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प्रभात टॉकीज:किस्सों और प्रेम कहानियों का घोंसला

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कभी राज कपूर-शम्मी कपूर और बड़जात्या का पसंदीदा होता था

नौकरशाही की जिद से खत्म हुआ शानदार इतिहास

The Corner View

Chetan Gurung

1947, यानि जिस साल देश आजाद हुआ था। उसी साल शहर के एक एक सँकरे से लेकिन Indian Military Academy और सेना की छावनियों की तरफ जाने वाली सड़क (चकराता रोड) के किनारे एक सिनेमा हाल का निर्माण हुआ। नाम तो अब किसी को याद नहीं, लेकिन किसी मुस्लिम कारोबारी ने इसका निर्माण किया था। चंद साल बाद ही देहरादून के खानदानी रईसों में शुमार सेठ त्रिलोकचंद नागलिया ने इसको खरीद लिया। नाम दिया-`Prabhat’..जल्द ही ये सिनेमाघर चाय, चूना और चावल के साथ ही देहरादून की प्रमुख पहचानों में से एक हो गया। बंबई (आज के मुंबई) फिल्म उद्योग के दिग्गजों में बहुत कम ऐसे थे, जो प्रभात से वाकिफ न हों। मल्टीप्लेक्स का दौर हावी होने से पहले तक प्रभात न सिर्फ शहर के रईसों और रसूख वालों का पसंदीदा था, बल्कि आज के कई बुजुर्ग-प्रौढ़ की प्रेम कहानियाँ-रोमांस के अनुभव इस थियेटर से किसी न किसी तरह जुड़े हैं। आज इसकी चर्चा इसलिए हो रही कि देहरादून का ये `ICON’ अब इतिहास की गोद में समा गया है। इसके मालिक दीपक नागलिया ने नौकरशाही की उपेक्षा और नियमों के प्रहार से आजिज़ आ के प्रभात को सदा के लिए बंद कर दिया है। अब यहाँ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खुलेगा।

प्रभात ने किस कदर और कितनी जल्दी लोकप्रियता अर्जित की थी, इसकी मिसाल के लिए बता दूँ। हिन्दी फिल्मों के महानायक सोहराब मोदी हो या फिर राज कपूर, शम्मी कपूर या फिर बड़जात्या घराना, नागलिया परिवार सदा उनके करीब रहा। इसकी वजह सिर्फ ये थियेटर ही था। जिसकी लोकप्रियता की गूंज बंबई तक पहुँच चुकी थी। दीपक की पत्नी पुनिता के मुताबिक रणधीर कपूर और शम्मी कपूर भी जब देहरादून में पढ़ने के लिए आए तो उनके ससुर स्थानीय अभिभावक रहे। करीना कपूर जब वेल्हम स्कूल में पढ़ रही थी तो उनके पति ही उसके स्थानीय अभिभावक रहे। आज फिल्मों में काम कर रहे देहरादून के कई कलाकारों के अनुभव प्रभात से जुड़े हैं। हिमानी शिवपुरी-श्रुति पवार ने इसको सोशल मीडिया में साझा भी किया है।

उत्तराखंड बनने के बाद भी सालों तक प्रभात का देहरादून सिनेमा जगत में एक छत्र राज रहा। कहानी तब बिगड़ी जब मल्टीप्लेक्स युग आया। उसके बाद पैसे वाले ही नहीं बल्कि निम्न मध्यम तबका भी इससे दूर हो गया। दीपक ने काफी कोशिश की कि बदलते जमाने के साथ कदमताल किया जाए। प्रभात को उन्होंने मल्टीप्लेक्स में तब्दील करने का फैसला किया। सरकार में आवास महकमे और फिर MDDA में जा-जा के जूते घिस गए। प्रभात को मल्टीप्लेक्स में बदलने की उनकी योजना पूरी नहीं हो पाई। मजबूरी में ही इसको बंद करने का फैसला करना पड़ा। दीपक के बेटे तुषार ने `Newsspace’ से कहा-`जब प्रभात को मल्टीप्लेक्स में बदलने की योजना बनाई गई थी, तब नए बाई लॉज नहीं आए थे। इसके बावजूद उनको संभावित बाई लॉज के बहाने लटकाया जाता रहा। कई साल ऐसे ही गुजार दिए। फिर नए बाई लॉज MDDA के आ गए। उसके बाद ये मुमकिन ही नहीं रह गया था कि प्रभात को मल्टीप्लेक्स में तब्दील किया जा सके’।

