The Corner View

Chetan Gurung

उत्तराखंड के 20 साल के इतिहास में सबसे दुर्भाग्यशाली लेकिन शरीफ मुख्य सचिव की तलाश करनी हो तो सुरजीत किशोर दास को किसी से भी कड़ी चुनौती नहीं मिलेगी। एक बेहद सभ्य और मानवीय गुणों से सज्जित नौकरशाह को अगर असम्मानजनक ढंग से IAS की सेवा से विदाई लेनी पड़े तो आप क्या कहेंगे? हैरानी इस पर हो सकती है कि उनको अपनी सेवा के दौरान सबसे बुरे दिन सबसे बड़ी कुर्सी पर रहते देखने पड़े। वह भी तब, जब मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी थे। मेजर जनरल रैंक से रिटायर्ड। अनुशासन के पक्के। जितनी ऊंची मूँछें, उतने ऊंचे आदर्श। ऐसा कहा जाता था। सुरजीत निस्संदेह तकदीर के मामले में बेहद खराब साबित हुए। पहले रामचंद्रन ने, (जो कम से कम उनसे वरिष्ठ तो थे) फिर प्रभात कुमार सारंगी ने उनकी हैसियत को दोयम से भी नीचे कर डाला था।

प्रभात को मनमाने फैसले की खुली छूट मिली थीं। बे-इंतहां शक्तियाँ बटोरे हुए थे। सरकार में एक भी बड़ा फैसला बिना उनकी मर्जी के मुमकिन ही नहीं था। दास से 12 बैच जूनियर होने के बावजूद वह उनको कोई तवज्जो नहीं देते थे। वह BCK के मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद यूपी से उत्तराखंड आ गए थे। यूपी काडर के थे। BCK की केंद्र में जो इज्जत थी, उसके चलते प्रभात का प्रतिनियुक्ति पर उत्तराखंड आना कोई कठिन मसला था ही नहीं। जब वह जॉइनिंग के लिए देहरादून आए तो एक दोपहर सचिवालय में मुख्य इमारत (जहां CMO) है, के तीसरे फ्लोर पर मिले थे। अरविंद सिंह हयांकी के दफ्तर में। उनके किनारे कुर्सी पर बैठे थे। हयांकी तब मुख्यमंत्री के अपर सचिव हुआ करते थे। उनको भी शायद ही अंदाज रहा होगा कि जो शख्स अभी उनकी कुर्सी के किनारे जॉइनिंग देने आए हैं, वह आते ही खुद सरकार बन जाएंगे। सुपर CS तो होंगे ही।  

हम दोनों का पहला परिचय वास्तव में ढंग से पहली बार वहीं हुआ था। वह आए और जल्द ही मुख्यमंत्री के सचिव के तौर पर नियुक्त हो गए। सबसे पहला काम उन्होंने ये किया कि नौकरशाहों के तबादलों को अपने हिसाब से अंजाम दिए। वह जो कहते थे, BCK आम तौर पर उसको इनकार नहीं करते थे। इसे दोनों के बीच का आपसी तालमेल कहें या फिर सारंगी पर BCK का अंधा विश्वास। शुरू-शुरू में नौकरशाहों और मुख्य सचिव को सारंगी के बारे में अंदाज नहीं था। सो उनको हल्के में लिया। समझदार और स्मार्ट किस्म के नौकरशाहों ने जल्द ही हालात और खेल को समझ लिया। वे तत्काल प्रभात की तरफ जा लगे। दिखाने के लिए भले वे मुख्य सचिव से भी कभी-कभार मिल लेते थे।

धीरे-धीरे नौकरशाहों ने फाइल मुख्य सचिव के पास भेजनी कम की। इसके बजाए वे सारंगी के पास जाने लगे थे। वहीं से फाइल कराने लगे थे। बहुत जरूरी फाइल ही मुख्य सचिव तक भेजते थे। एक दौर ऐसा भी आ गया, जब मुख्य सचिव सुबह 10 बजे दफ्तर आते थे और लंच तक न कोई फाइल आती न ही कोई नौकरशाह ही उनसे मिलने आता। ये ही आलम लंच के बाद का होता था। दूसरी तरफ सारंगी के दफ्तर में हर आला नौकरशाह दिख जाते थे। मंत्री भी उनके दफ्तर में बैठ के मुख्यमंत्री से मुलाक़ात का जुगाड़ कर रहे दिखाई देते थे। उस दौर में भी अगर कोई दास को सम्मान देते थे तो वह सुभाष कुमार, आलोक जैन तथा राकेश शर्मा थे।

