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नौकरशाही में सियासत:जब उत्तराखण्ड भ्रूण था, तभी से शुरू-(1)

The Corner View

Chetan Gurung

उत्तराखंड राज्य के गठन और तारीख का ऐलान दिल्ली ने कर दिया था। देवभूमि के लोगों का जोश देखते ही बनता था। अपना राज्य-अपनी सरकार का ख्वाब छह साल के तूफानी-एकतरफा हिंसक आंदोलन के बाद पूरा हो रहा था। एकतरफा इसलिए कि हिंसा में सदा ही आंदोलनकारियों ने अपनी जान गंवाई। सिवाय उमाकांत त्रिपाठी की हत्या के। जो डिप्टी एसपी थे। बहुत ज़हीन किस्म के शख्स। पुलिस अफसर के कठोर तेवरों के उलट हमेशा मुस्कान उनके चेहरे पर रहा करती थीं। मसूरी में आंदोलन के दौरान झड़प में उनकी हत्या हो गई थी। कैसे हुई, ये तो रहस्य ही है। आरोप तो आंदोलनकारियों पर लगे। मुकदमे भी उन पर ही हुए। मेरे से उनकी मुलाक़ात अक्सर देहरादून सर्किट हाउस (आज का राजभवन) में हुआ करती थी। जब कभी दिल्ली या लखनऊ से मंत्री लोग आया-जाया करते थे। उनके इंतजार में हम दोनों ही वहाँ होते थे।

आंदोलन का अंत उत्तराखंड राज्य के गठन से हुआ। उधर बीजेपी में सियासत और धड़ेबाजी तेज हुई। मुख्यमंत्री बनने के लिए। अन्तरिम सरकार के लिए सबसे ज्यादा विधायकों (तब एमएलसी भी थे, अन्तरिम और राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी भी एमएलसी ही थे) वाली पार्टी होने के नाते बीजेपी को ही सरकार बनानी थी। भगत सिंह कोश्यारी (वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल), डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक (आजकल केंद्रीय मंत्री हैं), केदार सिंह फोनिया (पूर्व मंत्री) के साथ ही बीसी खंडूरी (केंद्र में मंत्री और बाद में सीएम) भी दावेदारों में शुमार थे। जिंदगी संघ में गुजार देने वाले कोश्यारी को निराश कर बीजेपी हाई कमान ने स्वामी पर दांव खेला। जो नाकाम साबित हुआ। अन्तरिम सरकार में ही स्वामी को हटा के कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। इसका फायदा नहीं हुआ। तब तक नुक्सान बीजेपी को हो चुका था। राज्य देने के बावजूद बीजेपी पहला ही विधानसभा चुनाव (2002) लीड लेने के बाद अप्रत्याशित रूप से हार गई।

पार्टी के सूबेदार खुद को चुनौती रहित बनाने के फेर में लग गए थे। उन लोगों और उनके समर्थकों को हराने में अधिक दिलचस्पी ले उठे, जो उनके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई में मुश्किल बाधा साबित हो सकते थे। काँग्रेस ने राज्य का पहला आम चुनाव जीता। एनडी तिवाड़ी की अगुवाई में सरकार बनाई। वह भी एक अलग कथा है। बीजेपी की सियासत सभी को दिख रही थी, लेकिन नौकरशाही में जो खेल खामोशी संग राज्य बनने से पहले शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। आज ये कहा जाता है कि राज्य में नौकरशाहों के कई गुट हैं। पहाड़-मैदान, उत्तराखंड-गैर उत्तराखंड, बिहार-गैर बिहार, ब्राह्मण-अन्य, दलित-अन्य, दक्षिण-अन्य। सिर्फ मराठियों को थोड़ा अलग कर सकते हैं। उनकी तादाद नगण्य हैं। इस गुटबाजी ने राज्य गठन के साथ ही जन्म ले लिया था।

उत्तराखंड राज्य का गठन साल 2000 में 8-9 नवंबर की मध्य रात को होना था। इसकी तैयारी के लिए जो नौकरशाह देहरादून भेजे गए, उनमें एसएन शुक्ला और डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया प्रमुख थे। शुक्ला 1969 (एकाध बैच ऊपर-नीचे) बैच के आईएएस थे। बेहद काबिल और तेज मस्तिष्क के समझे जाते थे। उन्होंने काफी मेहनत से काम किया। राज्य गठन में बहुत ज्यादा बुद्धि शुरू में उनकी ही लगी। वही दौर था जब मुख्य सचिव बनने और उसकी संभावनाओं पर भी नौकरशाही में अंदरूनी साजिश और जंग शुरू हो चुकी थी। डॉ. टोलिया को उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे का ज्ञान था। वह भी देहरादून पहुँच चुके थे। वह अपने साथ राकेश शर्मा सरीखे तेज तर्रार युवा नौकरशाह को ले के आए थे। चक्र ऐसा घूमा कि शुक्ला अचानक ही राजधानी गठन की भूमिका से बाहर कर दिए गए। डॉ. टोलिया राजधानी गठन के प्रभारी बना दिए गए। शुक्ला को नौकरशाही की टोलिया लॉबी ने चलता होने को मजबूर कर दिया था।

