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Inside Big Story:माहिम की BCCI से वापसी का राज गांगुली-शाह पर लटकी तलवार!

जय ने सचिव के तौर पर रोके कदम, सौरव भी जुलाई में विदा!

दोनों को SC में राहत न मिली तो BCCI में फिर SG फॉर्मूला!

Chetan Gurung

BCCI उपाध्यक्ष की कुर्सी से माहिम वर्मा की विदाई के पीछे असली वजह कुछ खुल के आने लगी है। बोर्ड के सचिव जय शाह ने अपने कदम रोक लिए हैं और सेवा विस्तार के लिए सुप्रीम कोर्ट चले गए हैं। अध्यक्ष सौरव गांगुली भी जुलाई के बाद कुर्सी पर नहीं रहेंगे। देश की सबसे बड़ी अदालत से अगर राहत नहीं मिली तो दोनों को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होगा पड़ेगा। ऐसे हाल में कमजोर पृष्ठ भूमि और विवादित उपाध्यक्ष को कार्यवाहक अध्यक्ष बना के बोर्ड खुद को विवादों में नहीं डालना चाहता था। लिहाजा, माहिम को अपने राज्य लौट जाने को कहा गया।

टीम सौरव गांगुली:माहिम वर्मा (बाएँ से पहले) की इस टीम से फटाफट विदाई रहस्य है

हालांकि, ये सब अंदाज और कयास हैं। इस बारे में आज तक न बोर्ड की तरफ से कोई अधिकृत बयान जारी नहीं हुआ। उसने कभी ये नहीं बताया कि उसने क्यों अपने इतने सीनियर ओहदेदार को बिना कोई आधिकारिक वजह बताए हटा दिया। ये तो शायद ही कोई यकीन करेगा कि अपने राज्य की क्रिकेट की सेवा के नाम पर कोई बोर्ड ओहदेदार कुर्सी छोड़ देगा। वह भी सिर्फ 3 महीने में।

ये तब हुआ जब बोर्ड कार्यकारिणी की बैठक, जो दिसंबर में हुई थी, में ये तय किया गया था कि टीम सौरव को 3 नहीं बल्कि 6 साल का कार्यकाल दिया जाए। हुआ क्या? सौरव और जय के पास लोढ़ा कमेटी की सिफ़ारिशों के मुताबिक 3 साल तो दूर एक साल का भी कार्यकाल नहीं है। जय का कार्यकाल पूरा होने वाला है और सौरव जुलाई तक हैं। माहिम ही ऐसे थे जिनके पास तकरीबन पूरा कार्यकाल था।

संभावना के मुताबिक अगर सुप्रीम कोर्ट में सौरव-जय को राहत नहीं मिली तो दोनों को हटना ही होगा। तब क्या होता? माहिम उपाध्यक्ष के तौर पर बोर्ड अध्यक्ष हो जाते। ऐसे स्वर्णिम मौके को छोड़ माहिम क्या कोई भी शख्स कभी भी एसोसिएशन की छोटी सी क्रिकेट दुनिया में कभी न लौटे। वह भी नवांगतुक उत्तराखंड के सचिव की कुर्सी की खातिर। जिसमें कांटे तमाम हैं। फिर भी माहिम लौटे और फिर सचिव बनने के लिए बेहद विवादित और झाईं-झाईं वाला चुनाव लड़ना पड़ा। ये कुर्सी खाली भी खुद ने ही 3 महीने पहले की थी।

अंदरखाने की खबर ये बताई जाती है कि माहिम की पृष्ठ भूमि से बोर्ड के कोई भी ओहदेदार वाकिफ नहीं थे। सभी अपना ही देख रहे थे तब। माहिम के पीछे बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला का हाथ बताया जाता है। उन्होंने खुद का मौका बनता न देख माहिम को बोर्ड में भेज दिया। उनको यकीन होगा कि कभी उनका रास्ता अदालत के जरिये फिर से बोर्ड में जाने का बना तो यही शख्स उनके लिए आराम से इस्तीफा दे सकता है।

माहिम का क्रिकेट पृष्ठ भूमि तकरीबन शून्य है। सियासत या सामाजिक दुनिया में भी कोई कद नहीं था। इसके बावजूद वह उस बोर्ड में पहुँच गए थे, जिसको दुनिया का सबसे रुतबे वाला और अमीर कहा जाता है। माहिम के साथ विवाद भी जुड़ चुके थे। उनके सचिव रहते हुए उत्तराखंड क्रिकेट टीमों के चयन में तमाम आरोप, क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के रजिस्ट्रेशन में खुद को राजपत्रित अधिकारी बताया जाना (हकीकत में उपनल के ठेका कर्मचारी थे) उत्तराखंड क्रिकेट को झुलसा चुका था।

इसके साथ ही एसोसिएशन के आधिकारिक सदस्य बनने से पहले संयुक्त सचिव के तौर पर आदेश जारी करना, फिर चयनकर्ताओं, प्रशिक्षकों, प्रबन्धकों तथा सीईओ अमृत माथुर की नियुक्तियों को ले के भी वह सवालों के दायरे में घिरे थे। ये वजह हो सकती है कि बोर्ड ने उनको फिर अपनी गतिविधियों से काफी दूर रखा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जब अहमदाबाद आए तो सिर्फ वही अकेले बोर्ड से ऐसे थे, जो मोटेरा स्टेडियम में नहीं दिखाई दिए।

बोर्ड के सूरमाओं को ये लगा कि अगर सौरव-जय हटते हैं और माहिम कार्यवाहक अध्यक्ष बनाए जाते हैं तो मीडिया की सुर्खियों में अचानक आ जाएंगे। उनकी पृष्ठ भूमि जरूर टटोली जाएगी। तब बोर्ड की प्रतिष्ठा अचानक ही निशाने पर होगी। उनके रहते किसी और को अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा भी नहीं जा सकता है। ऐसे में एक ही रास्ता दिखाई दिया। माहिम की विदाई का। अब अगर सौरव भी नहीं रह पाते हैं तो ये मुमकिन है कि सुनील गावस्कर फॉर्मूला अपनाया जाए। गांगुली-जय को राहत मिलने की उम्मीद कमजोर बताने की वजह है।

जस्टिस लोढ़ा कमेटी ने ही सेवा शर्तें और अवधि तय की हैं। कमेटी का गठन सुप्रीम कोर्ट ने ही किया था। ऐसे में शायद वह अपनी ही कमेटी से अलग न जाए। इस बात को हर कोई समझ रहा है। एक बार जब ऐसे ही हालात बने थे तो गावस्कर को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था। इस बार हो सकता है किसी और नामी क्रिकेटर को ये जिम्मा सौंपा जाए, लेकिन जो भी होगा वह निश्चित रूप से बड़ा और सम्मानजनक नाम होगा।

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