संयोग से तीनों बाद में मुख्य सचिव बने। बदलते हालात और मुख्य सचिव संस्था के कमजोर पड़ने को सिर्फ IAS ही नहीं IPS लॉबी ने भी अच्छे से पढ़ लिया था। वे भी मुख्य सचिव के बजाए मुख्यमंत्री के सचिव के पास ही सीधे जाने लगे। उनको खुश करने में अधिक ध्यान देते, बजाए मुख्य सचिव की राय के। दास नियति से समझौता करने वाले शख्स थे। इसका नाजायज फायदा कई विश्वासपात्र मातहतों ने भी उठाया। एक बार मसूरी के LBS भारतीय प्रशासनिक अकादमी में ग्रुप फोटो सेशन चल रहा था। DGP कंचन चौधरी आगे कुर्सी पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ थीं। प्रमुख सचिव (गृह) दास पीछे खड़े थे। उनको गुस्सा तो आया लेकिन कुछ बोले नहीं। वह प्रोटोकॉल-सीनियरिटी का बहुत ख्याल रखने वालों में माने जाते थे। जुबान से लेकिन बहुत मीठे थे। उन्होंने कंचन चौधरी (अब मरहूम) से बाद में भी कुछ नहीं कहा। दोनों वैसे आपस में आच्छे मित्र भी थे।

दास की थ्योरी प्रोटोकॉल के मामले ये थी कि सबसे जूनियर प्रमुख सचिव भी प्रोटोकॉल में DGP से ऊपर होता है। सुरजीत-कंचन एक ही साल (1973) में ऑल इंडिया सर्विस में आए थे। फोटो सेशन वाला किस्सा छोड़ दें तो कंचन चौधरी बहुत सम्मान के साथ दास के साथ पेश आती थीं। दास को ही प्रमुख सचिव (गृह) रहने के दौरान कंचन को डीजीपी बनाने का श्रेय जाता था। दारोगा भर्ती घोटाले में फंसे प्रेमदत्त रतूड़ी के स्थान पर DGP के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश CM एनडी तिवाड़ी से उन्होंने ही की थी। कंचन को CM से मिलवाने अपने साथ ले गए थे। कंचन को मैंने कभी भी दास के दफ्तर में सीधे दरवाजा खोल के घुसते नहीं देखा। वह सदा `अंदर आ सकती हूँ सर’ बोलने के बाद ही उनके दफ्तर में प्रवेश करती थीं।

दास की सादगी कहें या फिर मुख्य सचिव संस्था का पराभव। एक किस्सा है। सुद्धोंवाला में जेल का उदघाटन था। ये प्रोजेक्ट दास के उन तीन ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल था, जो उनकी प्राथमिकताओं में सदा रहे। अन्य दो में देहरादून के गुच्चू पानी (रॉबर्स केव) में चंडीगढ़ की तरह रॉक गार्डन बनाना (1991 में गढ़वाल के आयुक्त रहने के दौरान उन्होंने रॉक गार्डन के रचयिता नेकचन्द को गुच्चू पानी दिखाया भी था) और राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण करना शुमार था। दास मुझे कहते भी थे कि CM साहब से आप भी बोलिए। स्टेडियम होना चाहिए। जमीन मैंने देखी हुई है। वह हाँ बोल दे तो जमीन दिखा दूंगा। अभी दिखाएंगे तो वहाँ भी कुछ और ही इमारत खड़ी हो जाएगी। दास को क्रिकेट (सुनील गावस्कर-सचिन तेंडुलकर के जबर्दस्त फैन हैं वह) का बहुत शौक था। खंडूड़ी को क्रिकेट से शायद एलर्जी थी। दास की कोशिशों के बावजूद उन्होंने इसके लिए हामी नहीं भरी। हाँ, सुद्धोंवाला में मुख्य सचिव ने मुझे भी साथ चलने को कहा। मैं उनके साथ ही उनके कार में बैठ गया।

