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उत्तराखंड में नौकरशाही और निबटाने की सियासत-2

The Corner View

Chetan Gurung

मुख्य सचिव की कुर्सी। यानि, राज्य के नंबर एक और शक्तिशाली नौकरशाह जिस पर बैठते हैं। विडम्बना है कि नौकरशाही की सियासत राज्य गठन से पहले ही शुरू हो गई। इसके चलते उत्तराखंड में इस सर्वोच्च कुर्सी का जलवा शुरू के 4 साल में ही धूमिल होने लग गया था। अजय विक्रम सिंह (बाद में रक्षा सचिव बने) और मधुकर गुप्ता ( बाद में केन्द्रीय गृह सचिव बन के रिटायर हुए) ने इस कुर्सी की लाज जम के रखी। उनका रुआब इतना होता था कि प्रमुख सचिव और सचिव तक उनसे बेहद खौफ खाते थे। एवीएस मितभाषी थे। सिर्फ मतलब की बात। मधुकर खबर देने और लेने के मामले में हुनरमंद थे। दोनों को जम के सम्मान और प्रोटोकॉल मिलने की एक वजह ये भी थी कि सभी नौकरशाह यूपी से आए थे। उन्होंने वहाँ मुख्य सचिव पद की गरिमा, जलवा और ताकत को देखा था। सो उन्होंने कभी जुर्रत नहीं की कि मुख्य सचिव की टेढ़ी नजर का शिकार हों।

Dr. Raghunandan Singh Tolia (लोकप्रिय नौकरशाह, लेकिन सीएस बने तो सियासत आड़े आई )

पहाड़ी माटी (मुन्श्यारी से थे) वाले डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया को मधुकर गुप्ता के भारत सरकार चले जाने पर मुख्य सचिव बनने का मौका मिला। तब तक सब ठीक था। हालात तब बदले जब एम रामचंद्रन केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से अपने आवंटित कैडर उत्तराखंड आए। टोलिया ज्यादा दांव-पेंच में यकीन नहीं रखा करते थे। वह वन एवं ग्राम्य विकास आयुक्त तथा प्रमुख सचिव से सीधे शीर्ष कुर्सी पर पहुंचे थे। जैसे मधुकर अवस्थापना विकास आयुक्त से सीधे मुख्य सचिव बने थे। ACS जैसी कोई चीज तब अस्तित्व में नहीं थी। रामचंद्रन ने बहुत जल्दी ही सियासत की बीज बो दिए। कुछ चतुराई और कुछ मेहनत के बूते मुख्यमंत्री एनडी तिवाड़ी की किचन कैबिनेट में जगह बना ली। इसके बाद तो सरकार में उनका सिक्का चलने लगा। तिवाड़ी के करीबियों आर्येन्द्र शर्मा और संजय जोशी (OSD होते थे) के साथ ही अन्य उनके प्रभाव में आ चुके थे। सच तो ये है कि वह OSD को कभी नाखुश नहीं रखते थे। उनकी इच्छा तब आदेश की तरह होती थी।

M. Ramchandran (बेहद शक्तिशाली नौकरशाह, जिन्होंने सत्ता अपने हिसाब से चलाई)

दरअसल ये वो OSD थे, जो किसी भी मंत्री और नौकरशाह से अधिक ताकत-रुतबा रखते थे। मुख्यमंत्री उनके पूरे प्रभाव में हुआ करते थे। नौकरशाहों के तबादलों पर आर्येन्द्र का जबर्दस्त दखल था। वो जिसको चाहे उसको कोई भी कुर्सी दिला सकते हैं, तब ऐसा कहा जाता था। हकीकत ये है कि वैसे OSD किसी मुख्यमंत्री के पास फिर कभी नहीं आए। रामचंद्रन ने शुरू से ही सत्ता की कुंजी अपने पास रखने का खेल शुरू किया। जल्द ही टोलिया की लॉबी के नौकरशाहों को समझ आ गया था कि उनके लिए आने वाले दिन कठिन-दुष्कर रहने वाले हैं। रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव रहने के दौरान खुद को ACS बनवा लिया था। टोलिया के न चाहते हुए भी ये पद सृजित हुआ। रामचंद्रन ने ऐसी कोशिश की थी कि उनके हटने के बाद कोई फिर ACS न बने। लंबे समय तक कोई बना भी नहीं। उन्होंने नौकरशाहों के तबादलों की ताकत अपने हाथों में ले ली। वह जानते थे कि नौकरशाह अगर किसी लालच में फँसते या डरते हैं तो सिर्फ अच्छे महकमों को पाने और छिन जाने से। जिसके पास तबादले की ताकत हो, उनके लिए वही मालिक।

