27 मई तक विधायक बनना शिवसेना सुप्रीमो की संवैधानिक मजबूरी

राज्यपाल भगत दा विधान परिषद में मनोनीत कर देते हैं तो झंझट खत्म

Chetan Gurung

उत्तराखंड से सैकड़ों किलोमीटर दूर पिथौरागढ़-बागेश्वर के भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र की सियासत और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की तकदीर के विधाता बन गए हैं। उन्होंने अगर उद्धव को विधान परिषद में मनोनीत नहीं किया तो महाराष्ट्र की सियासत में फिर कॉरोना संकट के बावजूद उबाल आना तय है। एक हकीकत ये भी है कि ठाकरे छह महीने का मुख्यमंत्रित्व सुख भोग के गद्दी से विदा हो जाएंगे।

कोश्यारी को कोई भगत दा तो कोई बाबू जी कहते हैं। संघ के प्रचारक-शिशु मंदिर के मास्टर से ले के छाया प्रदेश उत्तरांचल के अध्यक्ष (उत्तराखंड बनने से पहले), विधान परिषद सदस्य, फिर अन्तरिम उत्तरांचल सरकार के मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और अब महाराष्ट्र जैसे हिन्दू सियासत की धुरी राज्य महाराष्ट्र के राज्यपाल की कुर्सी पर बैठना किसी के लिए भी बहुत बड़ी उपलब्धि है।

भगत दा सरीखी खासियत हर किसी में नहीं दिखती है। वह मुँहफट हैं। अपनों से बहुत प्यार-स्नेह करते हैं। उन पर यकीन करने वालों में हैं। हालात जैसे भी विकट हों, न निराश होते हैं न ही हार मानते हैं। बुरे वक्त के जाने-अच्छे वक्त के आने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ते। निचले स्तर के कार्यकर्ताओं-लोगों से उनका आत्मीय रिश्ता कभी जुदा नहीं होता। पार्टी के बड़े लोगों से दबना-डरना फितरत नहीं। सम्मान और डरने-दबने में जो महीन डोर होती है, उसको वह बाखूबी समझते हैं। उसका पालन करते हैं।

किसी भी बड़े नेता के प्रभाव में वह कभी उसके रुतबे के कारण नहीं रहते हैं। उनकी इस खासियत को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जाहिर करने से नहीं चुके। दरअसल वह आज की बीजेपी के कई मौजूदा बड़े नेताओं के सामने विराट छवि रखते हैं। बीच-बीच में उन्होंने आक्रामक रूप पार्टी आलाकमान को भी दिखाए। तब जब उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर नित्यानन्द स्वामी की ताजपोशी की जा रही थी।

फिर जब एक मौका और आया तो 2007 में बीसी खंडूड़ी को अचानक दिल्ली से ला के सीएम बना दिया गया था। ये कोई ढँकी-छिपी बात नहीं कि बीजेपी में दोनों ही कोश्यारी से बहुत जूनियर थे। फिर कोश्यारी को जन नेता की प्रतिष्ठा-छवि हासिल है, वह उनमें नहीं थी। उत्तराखंड के आज के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे आज के केंद्रीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को भी कोश्यारी के ही शिष्यों में शुमार किया जाता था। आज वैसे समीकरण अलग हैं।

कोश्यारी महाराष्ट्र के राज्यपाल तब बनाए गए, जब बीजेपी के लोगों और मीडिया ही नहीं बल्कि आम लोग भी उनकी सियासी जीवन का मरसिया पढ़ने लगे थे। कोश्यारी को राज्यपाल बनाने का मोदी-अमित शाह का फैसला कोई उन पर अहसान करने वाला कदम नहीं था। ये उनकी पार्टी की उस सेवा का नतीजा था, जिसको करने के लिए उस दौर में तब कोई राजी नहीं होता था, जब दो वक्त की रोटी और एक जोड़ सादे कपड़ों का जुगाड़ भी बीजेपी (जनसंघ) में रहते हुए करना टेढ़ी खीर हुआ करती थी।

राज्यपाल होने के बावजूद कोश्यारी के भीतर मौजूद बड़े भाई वाला गुण कहीं भी कम नहीं हुआ है। आज उत्तराखंड का हर शख्स मुंबई जाने और राजभवन का अतिथि बनने का दावा अगर खुल के करता है तो इसकी वजह भगत दा ही हैं। आप उनको आज भी सीधे उनकी निजी फोन नंबर पर कॉल कर सकते हैं। वे खुद फोन उठाएंगे। मेसेज पढ़ेंगे। जवाब भी देंगे। आपको सपरिवार मुंबई आने और घूमने का न्योता देंगे। आपको लगेगा कि क्या महाराष्ट्र के राज्यपाल से ही बात हो रही है?

हमेशा सादे जीवन में खुश रहने वाले, खिचड़ी प्रेमी, खाट पर भी सोने को तैयार रहने वाले ऐसे फक्खड़ राज्यपाल भगत दा (बंशीदार भगत को भी आज कल लोग जाने क्यों भगत दा बोल रहे, जो उत्तराखंड बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं) इन दिनों फिर सियासी-मीडिया सुर्खियों में हैं। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अभी तक न तो विधानसभा और न विधान परिषद के सदस्य हैं। मुख्यमंत्री-मंत्री होने के छह महीने के भीतर विधान मण्डल के एक सदन का सदस्य होना संवैधानिक बाध्यता है। 24 अप्रैल को विधान परिषद के चुनाव होने थे। कॉरोना संकट के कारण चुनाव आयोग ने इसको टाल दिया। अब कब होने, पता नहीं।

परेशान शिवसेना और मुख्यमंत्री ठाकरे चाहते हैं कि राज्यपाल कोश्यारी उनको विधान परिषद में मनोनीत कर दें। कोश्यारी के हाथों में ये है, लेकिन वह कोश्यारी क्यों होंगे, अगर उनकी सियासी चालों-कदमों को कोई इतनी आसानी से बूझ लें। फिलहाल उनका इरादा ठाकरे को मनोनीत करने का नजर नहीं आ रहा है। 27 मई तक उद्धव विधान परिषद में मनोनीत नहीं हो पाते हैं तो उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी जानी तय है। इसके बाद फिर से महाराष्ट्र की सियासत में तूफान नहीं सुनामी आ सकती है।

संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि उद्धव हटाए जाने के बाद फिर बिना विधायक बने मुख्यमंत्री नहीं बन सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में साल 2001 में ऐसे मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस लाहिटी की बेंच में शामिल जस्टिस आनंद ने कहा था, `बिना विधायक बने, दुबारा मंत्री नहीं बन सकते हैं’। एसआर चौधरी बनाम स्टेट ऑफ पंजाब सरकार मामले में ये फैसला आया था। जब मंत्री बनने पर रोक है तो फिर मुख्यमंत्री बनने का तो सवाल ही नहीं। सीधी सी बात है।

अब हमारे भगत दा चाहेंगे और वह विधान परिषद में उद्धव को मनोनीत करते हैं तो टंटा खत्म। नहीं तो फिर वही हो-हल्ला-हंगामा-और मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखली। कहने का मतलब महाराष्ट्र के भाग्य विधाता अभी तो भगत दा या फिर हम सबके खिचड़ी बाबा साबित हो रहे हैं। राज्यपाल साहित्य, कला, संस्कृति विज्ञान, सामाजिक कार्यों में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को मनोनीत कर सकते हैं। उद्धव इनमें से किसी भी क्षेत्र में ख्यातिनाम शख्स नहीं हैं। लिहाजा, राज्यपाल की कृपा पर निर्भर हैं।

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