प्रेमनगर के नीचे ढलान पर उत्तरांचल लॉं विवि के करीब अचानक पुलिस की पायलट जीप सायरन बजाते हुए पीछे से पूरी रफ्तार के साथ आगे आई। उसमें सवार AK-47 थामे जवानों ने मुख्य सचिव की कार को साइड में हो जाने का हाथ से गुस्से से ईशारा किया। चालक ने भी कार धीमी कर दी और किनारे कर दिया। सर्र से पीछे से एक कार तेजी से आगे बढ़ी। DGP (सुभाष जोशी) की कार थी।  दास के चेहरे के भाव बता रहे थे कि उनको ये बहुत खला। DGP के लिए मुख्य सचिव की कार रास्ता दे! नाराजगी के भाव में उन्होंने मुझसे कहा, `देख रहे हैं? ऐसा हो चुका है सिस्टम’। मुझे पक्का यकीन है कि दास की जगह अगर रामचंद्रन होते तो DGP का जवाब तो तलब करते ही, किनारे होने का ईशारा करने वाले पुलिसकर्मी मुअत्तल तो पक्का होते। सारंगी की सरकार में कितनी चलती थी, इस पर अलग से चैप्टर लिखा जा सकता है। मिसालों के साथ।

उन्होंने खुद भले मुख्य सचिव की कुर्सी की अहमियत खत्म कर दी थी, लेकिन अपने सामने किसी भी अफसर को आत्म विश्वास से खड़े या बैठते देखना जरा भी बर्दाश्त नहीं होता था। आज के कई बड़े तुर्रम खान नौकरशाह को उनके आगे तब घिघियाते देखा जा सकता था। सारंगी उनको डांटने में तो कसर नहीं छोड़ते थे, सर्द लहजे में चेतावनी भी दे देते थे। प्रतिनियुक्ति पर आए एक अपर सचिव को तो उन्होंने सिर्फ इस बात पर बुरी तरह झिड़क दिया था कि वह जॉइनिंग के बाद शिष्टाचार भेंट करने देर से क्यों आए? बात करते वक्त अचानक उस अफसर का मोबाइल फोन बज उठा, तो फिर फटकार दिया कि बंद करो इसे। सारंगी के दफ्तर में उनसे 10 बैच ऊपर वालों को सकुचाते-सशंकित देखा जाना तब आम था। सचिव मुख्यमंत्री क्या होता है, ये उत्तराखंड में सारंगी ने बताया था।

सारंगी से BCK की वाकफियत तब से थी, जब वह पौड़ी के DM थे। जब पूरी सरकार (मंत्री तक) सारंगी के आगे नतमस्तक हो गई, तो सुरजीत ने आत्मसम्मान को तवज्जो देना बेहतर समझा। उन्होंने IAS की सेवा को अलविदा कहने और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी पर जाने को बेहतर-सम्मानजनक विकल्प माना। बाद में सारंगी की दबंगई और मनमानियों के खिलाफ माहौल बन गया। नौकरशाह तो खामोश रहे लेकिन BCK के पार्टी में मौजूद विरोधियों ने दिल्ली में BJP हाई कमान के कान भर दिए। खंडूड़ी की बतौर CM पारी का खात्मा होने की बहुत बड़ी वजह सारंगी भी थे। इसमें दो राय नहीं।

BCK ने जब CM डॉ. रमेश पोखरियाल को मात दे के फिर विधानसभा चुनाव से पहले दूसरी पारी (2011) शुरू की तो सारंगी रन आउट हो के पविलियन में बैठ चुके थे। तब तक नौकरशाही में गुल खिलाने के लिए नए धड़े बन चुके थे। अजय जोशी पहले से देहरादून में मौजूद बैच मेट (1977) सुभाष कुमार को चुनौती देने अचानक UP से आ गए। आते ही वह मुख्य सचिव की लड़ाई में कूद पड़े। धड़ेबाजी गरम हो गई थी(जारी)।  

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