मुख्य सचिव टोलिया के हाथों से तबादलों की शक्ति अनौपचारिक तौर पर छिन चुकी थी। उन्होंने भी बाद में तबादलों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया था। वह विकास योजनाओं पर अधिक ध्यान देने लगे। रामचंद्रन का राज निरंकुश-निर्बाध गति से चल रहा था। एक दोपहर मुझे रामचंद्रन का फोन आया। बताने लगे कि कुछ IAS के तबादले हुए हैं। फ़ाइल पर सीएम साहब (NDT) के दस्तखत हो गए हैं। कार्मिक से जारी होने में कुछ घंटे लगेंगे। शायद रविवार का दिन था। मैंने सोचा 5-7 नाम होंगे। वह तबादला किए गए नौकरशाहों के नाम पढ़ कर सुना रहे थे, और ये लिस्ट ख़ासी बड़ी थी। तकरीबन 9 तो DM ही थे, जो बदल दिए गए थे। वह सीएम आवास (ओल्ड एनेक्सी, जहां अब नया CM आवास है) से बोल रहे थे। तब वहाँ मोबाइल नेटवर्क बहुत ही खराब था। बामुश्किल बात हो पाती थी।

थोड़ी देर बाद मैंने सोचा कि ऐसा तो नहीं कि शाम तक फिर बचे हुए DM भी बदल दिए जाएँ। पता कर लेता हूँ। फोन नेटवर्क इतना खराब था कि रामचंद्रन का फोन फिर लगा नहीं। मैंने मुख्य सचिव टोलिया को फोन किया कि उनसे ही आइडिया ले लेता हूँ। कहीं शाम तक और तबादले तो नहीं होंगे? उनको फोन लगाया तो वह भोपाल में मध्य क्षेत्र विकास परिषद किस्म की किसी बैठक में पहुंचे हुए थे। मैंने पूछा कि क्या और भी तबादले होने की संभावना है आज? उन्होंने कहा, अरे भाई, तुम पत्रकारों को रविवार को भी तबादलों की खबर तलाशनी होती है क्या। मैंने जब गंभीरता से कहा कि जो तबादले हुए हैं, उनकी सूची रामचंद्रन ने बताई तो है लेकिन अब उनका फोन लग नहीं रहा। इसलिए आपको तकलीफ दी। तब वह गंभीर हुए। पूछा कि क्या तबादले हुए हैं? मैं हैरान। मुख्य सचिव राजधानी क्या राज्य में भी नहीं और इतने व्यापक स्तर पर तबादले कलेक्टर-सचिव स्तर के हो गए थे। उन्होंने फिर इतना ही कहा, मैं तो भोपाल आया हूँ। बताना मुझे भी अगर कुछ होता है तो।

