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नौकरशाही और सियासत:सुरजीत दास को मुख्य सचिव बनने से रोकना चाहते थे रामचंद्रन! (Part-3)

The Corner View

Chetan Gurung

शुरुआती दौर में एसएन शुक्ला, ज्योति पांडे (राव) और केवलराम भाटी (सभी मधुकर गुप्ता और डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया से वरिष्ठ) सरीखे नौकरशाह खतरनाक आपसी सियासत के शिकार हुए। इस सियासत के शोले आगे और भड़के। भाटी को उम्मीद थी कि अजय विक्रम सिंह के बाद वरिष्ठता के नाते उनको मुख्य सचिव बनाया जा सकता है। बहुत उम्मीद बांधे हुए थे। मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी थे। एक दिन एक नौकरशाह ने उनसे पूछा, `उत्तराखंड आ रहे हो? वह दिल्ली में तैनात थे। भाटी ने कहा, `स्वामी जी मुख्य सचिव बनाते हैं तो पक्का आएंगे’। अंदरखाने की खबर ये है कि मधुकर ने रामप्रकाश गुप्ता (यूपी के पूर्व सीएम और मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल) से अपनी करीबी का कार्ड खेल दिया। वह गुप्ता के मुख्य मंत्रित्वकाल में उनके सचिव रह चुके थे। कहा जाता है कि गुप्ता ने स्वामी को फोन कर दिया था। मधुकर के लिए। स्वामी उनके राज में ही यूपी विधान परिषद के अध्यक्ष रह चुके थे। उनके लिए गुप्ता को मुख्य सचिव की सिफ़ारिश पर ना कह पाना नामुमकिन सा था। भाटी केंद्र सरकार में चले गए। वहीं से रिटायर हो गए। शुक्ला-ज्योति की सफाई का किस्सा पहली किस्त में बता चुका हूँ।

रामचंद्रन जब मुख्य सचिव बने तो उन्होंने सबसे पहले सियासी क्षत्रपों का विश्वास जीता। चार्ज संभालने के एकाध दिन बाद से ही वह विधानसभा या फिर आवास पर मंत्रियों से शिष्टाचार मुलाक़ात करते मिल जाते थे। इसके बाद वह टोलिया लॉबी के पीछे पड़ गए। संजीव चोपड़ा तो स्मार्ट थे। उनके साथ हो लिए थे। बाकी थोड़े दमदार किस्म के लोगों को दरकिनार करने का खेल रामचंद्रन ने बेरहमी से शुरू कर दिया था। सबसे बड़े शिकार बने सुरजीत किशोर दास। शरीफ दास को वह टोलिया लॉबी का मानते थे। दास हालांकि सियासत से दूर अपनी पढ़ने-लिखने-कला-संस्कृति वालों की जमात में खुश रहते थे। उनके पास कभी जतिन दास-नन्दिता दास (मशहूर पेंटर पिता-अभिनेत्री पुत्री) तो कभी कोई नामी लेखक या प्रकाशक चर्चा करते मिल जाते थे। सचिवालय के दफ्तर में। तब उनके पास गृह, विजिलेन्स, जेल, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और राजस्व जैसे अहम महकमे होते थे। पढ़ने-लिखने और क्रिकेट (पसंदीदा खेल) की दुनिया वालों के लिए उनके पास वक्त निकल आता था।

इसके साथ ही वह IAS लॉबी के जबर्दस्त हितैषी थे। उनके पास कई IAS अफसरों की विजिलेन्स जांच की फ़ाइल आती थी। उनको वह आम तौर पर खारिज कर देते थे। इस तर्क के साथ कि आईएएस अफसरों को रोजाना सैकड़ों फाइलें देखनी होती हैं। किसी में भूल या गलती से दस्तखत हो जाने का मतलब ये नहीं कि विजिलेन्स जांच का मामला बना दिया जाए। कई नौकरशाह बाद में केंद्र सरकार में बड़ी कुर्सियों पर पहुंचे या अभी भी हैं। दास की कृपा न बरसती तो वे आज धक्के खा रहे होते। विजिलेन्स जांच का क्या भरोसा। जेल में भी हो सकते थे। दास से रामचंद्रन की अदावत तब अधिक बढ़ी जब वह FRDC (वन एवं ग्राम्य विकास आयुक्त) थे। इस कुर्सी पर पहुँचने से पहले ही रामचंद्रन ने अपने प्रभाव का जबर्दस्त इस्तेमाल कर लिया था। दास से प्रमुख सचिव की ज़िम्मेदारी हटाने में वह सफल हो गए थे। इस तरह वह शासन के अफसर नहीं रह गए थे।

