सिर्फ 3 महीने हैं उत्पल के रिटायरमेंट के,शुरू होगी CS की जंग!

गलत वक्त पर विघ्न बना लॉक डाउन लश्कर पास संकट!

The Corner View

Chetan Gurung

नौतनवा (गोरखपुर-UP) के निर्दलीय विधायक अमनमणि त्रिपाठी के लश्कर को बद्री-केदार धामों के लिए पास जारी करना शक्तिशाली समझे जाने वाले ओमप्रकाश के लिए भारी न पड़ जाए। वह मुख्य सचिव की कुर्सी से महज तीन महीने दूर हैं। इस संवेदनशील मौके पर जेल में हत्या के मामले में उम्र कैद काट रहे बाहुबली पूर्व मंत्री अमरमणि के बेटे ने उनके लिए मुश्किलें तो पैदा करी ही हैं। परंपरा और वरिष्ठता ओमप्रकाश को मुख्य सचिव बनाती है। सवाल ये है।  मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिए उनको नौकरशाही का बॉस बनाने का फैसला करना अब इतना सहज या आसान होगा?

1987 batch IAS Omprakash

ये तो कोई नहीं जानता कि आखिर अमनमणि को कॉरोना लॉक डाउन और बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने के बावजूद पूरे लश्कर के साथ पास जारी किए जाने की असली कहानी क्या है। अपनी ही पत्नी सारा सिंह की हत्या के आरोप और CBI जांच में घिरे अमनमणि के रिश्ते यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बहुत करीबी बताए जाते हैं। योगी को सीएम बनाने के लिए वह खुल के उनके समर्थन में आए थे। ये विचित्र संयोग है कि पिता-पुत्र दोनों ही हत्या के मामले में सीबीआई जांच में फंसे।

पिता अपनी प्रेयसी और पुत्र पत्नी के कत्ल के आरोप में सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहे। यूपी सरकार ने अमन को कोई विधिवत सहयोग लॉक डाउन के दौरान उत्तराखंड सफर के लिए किया, इसके प्रमाण नहीं हैं। फिर कैसे उसका इतना बड़ा लश्कर गोरखपुर से कर्णप्रयाग तक जा चढ़ा। ये यूपी सरकार के वरदहस्त के बिना मुमकिन नहीं। अमनमणि पर अलग से स्टोरी होगी, फिलहाल, भावी मुख्य सचिव समझे जा रहे ओमप्रकाश पर ही फोकस किया जाए।

ओमप्रकाश पर ढेंचा बीज घोटाले की जांच की आंच भी आई थी। इसमें मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का नाम भी उछला था। जब वह कृषि मंत्री हुआ करते थे। दोनों को ही जांच के जरिये इस आरोप से बेदाग मुक्ति मिल चुकी है। त्रिवेन्द्र तो मुख्यमंत्री बन गए। ऐसे कोई लक्षण भी कहीं नहीं दिख रहे कि उनको 5 साल का कार्यकाल मुख्यमंत्री के तौर पर पूरा करने से कोई रोक पाएगा। बस कहानी ओमप्रकाश की रह गई है, जिनकी मुख्य सचिव बनने की कहानी हैरतनाक ढंग से अधूरी चल रही है।

कहाँ तो एक साल पहले ये कयास थे कि उत्पल कुमार उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग में अध्यक्ष बन के चले जाएंगे। ओमप्रकाश उनकी जगह लेंगे। मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद होने के साथ ही उनकी वरिष्ठता भी इस कयासबाजी को रंग देती रही है। उत्पल का अभी तक मुख्य सचिव रहने से ज्यादा ओमप्रकाश का अभी तक अपर मुख्य सचिव ही रहना हैरान करता है। इसी तरह की मिसालों के कारण त्रिवेन्द्र को पढ़ पाना आसान नहीं माना जाता है। जिन नौकरशाहों के बारे में समझा जाता है कि सरकार के करीबी हैं, उनमें से कई इन दिनों कुएं में गगरी ले के खड़े हैं।