मैंने कार्मिक सचिव नृप सिंह नपल्च्याल (मुख्य सचिव बने बाद में) को फोन लगाया। उन्होंने कहा मैं मुंबई हूँ। पारिवारिक कार्यों से छुट्टी पर हूँ। इसलिए मुझे इस बारे में नहीं पता। सोचिए कि कार्मिक सचिव और मुख्य सचिव को भनक तक नहीं, और रामचंद्रन ने इतना बड़ा तबादला खुद कर डाला था। रामचंद्रन की लॉबी में अधिक नौकरशाह नहीं थे। टोलिया की लॉबी में अलबत्ता, जितने भी नौकरशाह थे, वे आने वाले दिनों को सोच के परेशान होने लगे थे। रामचंद्रन बेहद महत्वाकांक्षी थे। मुख्य सचिव बनने के लिए बेताब। उनको भारत सरकार भी जाना था। कम उम्र में IAS बनने के कारण उनको लगता था कि वह कैबिनेट सचिव भी बन सकते हैं। (केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति के दौरान 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल घोटाले सुर्खियां न बटोरते तो वह शायद बन भी जाते। तब वह केन्द्रीय शहरी विकास सचिव थे, और घोटालों ने उनकी छवि भी प्रभावित की थी।)

2 अक्तूबर 2005 की बात है। डॉ. टोलिया सुबह गांधी पार्क में झण्डारोहण कर के दफ्तर जा रहे थे। वहीं उन्होंने मुझे कहा आ जाओ सचिवालय। कॉफी पिलाऊंगा। उन्होंने खुद बताया कि मैं मुख्य सचिव की कुर्सी छोड़ रहा हूँ। भारत सरकार जा रहा हूँ। (हालांकि वह गए नहीं और IAS की नौकरी छोड़ के उत्तराखंड सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त बने) मैं उनके दफ्तर से बाहर निकला तो सामने ही रामचंद्रन लॉबी में मिल गए। वह ये जानना चाह रहे थे कि मुख्य सचिव कब हट रहे हैं। खैर जब टोलिया हटे तो रामचंद्रन उन नौकरशाहों पर खास तौर पर सख्त दिखते थे, जो टोलिया के करीबी समझे जाते थे। ऐसे ही सचिव थे संजीव चोपड़ा। पश्चिम बंगाल काडर के। प्रतिनियुक्ति पर उत्तराखंड आए थे। टोलिया के बेहद खास और भरोसेमंद। इतने कि उनकी भावी योजनाओं पर एक किताब ही लिख डाली थी। वह इन दिनों लाल बहादुर शास्त्री भारतीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में निदेशक हैं। युवा नौकरशाहों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। रामचंद्रन को तेज-तर्रार संजीव बहुत खटकते थे। किसी तरह उनको निबटाने के फेर में दिखते थे।

संजीव को लगता था कि रामचंद्रन उनको टोलिया का हार्ड कोर समर्थक समझते हैं। वह चाहते थे कि ये बात उनके दिमाग से निकल जाए। इतने शक्तिशाली मुख्य सचिव की नेगेटिव लिस्ट में रहने के नुक्सान से वह भली-भांति वाकिफ थे। एक दिन यूं ही रामचंद्रन से मेरी बात हो रही थी तो नौकरशाहों की बात छिड़ी। मैंने एक-दो के नाम ले के कहा कि वे बहुत घबराए हुए हैं। उनको लगता है कि आप उनको टोलिया का आदमी समझते हैं। रामचंद्रन ने छूटते ही कहा, `समझना क्या। हैं टोलिया के आदमी’। बहरहाल, संजीव स्मार्ट नौकरशाह थे। जल्दी ही वह नए बॉस के भी फेवरेट हो गए थे। सुरजीत किशोर दास उतने स्मार्ट नहीं थे। वह काम से मतलब रखने वाले थे। अपनी FRDC में दिन काट रहे थे। रामचंद्रन ने उनसे प्रमुख सचिव का पद भी हटा दिया था। इससे पहले टोलिया प्रमुख सचिव और FRDC एक साथ हुआ करते थे। संजीव तो बच निकले लेकिन दास पर रामचंद्रन का कोप बरस पड़ा। वह दास और उनकी पत्नी विभा पुरी (1976 बैच-भारत सरकार से कार्मिक सचिव बन के रिटायर हुईं) को भी टोलिया का ही समर्थक मानते थे। (जारी)

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