जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई से ही बचेगी सरकार की साख!

अपने विधायक की पिटाई करने वाली पुलिस UP के विधायक के आगे झुक गई!

Chetan Gurung

उत्तराखंड पुलिस या प्रशासन। कमाल करने में नहीं चूकते। अपने एक विधायक राजकुमार की प्रेमनगर (देहरादून) पुलिस चौकी में कुछ साल पहले कैसे धुनाई कर दी थी, लोगों को याद होगा? रोते हुए, टसुए बहाते हुए विधायक का चेहरा कोई नहीं भुला सकता। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के विधायक अमनमणि त्रिपाठी के आगे वह एकदम दंडवत हो गई। इतनी कि सरकार की प्रतिष्ठा तक दांव पर लगा दी है। खाज पर खुजली ये कि अमनमणि उत्तराखंड से तो अबे-तबे-देख लूँगा करते सकुशल निकल गए, लेकिन जिस उत्तर प्रदेश की धौंस दे रहे थे, वहीं की योगी पुलिस ने उनको छठी का दूध याद ही नहीं दिलाया, बल्कि मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार भी कर लिया। अब त्रिवेन्द्र सरकार के लिए इस मामले में साफ-सुथरे ढंग से निकलना बहुत मुश्किल लक्ष्य साबित होने वाला है।

यूपी विधायक अमनमणि त्रिपाठी

अमनमणि ने एक साथ कई लोगों के लिए संकट पैदा कर दिया है। सरकार के मुखिया त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर सियासी हमलों की बौछार विपक्षी दलों के साथ ही सोशल मीडिया से भी हो रही है। दूसरी तरफ उनके बेहद विश्वासपात्र नौकरशाह और भावी मुख्य सचिव माने जा रहे अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश भी तगड़े विवादों में घिर गए हैं। उनके आदेश पर ही अमनमणि समेत यूपी से आए 11 लोगों को पास जारी किए गए थे। यूपी के विधायक की तरफ से बहाना ये बनाया गया था कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिता के जरूरी धार्मिक कर्म में शामिल होने पहाड़ जा रहे हैं। साथ ही बद्रीनाथ और केदारनाथ के दर्शन भी करेंगे। ये तब हो रहा था जब अभी बद्रीनाथ के कपाट खुले नहीं हैं और केदारनाथ में धार्मिक अनुष्ठान या दर्शन आम लोगों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत

अमनमणि की इच्छाओं के बिना पर ही ओमप्रकाश ने पास जारी करने का आदेश कर दिया था। देहरादून प्रशासन की क्या मजाल जो शक्तिशाली नौकरशाह के फरमान को ठेंगा दिखा दें। हो सकता है कि ओमप्रकाश पर भी किसी का दबाव रहा हो। या फिर उनकी मंशा सिर्फ विधायक की इच्छा का सम्मान करना भर हो। फिर भी सवाल तो बनता ही है कि उनको क्या कॉरोना महामारी एक्ट-रोटोकोल का ख्याल नहीं था तब? जब आदेश जारी कर रहे थे। उत्तराखंड में ये मामला तूल पकड़ रहा। रंगत-आकार ले रहा है। इस ज्वाला में घी का काम कर दिया यूपी की ही पुलिस ने।

अमनमणि को पास जारी करने को ले के सुर्खियों में:अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश

बिजनौर जिले में वापसी के दौरान अमनमणि को गिरफ्तार कर के। एकदम सही वजह तो पता नहीं चली है, लेकिन सुना ये जा रहा है कि यूपी सरकार के ही ईशारे पर इस निर्दलीय-आजाद विधायक को गिरफ्तार करने की हिम्मत पुलिस कर पाई। इसके पीछे योगी सरकार की खुद को इस मामले में बेदाग साबित करने की मंशा समझी जा रही है। अमनमणि को पहाड़ जाने का पास जारी करने को ले कर उत्तराखंड सरकार पर तमाम अंगुलियाँ उठाई जा रही हैं तो इसलिए भी कि कॉरोना लॉक डाउन दौर में ये मुमकिन हो ही नहीं सकता था। कॉरोना प्रोटोकॉल कहता है कि हर जिले में 14 दिनों का क्वारेंटिन अनिवार्य है।

फिर अमनमणि का लश्कर कैसे निर्बाध पहाड़ में दनदना रहा था? आखिर किसका ईशारा था कि उनको कोई नहीं छेड़ेगा? आखिर जब उनको रोक ही लिया गया तो फिर महामारी कानून के तहत पूरे लश्कर (3 कारों में था) को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? क्यों उनको सेफ पैसेज दिया गया? त्रिवेन्द्र सरकार के पास अच्छा, बल्कि सुनहरा मौका था। अपनी छवि चमकाने और प्रतिष्ठा बढ़ाने की। अगर वह अमनमणि को महामारी एक्ट में सुद्धोंवाला जेल पहुंचा देती। जहां पहले से महिला की हत्या के मामले में उनके पिता अमरमणि सजायाफ्ता हैं। बैरकों की हवा और जेल की रोटियाँ खा रहे हैं।

पिता-पुत्र का जेल मिलन त्रिवेन्द्र सरकार के लिए बड़ा सियासी लाभ भी ले के आती। मुख्यमंत्री तक अमनमणि का किस्सा पहले न पहुंचा हो, मुमकिन नहीं लगता है। ये अलग बात हो सकती है कि कथित सलाहकारों ने एक बार फिर उनको गच्चा दे दियाहो। वे सही वक्त पर सही सलाह देने में नाकाम साबित हुए हों। योगी ने अमनमणि को गिरफ्तार कर खुद की छवि बचाने की कोशिश की है। उन्होंने ऐसा कर के ये साफ करने की कोशिश की कि भले उनके प्रदेश का विधायक उनके पिता के नाम पर उत्तराखंड की वादियों में मौज-लुत्फ लेने की खातिर निकला हो, लेकिन उनका इस मामले में कोई वास्ता ही नहीं है।

ये उनका सियासी चातुर्य ही कहा जाएगा। योगी होने के बावजूद सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी के तौर पर खुद को साबित कर दिया। ये ही वे गुण-काबिलियत है, जो किसी भी मुख्यमंत्री को सीखने होते हैं। त्रिवेन्द्र के लिए सलाहकारों को बदलने का वक्त अभी भी नहीं आया! ये मामला सुर्खियां बटोर रहा है। इस मामले में सरकार के लिए एक ही रास्ता है। सुरक्षित बचने-अपना दामन बचाने का। जो भी दोषी-जिम्मेदार है, उसके खिलाफ कार्रवाई। चाहे वह सियासी शख्स हो या फिर पसंदीदा नौकरशाह ही क्यों न हो।

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