उनके पानी भरने का नंबर ही नहीं आ रहा। किसी को समझ भी नहीं आ रहा कि आखिर उनका नंबर आ क्यों नहीं रहा। कुछ नौकरशाहों की कभी तूती बोला करती थी। वे खुद को बेहद तेज-तर्रार या खासमखास होने का गुमान पाला करते थे। वे इन दिनों बर्फ की सिल्लियों पर लेटे हुए हैं। ऐसे में ओमप्रकाश का नंबर नौकरशाहों की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने के लिए आसानी-सहजता से आ जाएगा, इस पर कयास लगाने से बेहतर उत्पल के रिटायर होने तक का इंतजार करना कहीं बेहतर होगा।

आज तक सिर्फ एक मौका ऐसा आया जब ग्रेडेशन लिस्ट में ऊपर अजय जोशी की जगह सुभाष कुमार को मुख्य सचिव बनाया गया था। दोनों एक ही बैच (1977) के थे। वह उत्तराखंड के इतिहास में सबसे ज्यादा अवधि तक आयुक्त भी रहे। दो बार मुख्य सचिव बनने वाले वह अकेले नौकरशाह हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि उनको विजय बहुगुणा ने मुख्य सचिव की कुर्सी से हटाया और आलोक जैन को मुख्य सचिव की कुर्सी सौंपी। एक साल बाद आलोक की सख्त मिजाजी और लचीलेपन में कमी के चलते फिर सुभाष को उनकी जगह ले आए। उनको ऐसा मुख्य सचिव चाहिए था, जो हर तबके की आँख का तारा हो।

सुभाष अगर जोशी से बाजी मार ले गए तो इसलिए भी कि उनकी लोकप्रियता किसी भी नेता से अधिक थी। वह सर्व सुलभ थे। 1994 से उत्तराखंड (कुछ वक्त के लिए सहारनपुर मण्डल के आयुक्त रहे) में ही नौकरी की। साथ ही जिस जोशी को उनकी जगह लाने की कोशिश नौकरशाहों के एक धड़े ने की थी, उसको उस दौर के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने खारिज कर दिया था। सुभाष की सरकार का विश्वास जीतने और संयम रखने की अद्भुत क्षमता की तुलना अन्य किसी भी नौकरशाह से नहीं की जा सकती।

ओमप्रकाश को करीब-करीब वैसी ही हैसियत मुख्यमंत्री के दरबार में हासिल समझी जाती है जो कभी रामचंद्रन, प्रभात कुमार सारंगी और राकेश शर्मा के पास सीएम हाउस में थी। अमनमणि विवाद ऐसे वक्त उभरा है, जब जरूरत झील के शांत पानी जैसे माहौल की थी। इस पर मानो किसी ने पत्थर फेंक के तरंगें उत्पन्न कर दी हैं। ऐसा न हो कि मुख्यमंत्री मामला शांत होने तक का इंतजार करें। तब तक उत्पल को मुख्य सचिव की कुर्सी पर सेवा विस्तार का बंदोबस्त करें।

इसकी संभावना कम लगती है कि केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति वाले एनएचएआई के अध्यक्ष सुखबीर सिंह संधू या फिर राधा रतुड़ी को मुख्य सचिव की कुर्सी सौंप दी जाए। वैसे नामुमकिन कुछ नहीं है। आखिर सुभाष जोशी को जब सरकार ने डीजीपी बनाया था तो उनसे सीनियर आलोक बिहारी लाल ने कोई मुख्यमंत्री के मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मार के किसी को कटवा नहीं दिया था। आलोक अपने हक के लिए लड़े। रिटायर होने के बावजूद। हाई कोर्ट से जीते और डीजीपी का वेतनमान ले के माने। ये उनके लिए आत्मसम्मान की लड़ाई थी।  

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