रामचंद्रन का खौफ इतना था कि कोई भी नौकरशाह इस फैसले के खिलाफ चूँ तक नहीं कर सका। खुद दास भी सिर्फ अपने करीबियों में मन का गुबार निकाला करते थे। एक दिन उनका फोन आया। शायद रविवार था। सुबह 11 बजे के करीब। उन्होंने बताया कि उनसे वन हटा दिया गया है। अब वह सिर्फ RDC रह गए हैं। आदेश हो गए हैं। मतलब ये कि उनको अब सचिवालय से भी हटना होगा। मैंने सबसे पहले वन मंत्री नवप्रभात को फोन लगाया। क्या वाकई FRDC संस्था खत्म कर दी गई है? वह भी बगैर कैबिनेट फैसले के। उन्होंने हँसते हुए सिर्फ इतना ही कहा, `मैं अभी देहरादून से बाहर हूँ। इतना कह सकता हूँ कि जब देहरादून था, तब ऐसा कुछ नहीं हुआ था’। हालांकि मुझे यकीन है कि उनकी जानकारी में ये प्रगति जरूर थी। बस जुबान नहीं खोलना चाह रहे थे।

मैंने सीधे रामचंद्रन को फोन किया। उन्होंने कहा, `FRDC सिर्फ एक व्यक्ति की इच्छा पूर्ति (उनका ईशारा डॉ. टोलिया की तरफ था) के लिए बनाया गया था। उत्तराखंड में इसकी जरूरत नहीं है। इसलिए एफ़ हटाया गया है’। अगले दिन के अखबार में इस पर बड़ी खबर प्रमुखता के साथ थी। नौकरशाही में एकदम गर्मी आ गई। खास तौर पर जो रामचंद्रन से पीड़ित और परेशान थे। वे सब एक जगह मिले। दास, उनकी पत्नी विभा पुरी, जो तब प्रमुख सचिव (गृह) थीं, ने कुछ अन्य नौकरशाहों के साथ मुख्यमंत्री एनडी तिवाड़ी से वक्त ले के FRDC मुद्दे पर बात रखी। तिवाड़ी सुलझे हुए मुख्यमंत्री थे। उन्होंने 2-3 दिन बाद फिर से दास को FRDC बना दिया। बना क्या दिया, एफ़ फिर जोड़ दिया।

दास के साथ रामचंद्रन की खुन्नस इसके बाद और बढ़ गई। इतनी कि वह अपने बाद मुख्य सचिव दास नहीं बल्कि इन्दु कुमार पांडे को बनाना चाहते थे। पांडे भी शरीफ और सादगी पसंद नौकरशाह थे। वह इन चक्करों से दूर अपनी वित्त की फाइलों में डूबे रहते थे। रामचंद्रन की तब तक केंद्र सरकार में सचिव पद पर प्रतिनियुक्ति हो चुकी थी। 31 अक्टूबर 2006 को शायद उनका बतौर मुख्य सचिव आखिरी दिन था। 28 तारीख तक ये साफ नहीं हो रहा था कि मुख्य सचिव की खाली होने वाली कुर्सी पर दास बैठेंगे या नहीं। दास तस्वीर साफ न होने से बेचैन थे। बाकी नौकरशाह उनके प्रति समर्थन भाव रखने के बावजूद खामोश थे। रामचंद्रन का खौफ था ही ऐसा।

