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Debate:पौड़ी शराब दुकान आवंटन के दागी प्रभाशंकर हरिद्वार DEO क्यों?

HQ में AC-DC हैं, पर अतिरिक्त चार्ज मिश्रा को ही क्यों?

ताज्जुब! एक तरफ चार्जशीट की तैयारी, दूसरी तरफ मेहरबानी!

चेतन गुरुंग

आबकारी उपायुक्त और पौड़ी में DEO रहने के दौरान सरकार को करोड़ों का चूना लगाने वाले प्रभाशंकर मिश्र को चार्जशीट देने की तैयारी चल रही है। हैरानी इस पर है कि तमाम आरोपों और दागों के बावजूद सरकार को हरिद्वार में डीईओ की ज़िम्मेदारी देखने के लिए मिश्र के अलावा कोई नहीं मिल रहा। ताज्जुब इस पर है कि आबकारी मंत्री का जिम्मा भी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के पास है।

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DEO ओमकार सिंह के हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद मिश्र को उनकी जगह भेजने पर सरकार ही सवालों के घेरे में है। मिश्र के खिलाफ पौड़ी में शराब दुकान आवंटन में हुए खेल के आरोपों की जांच चल रही है। IAS अफसर हरिचन्द सेमवाल जांच अधिकारी हैं। आम तौर पर ऐसे घोटाले के आरोप सामने आने पर सरकारें तत्काल ही आरोपित अफसर को कुर्सी से हटा देती हैं।

मिश्र को शायद इसलिए छूट मिली है कि अल्मोड़ा के DEO दुर्गेश्वर त्रिपाठी भी ऐसे ही मामलों में 2 साल गुजरने के बावजूद बचे हुए हैं। त्रिपाठी पर आरोप तब लगे जब वह नैनीताल में DEO थे। मिश्र को वैसे भी इसलिए हरिद्वार DEO का अतिरिक्त चार्ज नहीं दिया जा सकता है कि महकमे में पहले ही 4 सहायक आयुक्त उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं। सरकार को उपायुक्त स्तर के ही किसी अफसर को हरिद्वार का अतिरिक्त चार्ज देना था तो फिर इस स्तर के भी 2 अफसर मुख्यालय में हैं।

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ऐसे में दागी अफसर को ही हरिद्वार भेजना जीरो टालरेंस वाली त्रिवेन्द्र सरकार के माथे पर आरोपों की चिप्पी ही लगा रही है। संभावना है कि 2-4 दिनों में मिश्र को चार्ज शीट दे दी जाएगी। उन पर आरोप हैं कि उन्होंने 9.62 करोड़ और 3.30 करोड़ रुपए राजस्व वाली शराब की दुकानें बिना सिक्योरिटी-एमएमजीडी और हैसियत प्रमाण पत्र लिए ही सौंप दी थीं। दोनों दुकानों से सरकार को करोड़ों का राजस्व घाटा हुआ।

साल 2018-19 में पौड़ी में ई-टेंडर के जरिये दोनों दुकानें मिश्र ने ठेकेदारों को सौंप तो दी, लेकिन एक मामले में तय अधिभार और प्रतिभूति जमा नहीं की तो दूसरे मामले में हैसियत प्रमाण पत्र जमा कराने की कोई जरूरत नहीं समझी। उन्होंने पौड़ी के क्यूकालेश्वर तहसील के देवेंद्र सिंह गुसाईं और सतपुली के जगदंबा डंगवाल को दुकान सौंपने के बावजूद अनिवार्य अधिभार और प्रतिभूति जमा ही नहीं कराई।

सरकार ने आरसी जारी कर के राजस्व वसूली की कोशिश की, लेकिन हैसियत प्रमाणपत्र न होने के कारण वसूली मुमकिन नहीं हो पाई। आबकारी नीति के मुताबिक दुकान आवंटन के 7 दिनों के भीतर प्रथम और 30 दिनों के भीतर दूसरे प्रतिभूति और ई-टेंडर के लिए जारी निर्धारित आलेख में 20 तारीख तक निर्धारित मासिक अधिभार जमा करना आवश्यक है। अगर किसी वजह से ऐसा नहीं होता है तो ठेकेदार के अग्रिम जमा से जमा कम धनराशि ले के समायोजित किया जाता है। मिश्र ने दूसरी प्रतिभूति और मासिक अधिभार जमा न होने के बावजूद दुकान का आवंटन रद्द नहीं किया।

इसी तरह के अन्य आरोप भी हैं। मिश्र को दिए गए कारण बताओ नोटिस में कहा गया है कि दुकान छोड़ देने वाले ठेकेदार के खिलाफ वसूली की कार्रवाई भी की जाए तो इतनी संपत्ति नहीं है कि राजस्व वसूल हो जाए। मिश्र पर तो कार्रवाई होती दिख रही लेकिन अल्मोड़ा वाले त्रिपाठी पर तो ये भी नहीं हो रहा। आखिर त्रिवेन्द्र सरकार शराब लॉबी के सामने इस तरह कई मर्तबा असहाय कैसे दिख रही है, लोग हैरान हैं।

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