मुख्य धारा से बाहर हो जाते हैं समाज-पार्टी हित वाले

Chetan Gurung

Exclusive देखिए विडियो स्टोरी

इस ढँकी-छुपी और कभी सामने नहीं आई घटना को दो दशक होने वाले हैं। तब उत्तराखंड बना ही था। शायद साल 2000 के नवंबर आखिरी या दिसंबर शुरू की बात होगी। मसूरी में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी। होटल जेपी (5 सितारा) में इसको आयोजित किया गया था। राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशा भाऊ ठाकरे (अब दिवंगत) थे। आज के विश्वप्रसिद्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) हुआ करते थे। रेलगाड़ी से देहरादून स्टेशन पहुँचने के बाद ठाकरे को मसूरी रवाना होना था।

kunwar Japinder Singh

उनके स्वागत के लिए उस वक्त के प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पूरन चंद शर्मा, प्रदेश महामंत्री ज्योति गैरोला, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. बालेश्वर पाल के साथ कई बड़े पार्टी नेता ही नहीं खुद मोदी भी थे। तब पत्रकार ज्यादा नहीं थे, लेकिन हम कुछ लोग तो थे ही। सभी पार्टी नेताओं को जेपी ले जाने के लिए बस की व्यवस्था की हुई थी। कुशाभाऊ वयोवृद्ध हो चुके थे। उनकी आराम का ख्याल रखते हुए पाल और गैरोला ने अलग कार की व्यवस्था उनके लिए कर दी थी।

Dr.Baleshwar Pal (Second form Right)

मोदी को ये शायद अखर गया। उनके आदेश के बिना की गई इस व्यवस्था को हाथों-हाथ उन्होंने खारिज कर दिया। उन्होंने निर्देश दिए, `सभी लोग बसों से ही जाएंगे’। इसके बाद वह अन्य बातों में व्यस्त हो गए। पाल-गैरोला ने मौका देखा। ठाकरे को कार में ही बिठा के मसूरी भेज दिया। इसके बाद क्या हुआ, ये तो नहीं पता, लेकिन पार्टी के प्रमुख लोगों से इसके बाद के किस्सों और मोदी की नाराजगी का पता चलता रहा।

उनको ये बात शायद बुरी लगी कि उनके मना करने के बावजूद ठाकरे को कार से भेजने का दुस्साहस पाल-गैरोला ने कैसे कर दिया। कार्यकारिणी की बैठक की समाप्ति के बाद होटल मधुबन में प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। उसमें बैठक में किए गए फैसलों के बारे में जानकारी दी जानी थी। इस कॉन्फ्रेंस में बालेश्वर की मौजूदगी पर रोक लगा दी गई थी। शायद मोदी के आदेश पर। पाल फिर भी ये कहते हुए बैठ गए कि वह प्रवक्ता हैं। पत्रकारों से परिचय तो वही कराएंगे।

इस बात का क्या असर पाल की बाद में निजी सियासत पर पड़ा? मोदी तेजी से सियासत में आगे बढ़े। गुजरात के मुख्यमंत्री बने। फिर प्रधानमंत्री। पाल धीरे-धीरे राज्य की सियासत में भी विलीन होते चले गए। पार्टी में शीर्ष स्तर पर उनके भी रिश्ते मजबूत हैं। उनकी बदौलत खुर्राट और पार्टी निष्ठ पाल की फ़ाइल दो बार राज्यपाल बनाने के लिए चली। ऐसा पार्टी सूत्र बताते हैं। खुद रामलाल ने महामंत्री (संगठन) के नाते फ़ाइल चलाई। पाल की फ़ाइल कहीं दाब दी गई। अब वह फ़ाइल कहाँ है, कोई नहीं जानता।

इतनी बड़ी सिफ़ारिश और पार्टी की इतनी सेवा कर चुके पाल को शायद 20 साल पहले अपने वयोवृद्ध राष्ट्रीय अध्यक्ष की हद तक ख्याल रखने की कीमत चुकानी अब पड़ रही है। पाल 3 बार देहरादून और एक बार महानगर के अध्यक्ष रह चुके हैं। ये बात दिलचस्प कही जा सकती है कि इतने सालों के गुजरने के बावजूद मोदी को देहरादून वाले पाल भूले नहीं हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने डॉ. बालेश्वर को फोन किया। उनसे घर-परिवार से ले के पार्टी-सरकार के हालचाल के बारे में तफसील से पूछा।