शुक्ला अगर रुके रहते तो अजय विक्रम सिंह के बाद दूसरे मुख्य सचिव जरूर बनते। अजय विक्रम शुरुआती 6 महीने तक ही मुख्य सचिव रहने के बाद रक्षा सचिव बन के केंद्र में चले गए थे। वह 1967 बैच के थे। खास बात ये कि जिस वक्त राजधानी गठन का काम चल रहा था, तब गढ़वाल के आयुक्त बृजमोहन वोहरा थे। वह 1968 बैच के थे। करियर में कई प्रविष्टियाँ प्रतिकूल होने के कारण वह प्रोन्नति से दूर ही रहे। वह फिल्म सितारे विनोद खन्ना के सगे मामा थे, और उनसे सिर्फ दो साल बड़े थे। खन्ना से मेरी मुलाक़ात उन्होंने ही एक दिन लंच पर कराई थी। सर्किट हाउस में। विनोद अपने बेटे अक्षय की पहली फिल्म हिमालय पुत्र की शूटिंग के लिए लोकेशन देखने आए थे। वोहरा और टोलिया में शुरू से ही खूब ठनी। राज्य गठन की तैयारियों की जानकारी देने के लिए दोनों अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। बाद में पत्रकारों के कम आने के कारण वोहरा ने अपनी पीसी बंद कर दी थी।

इसी बीच एक और खेल खामोशी से हुआ। 1970 बैच की ज्योति पांडे (पी ज्योति राव कहते थे) को दिल्ली में स्थानिक आयुक्त बना के उत्तराखंड नौकरशाही से दूर कर दिया गया। अजय विक्रम के बाद नहीं तो उनका दावा था। मुख्य सचिव के लिए। ज्योति अपने हक के लिए जीदारी से लड़ नहीं सकीं। बाद में भारत सरकार में सचिव बन के रिटायर हो गईं। मौका पाया मधुकर गुप्ता ने। जो ज्योति से एक बैच नीचे और टोलिया के बैचमेट (1971) थे। ज्योति नैनीताल की थीं। फिर मुन्श्यारी के टोलिया मुख्य सचिव बने। न मधुकर न ही रघुनन्दन अपर मुख्य सचिव बने। वे प्रमुख सचिव से सीधे नौकरशाही के बॉस बने। टोलिया के मुख्य सचिव रहते ही एम रामचंद्रन के तौर पर जबर्दस्त शक्ति पुंज स्थापित हो चुका था। उन्होंने पहले तो मुख्यमंत्री एनडी तिवाड़ी के दरबार में विश्वस्त सदस्य के तौर पर जगह बनाई। फिर सत्ता और नौकरशाही को अपनी अंगुलियों में ऐसा नचाया कि उस वक्त के दिग्गज और आला नौकरशाह भी उनका फोन भर आने पर खौफ में आ जाया करते थे। वे त्राहि माम-त्राहि माम कर उठे थे।

रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री से करीबी का जम कर फायदा उठाया। पहले तो अपर मुख्य सचिव की कुर्सी सृजित कर उसमें बैठ गए। फिर सभी प्रमुख सचिव और सचिवों को आदेश जारी किया कि कोई भी फ़ाइल उनके अनुमोदन के बगैर मुख्यमंत्री तक सीधे नहीं जाएगी। अब सारे फैसले उनके हाथों में थे। किसी भी नौकरशाह की मजाल नहीं थी कि उनके इस सर्कुलर की अवहेलना कर सके। वह मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव पहले ही बन चुके थे। कोई भी तबादला उनकी मर्जी से ही होता था। IAS-IPS-IFS पूरी तरह उनके शिकंजे में थे। उन्होंने टोलिया को ऐसा मुख्य सचिव बना दिया था, जो पूरी तरह निष्प्रभावी थे। नौकरशाही पर जिनका कोई दबदबा नहीं रह गया था। अगर टोलिया-रामचंद्रन की बैठक एक जैसे समय पर हो तो सचिव-प्रमुख सचिव रामचंद्रन की बैठक में जाया करते थे। टोलिया की बैठक में अपर सचिव से ले के अनुभाग अधिकारी तक बैठे होते थे। टोलिया ने भी हालात-रामचंद्रन से लड़ने के बजाए नियति से समझौता कर लिया था। उन्होंने एक दिन खामोशी से सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त की कुर्सी का रुख कर लिया और रामचंद्रन उनकी कुर्सी पर शान-धमक के साथ बैठ गए। (जारी)

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