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शराब महकमा:उपायुक्त मिश्र ने मुफ्त में सौंप दी करोड़ों की दुकान!

हैसियत प्रमाणपत्र लिया नहीं, जिसके पास संपत्ति नहीं, उस पर मेहरबानी  

IAS अफसर सेमवाल को सौंपी सरकार ने जांच

दागी होने के बावजूद हरिद्वार में DEO का जिम्मा क्यों?

Chetan Gurung

आबकारी उपायुक्त और हरिद्वार में DEO की भी मलाईदार कुर्सी पर बैठे प्रभाशंकर मिश्र ने पौड़ी में तैनाती के दौरान जो खेल किए, उसका खुलासा चौंकाता है। उन्होंने 9.62 करोड़ और 3.30 करोड़ रुपए राजस्व वाली शराब की दुकानें बिना सिक्योरिटी-एमएमजीडी और हैसियत प्रमाण पत्र लिए ही सौंप दी। दोनों दुकानों से सरकार को करोड़ों का राजस्व घाटा हुआ। सरकार ने अपर सचिव हरिचन्द्र सेमवाल को मिश्र पर लगे आरोपों की जांच सौंपी है।  

साल 2018-19 में पौड़ी में ई-टेंडर के जरिये दोनों दुकानें मिश्र ने ठेकेदारों को सौंप तो दी, लेकिन एक मामले में तय अधिभार और प्रतिभूति जमा नहीं की तो दूसरे मामले में हैसियत प्रमाण पत्र जमा कराने की कोई जरूरत नहीं समझी। उन्होंने पौड़ी के क्यूकालेश्वर तहसील के देवेंद्र सिंह गुसाईं और सतपुली के जगदंबा डंगवाल को दुकान सौंपने के बावजूद अनिवार्य अधिभार और प्रतिभूति जमा ही नहीं कराई। लंबे समय तक भी राजस्व न मिलने पर दुकान का आवंटन निरस्त करना पड़ा, लेकिन सरकार को बहुत नुक्सान हुआ।

सरकार ने आरसी जारी कर के राजस्व वसूली की कोशिश की, लेकिन हैसियत प्रमाणपत्र न होने के कारण वसूली मुमकिन नहीं हो पाई। आबकारी नीति के मुताबिक दुकान आवंटन के 7 दिनों के भीतर प्रथम और 30 दिनों के भीतर दूसरे प्रतिभूति और ई-टेंडर के लिए जारी निर्धारित आलेख में 20 तारीख तक निर्धारित मासिक अधिभार जमा करना आवश्यक है। अगर किसी वजह से ऐसा नहीं होता है तो ठेकेदार के अग्रिम जमा से जमा कम धनराशि ले के समायोजित किया जाता है।

ऐसा नहीं हो पा रहा हो तो फिर ठेकेदार पर 18 फीसदी सालाना ब्याज दर से दंड लगाया जाता है। जो फिर अगले महीने की 7 तारीख तक देना होता है। इसके बाद भी पैसा जमा नहीं होता है तो फिर दुकान का आवंटन रद्द कर उसको फिर से टेंडर में डालना होता है। मिश्र ने दूसरी प्रतिभूति और मासिक अधिभार जमा न होने के बावजूद दुकान का आवंटन रद्द नहीं किया।

विदेशी मदिरा की पौड़ी दुकान का आवंटन रद्द होने के बाद अमित गुसाईं को 34 दिनों के लिए दैनिक आधार पर दे दी, लेकिन हैसियत प्रमाण पत्र नहीं लिया। अमित ने मासिक अधिभार भी जमा नहीं किया। उसके खिलाफ आरसी जारी तो की, लेकिन हैसियत प्रमाणपत्र न होने के कारण राजस्व की वसूली नहीं हो पाई। कायदे के तौर पर किसी ठेकेदार को अगर छूट देना जरूरी हो भी तो उतनी ही अवधि के लिए दी जा सकती है, जितना पैसा उसने महकमे में प्रतिभूति और हैसियत के तौर पर जमा किया हो।

मिश्र को दिए गए कारण बताओ नोटिस में कहा गया है कि दुकान छोड़ देने वाले ठेकेदार के खिलाफ वसूली की कार्रवाई भी की जाए तो इतनी संपत्ति नहीं है कि राजस्व वसूल हो जाए। मिश्र पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने वक्त पर दुकानों का आवंटन रद्द कर दुबारा टेंडर कराया होता तो सरकार को राजस्व हानि कम से कम होती। उन्होंने ठेकेदार को गैर जरूरी तौर पर समय दे के सरकार का राजस्व नुक्सान किया।

ये ताज्जुब की बात है कि जांच चलने के बावजूद मिश्र को हरिद्वार के डीईओ का जिम्मा सौंपा हुआ है, जो कि उनके पद के लिहाज से भी नीचे है। वहाँ भी उन पर सेनीटाइजर घोटाले के आरोप लगे हुए हैं।

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