सरकार बना ली। राजधानी पर फैसला लटका ही रहा।

मुख्यमंत्री को ऐलान के साथ ही गैरसैण में बिना देरी किए बुनियादी सुविधाओं पर भी काम शुरू कर देना चाहिए। बजट का बंदोबस्त और प्रावधान मौजूदा बजट में कर दिया जाता तो बेहतर होता। इससे सरकार की मंशा में अधिक ईमानदारी झलकती। एक अहम सवाल ये भी उठता है कि अगर गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाया जाए तो क्या वह इसके दबाव को झेल सकता है? इसका जवाब विशेषज्ञ नहीं में देते हैं।

उनके मुताबिक गैरसैण में बुनियादी सुविधाएं विकसित करने के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध ही नहीं है। साथ ही पहाड़ स्थाई राजधानी का दबाव भी नहीं झेल सकेगा। स्थानीय संस्कृति भी दूषित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। राजधानी बनाने से पहले अफसरों-कर्मचारियों के रहने के लिए आवास और दफ्तरों का निर्माण करना होगा। इसके साथ ही पीने के पानी, बिजली, सड़कें, परिवहन, अच्छे स्कूल, खेल स्टेडियम, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं, बेहतर संचार सुविधाएं विकसित करना जरूरी है।

इसमें 50 हजार करोड़ तक का खर्च आने की संभावना जताई जाती है। ये बहुत बड़ी राशि है। अभी तक काँग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने राजधानी के मुद्दे पर सिर्फ गैरसैण-गैरसैण ही किया। अब इस शहर को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए का ऐलान कर त्रिवेन्द्र काफी हद तक श्रेय लूट ले गए। हकीकत ये है कि गर्मियों में भी राजधानी को गैरसैण ले जाना बहुत ही चुनौतीभरा होगा। कम से कम तीन महीने वहाँ से सरकार चलाना कोई हंसी खेल नहीं होगा।

गैरसैण को ले कर सरकार वाकई ईमानदार है तो राजधानी ले जाने के लिए एक निश्चित समयसीमा तय की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री को ये भी बता देना चाहिए कि इतनी अवधि में या फलां साल में गर्मियों के दौरान राजधानी गैरसैण स्थानांतरित कर दी जाएगी। ये भी साफ हो गया कि देहरादून शीत या बाकी कालीन राजधानी बनी रहेगी।

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