Home उत्तराखंड देहरादून शराब महकमा:सुनामी आई, फिर भी बच गए 2 DEO-2 इंस्पेक्टर

शराब महकमा:सुनामी आई, फिर भी बच गए 2 DEO-2 इंस्पेक्टर

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CM के क्रोध से दिग्गज भस्म,त्रिपाठी-सुजआत-संजय कैसे बचे?

जिन मँझले-छुटकों को गुरूर था, उनको जमीन सुँघाई

सरकार को नाकाम करने में जुटी किनारे की गई लॉबी

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के शायद कान पक चुके थे। खास लॉबी की सुनियोजित साजिश-लापरवाही से सरकारी खजाने को अरबों के घाटे से ठान चुके थे कि सफाई करनी है। गज़ब की बात ये कि तकरीबन 90 फीसदी सफाई कर भी दी। बड़े-बड़े फन्ने खां-दिग्गज उनके कोप-क्रोध में भस्म हो गए। उनको ठिकाने लगा दिया, जो ये कहते नहीं अघाया करते थे, `शराब की दुनिया में अगर कोई भगवान है तो हम ही हैं’। ऐसे में दो दागी DEO और दो इंस्पेक्टर का बच जाना, सातवाँ अजूबा नहीं तो क्या है।

सरकार को हाथ रोकने के लिए मजबूर करने वाले ये DEO अल्मोड़ा के दुर्गेश्वर त्रिपाठी और नैनीताल के राजीव हैं। इंस्पेक्टर द्वय हैं-सुजआत हुसैन और संजय रावत। त्रिपाठी और सुजआत ने तो सरकार को जो चूना लगाया और जैसी भद पिटवाई है, उसके चलते उन पर सरकार की मेहरबानी सिर्फ और सिर्फ हैरान करती है। त्रिपाठी का बच जाना कुछ वैसा ही है, जैसे केदार आपदा में लोगों का बच के निकल आना।

त्रिपाठी जब नैनीताल में DEO थे, तब उन पर सरकार को छह करोड़ के करीब का राजस्व घाटा पहुंचाने का श्रेय चिपका। ये ऐसा मामला था कि निलंबन तो फौरी तौर पर होता है। PWD में ही देखो। इससे कहीं छोटे-छोटे मामलों में कितने बड़े-बड़े इंजीनियर नाप दिए गए। त्रिपाठी को सिर्फ नैनीताल से हटाया गया। बगल के अल्मोड़ा में उसी कुर्सी पर बिठा दिया गया। ये ऐसा केस है, जो मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस का मज़ाक उड़वाता है।

ये कैसे मुमकिन है कि दागी पर न तो कार्रवाई हो, न अहम पोस्टिंग से ही महरूम रखा जाए। त्रिवेन्द्र राज में ये हुआ लेकिन। नैनीताल के DEO राजीव को भी उसी लॉबी का अहम किरदार समझा जाता है, जिस पर मुख्यमंत्री का प्रकोप बरसा है। त्रिपाठी और राजीव की भी छुट्टी होने की पूरी संभावना थी। दोनों का बच जाना हैरानी पैदा कर रहा है तो स्वाभाविक है।

त्रिवेन्द्र ने शराब महकमे में तकरीबन 90 फीसदी सफाया कर डाला है। कई मठाधीशों को उन्होंने औकात दिखाई। वाहवाही लूटी। फिर त्रिपाठी-राजीव कैसे और क्यों बचे? वैसे कहा तो अंदरखाने ये भी जा रहा है कि दोनों बचे नहीं हैं। उनका नंबर आ रहा है। इंस्पेक्टरों में देहरादून में तैनात सुजआत को भी नाप दी गई लॉबी के शार्प शूटरों में शुमार किया जाता था।

उनके खिलाफ खुद सरकार ने हाई कोर्ट में लिख कर दिया है। उनकी सेवा एक साल के लिए थी। 1995 में। 1996 में खत्म हो गई है सेवा। उर्दू अनुवादक आए थे। भरण-पोषण के लिए उस वक्त की यूपी सरकार (तब मुलायम-सपा) ने रखा था। एक साल के लिए। गज़ब ये है कि न सिर्फ उनकी नौकरी बची रही, बल्कि ऐसा जुगाड़ किया कि इंस्पेक्टर भी बन गए।

इतना काफी नहीं। देहरादून में अहम सेक्टर-2 ले डाला। जो बेहद मलाईदार समझा जाता है। पिछली पैदल कर दी गई लॉबी के वह सबसे खास और मस्तिष्क में शुमार होते थे। इतना होने और सरकार के सामने हाई कोर्ट में फजीहत के बावजूद सुजआत को अभी तक बर्खास्त न किया जाना। उनके खिलाफ कोई वैधानिक कार्रवाई न करना ताज्जुब पैदा तो करता ही है, शासन तक की व्यवस्था की पोल खोलती है।

संजय रावत भी पिछली लॉबी के बेहद विश्वासपात्र लोगों में शुमार थे। उनका सिक्का ऐसा चलता था कि देहरादून में शास्त्री नगर की बड़ी और मलाईदार दुकान उन्होंने अपने सेक्टर-1में करवा ली। ये दुकान नियमों के मुताबिक ऋषिकेश सेक्टर का हिस्सा है। संजय के बारे में सोचा जा रहा था कि वह भी मुख्यमंत्री के पूरे घर के बदल डालूँगा नीति में फंसेंगे। वह अभी तक सेक्टर इंस्पेक्टर बरकरार है। वक्त की नजाकत देख वह मौजूदा असरदार लॉबी के घर में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे। ये बताने वाली बात है कि बंदा 3 साल से धूनी जमाए एक ही सेक्टर में है। अब वहीं विस्तार की कोशिश कर रहा।

मुख्यमंत्री रावत के आग्नेय नेत्र सरकार को बदनाम करने वालों-बचे-खुचों को कब भस्म करते हैं, इस पर सभी की नजरें हैं। इस बीच सरगोशियाँ ये है कि किनारे कर दी गई लॉबी सरकार को नई आबकारी नीति में नाकाम करने की साजिश रच रही। वे इस साजिश में हैं कि दुकानों को चढ़वाने में सरकार नाकामयाब हों। उसको लगता है कि सरकार को दुकानें चढ़वाने में शुरू में ही असफलता हाथ लगती है तो उनकी महत्ता के बारे में ब्रांडिंग के लिए उनके आका लोग तैयार हैं।

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