सख्ती-युक्ति से अंकुश नहीं,खराब हो रही पहाड़ों की फिजाँ

कोरोनेशन की नर्सों ने कोरोना पॉज़िटिव मरीज को अस्पताल लाने पर जताया एतराज

Chetan Gurung

देश की तरह ही उत्तराखंड में भी कोरोना से पैदा संकट और हालात काबू से बाहर हो रहे। आज दोपहर तक फिर 43 नए पॉज़िटिव केस सामने आए। फिक्र की बात ये है कि पहाड़ों पर कोरोना ने खतरनाक ढंग से चढ़ाई कर ली है। सरकार की कोरोना को ले कर बनाई युक्ति और सख्ती किसी काम नहीं आ रही। दूसरी तरफ सरकार और अस्पतालों में घातक लापरवाही सामने आ रही है।

कोई भी दिन अब ऐसा नहीं जा रहा जब भारी तादाद में कोरोना पॉज़िटिव केस सामने न आ रहे हों। ये हाल भी तब है जब सैंपलिंग की रफ्तार संतोषजनक भी नहीं है। फिर भी तकरीबन 5000 सैंपल के नतीजे अभी आने बचे हैं। आज 619 सैंपल नेगेटिव आए। 14 लोग जिंदगी की जंग जीत के घर पहुंचे। 11175 लोग कोविड केयर सेंटर में हैं। 25 लोग जीवन-मृत्यु के संघर्ष में हार गए।

आज जो लोग पॉज़िटिव पाए गए, उनमें देहरादून के सिर्फ 8 केस हैं। बाकी सभी पहाड़ों के हैं। अल्मोड़ा में सर्वाधिक 14 केस सामने आए। आज पॉज़िटिव पाए गए अधिकांश केस प्रवासियों से ताल्लुक रखते हैं। खतरे की बात ये है कि पहाड़ों में अब कोरोना अच्छे ढंग से पहुँच चुका है। आने वाले दिनों में ये पहाड़ के लिए घातक किस्म का सिर दर्द न बन जाए।

एक तरफ तो कोरोना केस बढ़ते जा रहे, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने लॉक डाउन ऐसे खोल दिया, मानो कोरोना को मार भगाया जा चुका है। दिन में बाजार की तरफ निकलें तो कोरोना प्रभाव दूर-दूर तक नहीं दिखता है। सरकारें सिर्फ मास्क पहनो-हाथ धोते रहो और दूरी बना के रखो में सिमट के रह गई है। मानो कोरोना का यही अचूक राम बाण ईलाज है। इस बीच अस्पतालों और प्रबंधन की लापरवाही का गज़ब नजारा भी सामने आता जा रहा है।

जिन दो भाई-बहनों को दून अस्पताल में एक साथ रखा गया था, उनमें अब बहन भी पॉज़िटिव हो गई है। `Newsspace’ में इस महा चूक की पोल खुली तो स्वास्थ्य विभाग ने और गज़ब कर दिया। दोनों भाई-बहनों को पहले तो कोरोनेशन अस्पताल ले गए। वहाँ भाई को तो भर्ती कर दिया, लेकिन बहन को कोविड केयर सेंटर भेज दिया। अब कोरोनेशन के स्टाफ और डॉक्टर सहमे हुए हैं कि आखिर क्यों भाई को अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।

अस्पताल की उपचारिकाओं ने सीएमएस को ज्ञापन दिया है कि लकवाग्रस्त भाई के साथ जिस बहन को अस्पताल लाया गया वह कोरोना पॉज़िटिव थी। उसकी दुबारा जांच भी नहीं हुई। क्या ये मान लिया गया कि वह नेगेटिव थी? या वह भाई को संक्रमित करने में सक्षम नहीं थी। आखिर किस आधार पर लड़की को मान लिया गया कि वह हफ्ते भर के भीतर ही ठीक हो गई है, जबकि उसका रिपीट टेस्ट नहीं किया गया है। ज्ञापन में इस बात पर नाराजगी जताई गई है कि क्या सोच के कोरोना नोडल अफसरों ने लकवाग्रस्त भाई और बहन के मद्देनजर गाईड लाइंस जारी नहीं किए? अस्पताल का स्टाफ अब ड्यूटी पर आने से घबरा रहा है। अन्य मरीज भी ईलाज के लिए भर्ती को राजी नहीं हो रहे हैं।

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