मैंने 28 को ही मुख्यमंत्री तिवाड़ी को फोन लगाया और सीधे पूछा, `रामचंद्रन तो 31 को जा रहे हैं, लेकिन पंडित जी उनकी जगह किसको लाएँगे, ये आप कब तय करेंगे? उन्होंने कहा, `ये तो तय हो चुका है। आप चाहें तो लिख सकते हैं। सुरजीत किशोर दास अगले मुख्य सचिव होंगे। मैं कई दिन पहले फाइल पर दस्तखत कर चुका हूँ’। फाइल पर दस्तखत रामचंद्रन ने ही कराए थे, लेकिन वह क्यों ले कर बैठे रहे, पता नहीं। सीएम से बात करने के बाद मैंने उनसे भी फोन पर बात की। ये जिक्र नहीं किया कि मैं सीएम से बात कर चुका हूँ। नए सीएस के बारे में जानता हूँ। उन्होंने कहा था, `अभी अगले सीएस पर फैसला होना है’।

मैंने पूछा। वरिष्ठता के आधार पर ही करेंगे न फैसला? उन्होंने कहा, `सीएस का पद सीनियरीटी का नहीं एलीजीबिलिटी का है’। इसमें ही उनके भाव जाहिर हो रहे थे। वह शायद दास को एलीजीबीलीटी के नाम पर सुयोग्य न होने के बहाने मुख्य सचिव की कुर्सी से दूर रखना चाहते थे होंगे। दोनों के बीच रिश्ते कितने कटु थे, उसकी मिसाल मुख्य सचिव का चार्ज लेने-देने के दौरान दिखा। आम तौर पर आउट गोइंग सीएस और नए सीएस एक-दूसरे के अगल-बगल बैठते हैं। फिर हटने वाले सीएस आने वाले को अपनी कुर्सी पर बिठाते हैं। हाथ मिला के बधाई देते हैं। मिठाई खिलाते हैं। मीडिया से बात भी करते हैं।

वॉर बुक-ब्ल्यू बुक हस्तांतरित करते हैं। फिर पुराने वाले को छोड़ने नए सीएस पोर्च तक जाया करते हैं। रामचंद्रन ने 31 अक्टूबर को चार्ज दिया। अधिकांश नौकरशाह इस मौके पर शांत लेकिन सुकून भरे चेहरों के साथ थे। दास ने जैसे ही चार्ज लेने की फ़ाइल पर दस्तखत किए, रामचंद्रन अचानक ही बिना बोले झटके से उठे। उन्होंने दास को हाथ मिला के बधाई देने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। फिर तेजी से दफ्तर से बाहर निकल गए। दास समेत सभी मौजूद अफसर और अन्य लोग उनके इस व्यवहार से हक्के-बक्के दिखे। वह पोर्च पर पहुंचे ही थे कि अपर सचिव (गोपन) भास्करानंद जोशी उनकी पीछे-पीछे हड़बड़ाए हुए पहुंचे। जरूरी वॉर बुक और ब्ल्यू बुक पर दस्तखत कार में कराए।

रामचंद्रन से विजेंद्र पाल और आलोक जैन (बाद में मुख्य सचिव बने) की भी नहीं पटी। पाल  दबंग किस्म के थे। जैन नियमों से चलने और नाजायज दबाव में काम न करने वाले। जैन के पास रामचंद्रन की नाराजगी के कारण ढंग के महकमे नहीं थे। बाद में जैन ने पर्यटन विभाग अपनी मर्जी से लिया। वह भी रामचंद्रन से। जो तब ACS थे लेकिन सत्ता की प्रमुख धुरी बन चुके थे। उनसे उनका पसंदीदा महकमा छीनना एक किस्म से भूखे शेर के जबड़े से उसका शिकार छीनना सरीखा था। फिर 2007 में बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने।  उनके सचिव के तौर पर प्रभात कुमार सारंगी का उदय हुआ। दास के लिए मुख्य सचिव की कुर्सी बेकार जैसी हो गई। नौकरशाह तो दूर कैबिनेट मंत्री तक सारंगी की धुन पर चला करते थे। (जारी)

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