सरकार में नौकरशाही और लाल फीताशाही की बेहतरीन मिसाल है। प्रभात का बंद होना। ये हाल तब है जब कई नौकरशाह नागलिया खानदान के मित्रों-शुभचिंतकों में थे, हैं। दीपक नागलिया को सचिवालय में प्रभात को ले के परेशान घूमते देखा जा सकता था। पुनिता के मुताबिक देहरादून के प्रतीकों में शुमार `प्रभात टॉकीज’ को बंद करने का फैसला खानदान ने बहुत भारी मन से किया। तुषार के मुताबिक अब इस जगह पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स होगा। मल्टीप्लेक्स युग आने से पहले प्रभात हमेशा ही नंबर-1 थियेटर रहा। बाद में कृष्णा पैलेस, नटराज, न्यू एम्पायर, छायादीप और पायल ने भी अपनी सीटों की तादाद बढ़ाई और सेवा बेहतर की, लेकिन प्रभात से कोई आगे नहीं जा पाया। उसका ताज सिंगल स्क्रीन थियेटर में बरकरार रहा।

वह दौर भी था जब रोमांस में डूबे जोड़े के लिए फिल्म देखने और कुछ हसीन पल साथ गुजारने के लिए प्रभात सबसे बेहतर जगह हुआ करती थी। यहाँ फिल्म देखने की अलग ही शान हुआ करती थी। ईवनिंग या फिर नाइट शो धनाड्य परिवारों का होता था। जिनके पास एम्बेस्डर, फिएट या फिर इम्पाला कार हुआ करती थीं। या फिर ऑटो का खर्च उठा सकते थे। सुपर हिट फिल्मों की बालकनी टिकट हासिल हो पाना बहुत बड़ी जंग जीतना हुआ करता था। इसके लिए DM-SP-जिला मनोरंजन कर अधिकारी या फिर ADM (F-R) तक की सिफ़ारिशें लगा करती थीं। नागलिया खानदान से जिनकी सीधी जान-पहचान होती थी, उनको भले दिक्कत नहीं होती थी।

प्रभात में दो फिल्में मैंने जो देखीं, वे भी कम यादगार नहीं। एक `सनम हरजाई’ का प्रीमियर शो, जिसमें फिल्म की नायिका सिमरन और कई अन्य अहम लोग भी साथ थे। सिमरन और मैं साथ ही बैठे थे। हमने साथ ही डिनर भी किया। सिमरन बाद में कई फिल्मों में आईं। हिट फिल्म `तेरे मेरे सपने’ में वह `आँख मारे ओ लड़की आँख मारे’ गाने में हिट रही थीं। `सनम हरजाई’ चली नहीं लेकिन ये उसकी पहली फिल्म थी। उससे पहले `दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ दो बार देखी। भारतीय फिल्म जगत की कालजयी और शाहरुख खान-काजोल की इस फिल्म को मैं अपनी एक दोस्त के साथ देखने गया था। संयोग था कि बगल में ही खुद हिमानी शिवपुरी और उनके छोटे भाई हिमांशु (ONGC में हैं) भी फिल्म देख रही थीं।

हिमानी खुद भी फिल्म में अहम किरदार में हैं (अनुपम खेर जिन पर लट्टू होते हैं)। जिंदगी में मेरी किसी महिला दोस्त के साथ वह पहली और फिर आखिरी फिल्म थी, जो देखी। दिलचस्प पहलू ये है कि वह दोस्त (एक आंटी की पहल पर हम साथ गए थे) भले मेरे साथ मोटर साइकिल पर गई थीं। साथ फिल्म देखी। फिर होटल में चाइनीज खाया, लेकिन एक शब्द की बातचीत मेरी तरफ से नहीं हुई। सिर्फ उसकी तरफ से भी कुछ बेहद जरूरी शब्द बोले गए। ये भी संयोग है कि इसके बाद हम फिर कभी इस तरह अकेले मिले भी नहीं। इसको आप आज रोमांस न माने, लेकिन अपने लिए ये तब रोमांस से कम नहीं था। प्रभात वाला ये रोमांस भले नहीं पनपा लेकिन कई दोस्तों के रोमांस बाद में शादी तक पहुंचे।

आज भले आप घर बैठे ऑनलाइन टिकट ले रहे, लेकिन वह दौर भी था जब अमिताभ बच्चन की फिल्म लग जाए तो उसका टिकट बिना धक्का-मुक्की, ब्लैक या फिर मार-धाड़ के मिलना नामुमकिन हुआ करता था। `दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ इस परंपरा की आखिरी फिल्म थी। प्रभात के बंद होने से ये सब अब किस्सों-कहानियों में आने वाली पीढ़ी पढ़ती और सुनती रहेंगी। भले उनको यकीन नहीं होगा कि कभी ऐसा भी होता था।

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