सलाहकारों-नौकरशाहों ने कराई फजीहत!

सरकार ठप्प हो गई थी, Corona आपातकाल लागू हो गया था

Chetan Gurung

`Corona’ आपातकाल के कारण जनरल-ओबीसी कर्मचारियों के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। ये फैसला माकूल लेकिन देरी से हुआ। शुरू से ही माना जा रहा था कि प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर सरकार का अड़ियल कदम ठीक नहीं है। गैरसैण में विधानसभा का बजट सत्र भी इस बीच निबट गया। फिर Corona आपातकाल देश भर में लागू हो गया। प्रोन्नति खोलने की मांग पर ले कर बैठे कर्मचारी सरकार के रुख और Corona संकट के बावजूद टस से मस नहीं हुए। आखिरकार अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने प्रोन्नति को रोकने का पुराना शासनादेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही आंदोलनकारी कर्मचारियों की फतह हुई। साथ ही सभी ने एक किस्म से राहत की सांस ली।

मुख्यमंत्री ने बुधवार को अपने राज के तीन साल पूरे होने पर बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईशारा कर दिया था कि वह हड़ताल और कर्मचारियों की मांग पर कुछ सकारात्मक फैसला कर चुके हैं। उनकी मुस्कुराहट इसको बता रही थी। कुछ ही देर बाद शासनादेश जारी कर दिया गया। इसमें साफ लिखा गया है कि प्रोन्नति को स्थगित करने से जुड़े पूर्व के शासनादेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है। इसमें मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह और अपर मुख्य सचिव (कार्मिक) राधा रतुड़ी के दस्तखत से जारी किया गया है।

इस शासनादेश के जारी होते ही जनरल-ओबीसी कर्मचारी खुशी से झूम उठे। दूसरी तरफ शासन और प्रशासन के अफसरों ने भी राहत की सांस ली। हड़ताल के कारण सिर्फ एससी/एसटी कर्मचारी ही दफ्तरों में थे। जिनकी तादाद बेहद कम हैं। इसके कारण कई अहम सरकारी कार्य ही नहीं बल्कि Corona से जुड़े जरूरी शासनादेश तक लटके हुए हैं। अनुभागों में ताले लगे हुए थे। हड़ताल खत्म होने के बाद एक साथ दोनों काम होंगे। दफ्तरों में रौनक लौटेगी। जो हड़ताल के कारण बेनूर हो गई थी। दूसरा प्रोन्नति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

सरकार ने हड़ताली कर्मचारियों को धमकाने के लिए `No Work,No Pay’ का भय भी दिखाया, लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा। उनके नेता दीपक जोशी पर भी कई दबाव डाले गए। वह भी नहीं हिले। पहले भी सरकार ऐसे प्रपंच कर चुकी है। जिसका कोई मतलब कभी नहीं निकला। त्रिवेन्द्र ने जनरल और ओबीसी कर्मचारियों की मांग मान के अपने तीन साल के कार्यकाल का लुत्फ दुगुना किया। साथ ही अब वह Corona आपातकाल का सामना अधिक बेहतर ढंग से लड़ते हुए कर सकेगी।

फिर भी बिला शक कहा जा सकता है कि सरकार ने जनरल और ओबीसी कर्मचारियों की मांग पर फैसला करने में Corona संकट के बावजूद बहुत अधिक वक्त ले लिया। इसके लिए सरकार में अहम कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदार लोगों और सलाहकारों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं कहा था जो समाज और शासन-प्रशासन में बड़ी तादाद में मौजूद जनरल और ओबीसी कर्मचारियों की मांग को सरकार इस कदर लटकाए रखती। संविधान की अनुसूची में भी ऐसा कोई जिक्र नहीं है कि वह प्रोन्नति में आरक्षण को ले कर इस तरह का पसोपेश वाला कदम उठाती।

सरकार के रवैये और हड़ताल से उत्तराखंड की विकास योजनाओं के साथ ही कई अहम फैसले भी लटके रहे। ये किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर सरकार ने इस कदर जिद्दी रुख क्यों अपनाए रखा। या फिर इतने अहम मुद्दे पर फैसला करने में इतना वक्त क्यों लगा? आखिर सरकार की जिद को Corona और हड़ताली कर्मचारियों के संकल्प ने झुका डाला। ये भी हो सकता है कि मुख्यमंत्री अपने 3 साल पूरे होने के उपलक्ष्य पर इसके ऐलान का इंतजार कर रहे थे।

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