बोर्ड के ग्लैमर भरे ओहदे से हटे या हटाए गए?

6 वोट खराब गए, पुलिस के साए में पहला ही चुनाव

वर्मा-शुक्ला लॉबी में सेंध लगा गए युवा संजय गुसाईं

Chetan Gurung  

हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया में बोर्ड ऑफ क्रिकेट फॉर कंट्रोल इन इंडिया (BCCI) का डंका है। इसके छोटे से ओहदेदार की भी दुनिया में कद्र है। आज जब बोर्ड उपाध्यक्ष माहिम वर्मा क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (CaU) के सचिव के चुनाव में जीते तो कईयों की जुबान पर ये सवाल था। एक सवाल ये भी था कि क्या वह स्वेच्छा से बोर्ड उपाध्यक्ष की कुर्सी से हट रहे या फिर हटा दिए गए हैं? 15 दिनों के भीतर उनको अब उपाध्यक्ष का ओहदा तजना होगा।

बोर्ड उपाध्यक्ष के सामने CaU सचिव के हैसियत और ओहदे को कुछ यूं समझे। मान लो कि देश के उपराष्ट्रपति को उत्तराखंड में राज्य मंत्री बना दिया गया हो। माहिम ने 52 में से 32 वोट पाए। संजय गुसाईं को 14 मिले। बाकी वोट चुनाव अधिकारी सुबर्द्धन ने अवैध घोषित कर दिए। बोर्ड उपाध्यक्ष के नाते माहिम के पास पूरे देश का भ्रमण कर क्रिकेट के विकास और प्रोत्साहन का अहम जिम्मा था। शानदार प्रोटोकॉल हासिल था। दुनिया घूमने और देश के नामचीन लोगों के साथ उठने बैठने का अवसर था।

CaU सचिव की हैसियत राज्य के किसी भी अन्य खेल संघ के सचिव से अलग नहीं है। खास बात ये है कि माहिम के पास BCCI के कार्यकारी अध्यक्ष बन कर इतिहास रचने का भी सुनहरा अवसर था। सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलती है तो बोर्ड अध्यक्ष सौरव गांगुली और सचिव जय शाह को जुलाई में कुर्सी छोड़नी ही होगी। ऐसे में नया अध्यक्ष आने तक उपाध्यक्ष के नाते माहिम के पास कार्यकारी अध्यक्ष बनने का पूरा मौका था।

कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर वह देश के साथ ही उत्तराखंड क्रिकेट से जुड़े कई अहम और बड़े फैसले करने की स्थिति में होते। CaU सचिव बन जाने के बाद उनकी दशा और हैसियत एकदम सामान्य राज्य खेल संघ सचिव की हो गई है। माहिम को इन सभी के बारे में अच्छी तरह जानकारी है। इसके बावजूद उनका CaU सचिव बनने को सिर्फ उनकी मजबूरी और बाध्यता माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक उनको कह दिया गया था कि वह उत्तराखंड क्रिकेट की सियासत में लौटें। BCCI में उनके लिए दरवाजे बंद करने का फैसला हो गया है।

इसकी बहुत बड़ी वजह है। माहिम का उत्तराखंड में बहुत ज्यादा विवादों में घिरना, तमाम गंभीर आरोप लगना और BCCI ओहदेदार के लिए कोई पृष्ठ भूमि न होना इसमें शामिल हैं। पिछले BCCI उपाध्यक्ष खुद माहिम के आका कहे जाने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री और मीडिया हाउस मालिक राजीव शुक्ला थे। माहिम उपनल कर्मचारी थे। जो आउट सोर्स एजेंसी है। ठेकों में कंपनियों और महकमों को कार्मिक आपूर्ति करता है। माहिम भी आउट सोर्स कर्मी थे। ये बात अलग है कि उन्होंने खुद को सरकार के दस्तावेजों में राजपत्रित अधिकारी बताया।

