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40 Years of कफ़ल्टा कांड:14 दलितों की हत्याओं से हिल उठी थी इन्दिरा सरकार

DM सुरजीत किशोर दास-प्रभारी SP ने खुद ढोई थी लाशें

SDM से पहले PMO को मिल गई थी खबर

Chetan Gurung

9 मई 1980 की दुपहरी थी, जब दलित श्यामा प्रसाद की बारात कफ़ल्टा गाँव (अल्मोड़ा) से गुजर रही थी। दूल्हे को खेतों में काम कर रहीं स्थानीय सवर्ण महिलाओं ने डोली से उतर के जाने को कहा। गाँव के एक छोर में भगवान बद्रीनाथ के मंदिर के सम्मान में ऐसा करने के लिए कहा गया था। इस पर झगड़ा हुआ तो फौज से छुट्टी आया ब्राह्मण खिमानंद बारातियों से भिड़ गया। इस द्वंद्व में उसकी हत्या हो गई। इसको दलितों का दुस्साहस मान गाँव के ब्राहमण-ठाकुरों ने हमला कर के बारात के 14 लोगों की हत्या कर दी थी।

Ex IAS Surjit Kishore Das

इस बर्बर शर्मनाक सामूहिक हत्याकांड में 6 लोग जिंदा जला दिए गए थे। 40 साल पहले हुए उस हादसे को याद करते हुए पूर्व मुख्य सचिव सुरजीत किशोर दास, जो तब अल्मोड़ा के कलेक्टर थे, कहते हैं, `मैं जब अगले दिन पहुंचा तो लाशें ढोने के लिए कोई नहीं था। मैंने और डीएसपी (तब अल्मोड़ा में SP नहीं भेजे जाते थे) ने मजबूरन सबसे पहले शव ढोए थे’। कफ़ल्टा कांड की सत्य कथा ये है कि पहले जहां दलित अकेले सवर्ण पर भारी पड़े थे, वहीं बाद में गुस्साए सवर्णों ने इकट्ठे हो के उन पर जानलेवा हमला बोल दिया था।

खौफ में घिरे और जान बचाने की खातिर दलित बाराती गाँव के ही एक दलित नरीराम के घर में घुस गए थे। क्रोध में सवर्णों ने उस घर को ही आग लगा दिया। 6 लोग जिंदा जल गए। बाकी फिर जान बचा के भागने की कोशिश में जुटे। 8 लोग पकड़ लिए गए। उनको लाठी-पत्थरों से पीट-पीट के जान से मार दिया गया। श्यामा प्रसाद और कुछ अन्य दलित किसी तरह जान बचा के भाग पाने में सफल रहे। बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों-साहित्यकारों-नौकरशाहों-सेनाधिकारियों की जमात की जमात देने के कारण प्रसिद्ध अल्मोड़ा के माथे पर ये घटना हमेशा के लिए कलंक बन के रहेगा।

कफ़ल्टा बहुत दुर्गम गाँव था। फोन जैसे संचार साधन उस वक्त वहाँ बिल्कुल नहीं हुआ करते थे। इतना लोमहर्षक सामूहिक हत्याकांड हो गया था लेकिन जिला प्रशासन और राज्य सरकार को इसकी भनक अगले दिन तक नहीं लगी। एक दलित जो किसी तरह बच के भागा था, सीधे रामनगर पहुंचा। वहाँ से बस पकड़ी। दिल्ली में पूरी घटना का विवरण केंद्र सरकार तक जैसे-तैसे पहुंचाया। तत्काल ही दिल्ली से अल्मोड़ा के जिलाधिकारी सुरजीत किशोर दास को फोन आया। सीधे PM इन्दिरा गांधी के PA आरके धवन का।

उन्होंने डीएम से पूछा, `कफ़ल्टा में ये सब कैसे हुआ, क्या हुआ, आपको पता है’? सुरजीत इन दिनों पत्नी विभा पुरी (केंद्र सरकार में सचिव रह चुकी हैं) के साथ देहरादून में वसंत विहार में रहते हैं। मुख्य सचिव और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी तक पहुँचने में सफल रहे। उन्होंने कहा, `मुझे याद है तब शायद अगले दिन दोपहर के 4-5 बज रहे थे। पीएमओ से धवन का फोन जब आया तब वाकई मुझे हत्याकांड की जानकारी नहीं थी। मैंने तत्काल SDM (रानीखेत) अजय जोशी को फोन किया और पूछा कि क्या ऐसा कोई हत्याकांड उनके इलाके में हुआ है? जोशी ने शांत जवाब दिया, जी हुआ तो है।

दास के अनुसार, मैंने फिर एसडीएम से कहा कि आप क्यों नहीं गए वहाँ? उन्होंने कहा कि मैंने नायब तहसीलदार को पुलिस के साथ भेज दिया है’। अजय जोशी वही अफसर हैं, जो उत्तराखंड बनने के 7-8 साल बाद यूपी से आए थे, लेकिन मुख्य सचिव बनने की हसरत उनके ही बैच मेट (1977) सुभाष कुमार ने पूरा नहीं होने दिया। भले खुद सुभाष दो बार नौकरशाही की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने में सफल रहे। दास सूचना मिलने के बाद पुलिस-PAC बल के साथ तीसरे दिन गाँव पहुंचे।

वह मुख्य सड़क मार्ग से 13 किमी पहाड़ी रास्ता पार कर के पहुंचे थे। 7-8 घंटे पैदल चल के। वह इस हत्याकांड और हृदय विदारक दृश्य को भूल नहीं पाए हैं। `Newsspace’ से उन्होंने कहा, `सारे शव सड़ांध छोड़ रहे थे। दिक्कत ये थी कि लाशों को कैसे ढोया जाए। सवर्ण तो शवों को छूने को भी राजी नहीं थे। दलित गाँव छोड़ के भाग गए थे। मेरे साथ अल्मोड़ा के DySP (तब अल्मोड़ा के पुलिस चीफ SP नहीं होते थे) थे। मैंने खुद ही लाशों को उठाने का फैसला किया। DySP (नाम याद नहीं) भी मुझे देख के आगे आए। हम दोनों को शव उठा कर ले जाते देख फिर और लोग भी मदद को तैयार हुए। इस तरह शवों को वहाँ से निकाला गया’।

इलाके के SDM जोशी DM के पहुँचने के बाद घटनास्थल पर पहुंचे। इस हत्याकांड ने PMO तक को हिला दिया था। ज्ञानी जैल सिंह तब केन्द्रीय गृह मंत्री थे। वह और हरीश रावत (पूर्व मुख्यमंत्री) भी कफ़ल्टा पहुंचे। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा भी गाँव पहुँचने वालों में शुमार थे। इस शर्मनाक और वीभत्स हत्याकांड के 17 साल बाद आरोपियों (16) को अदालत से सजा हुई। तब तक 3 आरोपियों की मौत हो चुकी थीं।

कुछ साल पहले तक 2 अन्य जीवित आरोपी जेल में थे। उनको अधिक उम्र और आचरण के आधार पर रिहा करने की प्रक्रिया चल रही थी। अब पता नहीं वे जेल में हैं या छूट गए। कुछ दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों ने कफ़ल्टा कांड के दोषियों को जेल से रिहा करने के खिलाफ गोलबंदी कर दी थी। उसके बाद दोनों दोषियों को रिहा करने की प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया था।

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