बातचीत में पुराने दिनों को भी याद करने की कोशिश की गई। पाल ने उस दिन और बातचीत का जिक्र `Newsspace’ से इस तरह  किया, `सुबह से मुझे 5 कॉल मोबाइल पर आ चुकी थी। अनजाना नंबर था। छठी बार दोपहर के वक्त कॉल रिसीव की। दूसरी तरफ से बताया गया कि प्रधानमंत्री जी बात करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री ने उनसे छूटते ही पूछा, कैसे हैं पाल साहब। आप तो बहुत पुराने और पार्टी के निष्ठावानों में हैं। सोचा आपसे बात की जाए’।

ये टेलिफोनिक बातचीत कई मिनट हुई। कई अहम मुद्दों पर फीड बैक मोदी की तरफ से लिया गया। इस फोन कॉल से इतना जरूर साफ हो गया कि मोदी की स्मृति पटल पर शायद पाल बस चुके हैं। ये बात ताज्जुब पैदा करने के लिए काफी है कि पार्टी के इस कदर निष्ठावान कार्यकर्ता आज प्रदेश मुख्यालय में सर्दियों में महज धूप सेंकते दिखाई दिया करते हैं, या फिर सिर्फ अहम कार्यक्रमों में। पाल ने अपने अध्यक्ष की इज्जत और सुविधा-उम्र का ख्याल रखने की कीमत चुकाई।

उनका जिक्र करना इस वक्त क्या इतना प्रासंगिक है? उनको इसलिए याद किया जा रहा है कि बीजेपी में शायद पार्टी नीति की सीमाओं या फिर बड़े सूरमा नेताओं की इच्छाओं के बाहर जाना कुल्हाड़ी पर पाँव मारने जैसा है। इस मुद्दे को कुँवर जपेंदर सिंह ने मौजूदा दौर में जोरदार ढंग से मौजूं कर दिया है। हमेशा बन-ठन के ज़्यादातर सफ़ेद पोशाक में रहने के शौकीन जपेंदर बीजेपी में नए-नए प्रवेशी हैं। सामाजिक मुद्दों के लिए लड़ना तथा इसके लिए जेब से खर्च करना उनका शगल है।

उनके लिए ये कहा जा सकता है कि वह घर फूँक के सियासत करते हैं, न कि घर भरने के लिए सियासत करते हैं। स्कूल फीस के मुद्दे को उन्होंने जबर्दस्त ढंग से उठाया हुआ है। आज का ये सबसे बड़ा सामाजिक और आर्थिक मुद्दा बना हुआ है। इस मसले को उन्होंने सोशल मीडिया में गरम रखा है। अखबारों में विज्ञापन भी दे के भी स्कूलों-सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इस कदम की तारीफ के बजाए बीजेपी ने जपेंदर को कारण बताओ नोटिस दे दिया है। हफ्ते भर में जवाब तलब किया है।

सामाजिक और आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर बोलने से पार्टी को नुक्सान होता है या फायदा? बीजेपी का संकट जुदा किस्म का है। अंदरखाने की खबर है कि स्कूलों के मालिकों ने 62 लाख रुपए यूं ही सीएम केयर फंड में नहीं दिए। ऐसा कहा-सुना जाता है कि इसके पीछे बीजेपी के ही एक नेता ने अहम भूमिका निभाई। तुम सीएम केयर में दान दे दो। मैं सरकार से फीस न लेने के आदेश पर रोक लगवा दूंगा। स्कूल वालों के लिए मिल के इतना पैसा देना, ऊंट के मुंह में जीरा था।

हकीकत पता नहीं लेकिन ये बात सही है कि सीएम केयर फंड में पैसा जमा होते ही स्कूल के हक में फीस लेने की सुविधा वाला शासनादेश जारी हो गया। जपेंदर जब से बीजेपी में आए हैं, खाली नहीं बैठे हैं। अपनी मौजूदगी का अहसास दमदारी से करा रहे हैं। ये बात अलग है कि बीजेपी प्रदेश आलाकमान की तरफ से उनके जुझारूपन को क्रांतिकारी या फिर बागी हो जाने की हद तक चले जाने के तौर पर लिया जा रहा है। उनको बीजेपी के पुराने दिग्गज अपने लिए खतरे के तौर पर भी ले रहे हैं।

खास तौर पर विधानसभा चुनाव के लिए दो साल भी न रह जाने और टिकट के सशक्त दावेदार नजर आने के कारण उनकी जड़ अभी से काटने का खेल शुरू हो गया है, ऐसा दिख रहा है। नोटिस को उसी रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल, नोटिस के बाद जपेंदर के रुख का इंतजार है। उनके जवाब तथा उस पर पार्टी के फैसले की तरफ भी सभी का ध्यान जाना स्वाभाविक है।

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