माहिम को जब बोर्ड में शुक्ला के डमी के तौर पर उपाध्यक्ष बनाया गया था, तो किसी को उनकी पृष्ठभूमि के बारे में अंदाज नहीं था। `Newsspace’ की रिपोर्ट्स से ही खुलासा हुआ। इसके बाद ही तीन महीने में ही उनको हटाने का फैसला हो गया। इतना कम कार्यकाल शायद ही किसी बोर्ड उपाध्यक्ष का कभी रहा। माहिम के लिए CaU सचिव के तौर पर कार्य करना वैसे भी चुनौतीपूर्ण रहेगा।

उपाध्यक्ष संजय रावत, कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी और संयुक्त सचिव अवनीश वर्मा विरोधी लॉबी से हैं। इस बात की गुंजाइश शून्य है कि कोई भी फैसला वह अकेले खुद की मर्जी से लागू करवा पाएंगे। जैसा पहले सचिव रहने के दौरान हुआ था। अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला भले माहिम के हक में समझे जाते हैं, लेकिन एपेक्स काउंसिल और कार्यकारिणी बैठक में मनमानी भरे फैसले वह भी अब शायद ही कर पाएंगे।

दिलचस्प पहलू ये है कि जिस सचिव की कुर्सी के लिए आज चुनाव हुए, उस कुर्सी को BCCI उपाध्यक्ष बनाए जाने पर खुद माहिम ने चंद महीने पहले खाली किया था। उसी कुर्सी पर वह आज लौट आए। उसी तरह जैसे, कक्षा छह में बैठ चुके बच्चे को कुछ महीने बाद खराब प्रदर्शन पर वापिस कक्षा पाँच में भेज दिया गया हो। इस लंबी कहानी को एक लाइन में बोला हो तो-माहिम जीत के भी हार गए। ये बात भी जिक्र लायक है कि CaU सचिव का पहला ही चुनाव बुरे और तनाव भरे माहौल में हुआ।

पुलिस के साए में मतदान कराने के लिए चुनाव अधिकारी को मजबूर होना पड़ा। किसी भी खेल संघ चुनाव में ऐसा आज तक नहीं हुआ। खेल मंत्री अरविंद पांडे भी चुनावी माहौल का जायजा लेने CaU के कॉन्वेंट रोड दफ्तर में पहुंचे। चुनाव में माहिम की जीत की वजह वोटर लिस्ट में घर-परिवार लोगों और दोस्तों के ही नाम होने को मुख्य रूप से माना जा रहा है।

यूपी-शुक्ला लॉबी का वोटरों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाना तथा गुसाईं का अनुभवहीन व नया होना भी कारण रहा। शुक्ला के लिए ये चुनाव निजी प्रतिष्ठा का सवाल था। माहिम उनका ही डमी प्रत्याशी अब CaU में रहेगा। इसके बावजूद गुसाईं का 14 वोट ले जाना वर्मा लॉबी के लिए आने वाले दिनों में जबर्दस्त चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

इस चुनाव में ये भी साफ हो गया कि क्रिकेट सुल्तान हीरा सिंह बिष्ट अब अपनी पकड़ CaU और चेलों पर खो चुके हैं। माहिम और PC वर्मा को दशकों तक उन्होंने ही पाल-पोस के आगे बढ़ाया था। जब उनके बेटे सिद्धार्थ के लिए कुर्बानी देने का मौका वर्मा पिता-पुत्र पर आया तो वे ऐंठ गए। पीसी अपने बेटे का नाम वापिस लेने नहीं माने।

बिष्ट ने बेटे का नाम वापिस लिया। गुसाईं को समर्थन दिया था। अगली लड़ाई अब इस पर होगी कि BCCI चुनाव में वोट का अधिकार एपेक्स काउंसिल किसको देती है? माहिम को या फिर अध्यक्ष गुनसोला या अन्य को? ताज्जुब की बात ये भी कि माहिम के CaU चुनाव जीतने पर उनके समर्थक जबर्दस्त खुश दिख रहे। उनकी खुशी से लग रहा था मानो CaU सचिव की कुर्सी बोर्ड उपाध्यक्ष से बड़ी है, या फिर खाली आदमी को काम और ओहदा मिल गया।

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