कभी साथी नौकरशाह से भिड़े, कभी DM रहते साड़ी कांड में घिरे

बैच मेट सुभाष से पेशेवर खुन्नस भी सुर्खियों में रही

Chetan Gurung

ये दिलचस्प सच्ची कहानी इन दिनों फिर सुर्खियों में आ गए 1977 बैच के पूर्व IAS अजय जोशी की है। खास बात ये है कि वह उत्तराखंड में दो बार मुख्य सचिव बने सुभाष कुमार से ग्रेडेशन लिस्ट में ऊपर थे। इसके बावजूद वह एक बार भी उस कुर्सी को छू नहीं सके, जिसकी खातिर उन्होंने अचानक यूपी से उत्तराखंड का रुख किया। अपनी नौकरी की शुरुआत से ही वह किसी न किसी विवाद में घिरे। आखिर इसकी महंगी कीमत उन्होंने मुख्य सचिव की कुर्सी चूकने के तौर पर चुकाई। एक उत्तराखंडी गायिका ने उन पर हाल ही में जो आरोप लगाए हैं, वह उनके विवादों की फेहरिस्त को सिर्फ लंबी बनाती है।

विवादों की शुरुआत तभी हो गई थी, जब वह सेवा में आए ही थे।  3 साल की नौकरी में ही अल्मोड़ा में बहुचर्चित-सनसनीखेज कफल्टा कांड हो गया था। दलित समुदाय के 14 लोगों को कफल्टा गाँव में ठाकुरों-ब्राह्मणों ने जिंदा जला के मार डाला था। इसमें 16 आरोपियों को उम्र कैद हुई थी। जोशी उस इलाके के एसडीएम हुआ करते थे, जहां कांड घटा। ये लोमहर्षक और लज्जा जनक कांड 9 मई 1980 को अंजाम दिया गया था। कल इस कांड को 40 साल हो जाएंगे। सुरजीत किशोर दास तब अल्मोड़ा के जिलाधिकारी हुआ करते थे।

सुरजीत वही नौकरशाह हैं, जो उत्तराखंड के मुख्य सचिव और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष भी बने। कफल्टा कांड ने पूरे देश को हिला के रख दिया था। तब के गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह (बाद में राष्ट्रपति बने) दलितों की जघन्य हत्या से इतने हिल गए थे कि अल्मोड़ा पहुँच के घटना की जानकारी खुद ली थी। बाद में जालौन में जब जोशी DM बने तो साड़ी कांड विवाद में घिर गए।

उनकी पत्नी ने एक दुकान से साड़ियाँ खरीदीं, लेकिन भुगतान को ले कर मुद्दा बन गया। वहाँ के व्यापारियों ने DM के खिलाफ ही प्रदर्शन कर दिया। उस वक्त के पुलिस अधीक्षक (शायद बाबुराम या बाबूलाल) ने मामला सुलटाने की भरसक कोशिश की। शासन तक बात पहुंची। कलेक्टर के साथ ही पुलिस अधीक्षक भी हटा दिए गए थे। ये बात 1987-88 के करीब की है। संयोग की बात है कि उनके बैचमेट सुभाष कुमार बगल के जिले ललितपुर में कलेक्टर थे।

सुभाष कुछ ही साल बाद उत्तराखंड में गढ़वाल मण्डल के आयुक्त बन के आ गए। बीच के एकाध साल छोड़ के (सहारनपुर में 1998 में आयुक्त रहे) फिर वह उत्तराखंड में ACS बनने तक आयुक्त भी लगातार बने रहे। 2008-09 के आसपास जोशी भी उत्तराखंड आ गए। काडर आवंटन के दौरान उनको भी उत्तराखंड राज्य बनने पर नए और मूल जन्मस्थान में सेवा का मौका दिया गया था। उन्होंने खुद को पहाड़ के लिए स्वास्थ्य के आधार पर असमर्थ बता के यूपी में ही रुक गए थे।

तब उनको अपना भविष्य शायद यूपी में बेहतर दिखा। जब उनको यूपी में हालत अनुकूल नहीं दिखे और उत्तराखंड में मुख्य सचिव बनने की सूरत दिखी तो यहाँ आ गए। यहाँ नौकरशाहों की एक लॉबी ने उनको हाथों-हाथ लिया। दूसरी लॉबी सुभाष के साथ थी। इस लॉबी में पूरंचन्द शर्मा (1980 बैच) और राकेश शर्मा (बाद में मुख्य सचिव बने-1981 बैच) के साथ ही कुछ और तटस्थ किस्म के नौकरशाह भी शामिल थे। जो तटस्थ माने जाते थे, उनको जोशी का अचानक आ के मुख्य सचिव बन जाने की इच्छा पसंद नहीं आई थी।

ये वह दौर था जब सुभाष कुमार के जन्म मूल और प्रमाणपत्रों को ले के मीडिया में खूब सुर्खियां बनाई गईं। सुभाष का कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि उनको तकरीबन पूरे सियासी अमले, जिसमें मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी शामिल थे, का मजबूत सहारा था। मीडिया में भी दो लॉबी बन गई थी। ये तनातनी किस कदर बढ़ चुकी थी, उसकी एक मिसाल है। एक दिन प्रमुख सचिव (सिंचाई) पूरनचंद शर्मा को पता चला कि उनके महकमे के अफसर तो जोशी (तब अवस्थापना विकास आयुक्त) को अपनी बैठक दे रहे हैं।

शर्मा ने भी उसी वक्त बैठक बुलाई थी, लेकिन वह किसी के न आने के कारण खाली दफ्तर में बैठे हुए थे। शर्मा अचानक ही दनदनाते हुए जोशी के उस दफ्तर में घुस गए, जो आजकल मुख्य सचिव का बैठक कक्ष है। शर्मा का दफ्तर उनके साथ ही लगा था। वहाँ सभी मातहत अफसरों के सामने दोनों की जबर्दस्त तू-तू-मैं-मैं हुई। `तुमने माहौल खराब किया हुआ है’, `माहौल तो तुम लोगों के खराब किया हुआ है’, तक की बात हुई। महकमे के HoD और मुख्य अभियन्ताओं की तो सिट्टी-बिट्टी गुम थी।

एक तरफ आईडीसी थे तो दूसरे सीधे महकमे के प्रमुख सचिव थे। बामुश्किल झगड़ा छूटा था। ये सुबह 11 बजे के करीब की बात थी। मुख्यमंत्री निशंक तक किसी ने तत्काल बात पहुंचा दी थी। जैसे-तैसे उनके कोप से दोनों नौकरशाह बचे। इस वाक युद्ध के पीछे असली कारण मुख्य सचिव की कुर्सी को ले के पैदा तनावपूर्ण माहौल ही था। जोशी ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया। फिर भी मुख्य सचिव नहीं बन पाए। उनकी छवि-प्रतिष्ठा उनके आड़े आ गई।

आखिर में वह ATI के महानिदेशक बन के रिटायर हो गए। ये पद मुख्य सचिव के समकक्ष था, लेकिन कोई जूनियर IAS अफसर भी वहाँ जाने को राजी नहीं होते हैं। सुभाष आज भी सरकारी ओहदे (बिजली विभाग में लोकायुक्त) में हैं। जोशी खाली हैं। अब महिला को संदेश वाले ताजा विवाद ने सभी को एक बार फिर उनकी याद दिला दी। इतना जरूर है कि उत्तराखंड में कोई दूसरा नौकरशाह कभी इतनी नाना किस्म की चर्चाएँ बटोरने में कामयाब नहीं रहा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here