शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे की चाहत के बावजूद स्कूलों पर अंकुश दूर की कौड़ी

चंद बड़े स्कूलों पर फंदे के फेर में छोटे स्कूलों पर दबाव अव्यवहारिक:शिक्षा सचिव

Chetan Gurung

फीस एक्ट को ले कर शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे बार-बार दावा करते रहे हैं कि सरकार इसको ले के आएगी और अभिभावकों को राहत देगी। हकीकत ये है कि शासन में इस एक्ट के बारे में दूर-दूर तक कोई कोशिश आज की तारीख तक नहीं हो रही। साफ संदेश है कि जब तक मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत नहीं चाहेंगे, इस दिशा में कुछ नहीं होने वाला है।

शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम

अंदरखाने की खबर है कि फीस एक्ट और फीस के मामले में शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री की राय परस्पर इत्तफाक नहीं रख रही है। एक्ट और विधेयक में यही सबसे बड़ी अड़चन है। मुख्यमंत्री और नौकरशाहों की राय मंत्री से एकदम जुदा बताई जाती है।

सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री का मानना है कि फीस एक्ट के जरिये प्राइवेट स्कूलों को बांधने की सोच शानदार तो है लेकिन एकदम व्यावहारिक नहीं कही जा सकती है। सिर्फ राजधानी में ही देखा जाए तो बामुश्किल एक दर्जन डे और डे बोर्डिंग स्कूल ऐसे हैं जिनकी फीस मोटी है। बाकी स्कूलों की आर्थिक दशा बहुत कमजोर हैं। सरकार पर फीस राहत संबंधी शासनादेश स्कूलों के हक में होने को ले कर खूब हमले हो रहे हैं।

देहरादून में सीजेएम, समर वैली-सन वैली, यूनिसन,ब्राइटलैंड, सेंट जोजफ़्स, ईस्ट होप टाउन, एशियन,हिल्टन, हिल ग्रेंज, हेरिटेज, दून इंटरनेशनल, कैम्ब्रियन हाल, आईपीएस और आर्यन स्कूल ही ऐसे हैं, जिनके बारे में दावा किया जा सकता है कि वे अच्छी-ख़ासी वित्तीय स्थिति रखते हैं। मुनाफे में चल रहे हैं। एक पहलू इन स्कूलों का ये भी बताया जाता है कि इनके खर्चे भी बहुत अधिक हैं।

दून स्कूल, वेल्हम गर्ल्स-बॉयज, कर्नल ब्राउन कैम्ब्रिज सरीखे बेहद प्रतिष्ठित स्कूलों को सरकार ने ताजा फीस संबंधी शासनादेश से बाहर रखा है। सूत्रों के अनुसार इनके अलावा अधिकांश स्कूलों की वित्तीय दशा बुरी तरह कमजोर है। फीस राहत की सुविधा अभिभावकों को दे दी जाती तो ये स्कूल बंद होने की कगार पर पहुँच जाते। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र के पास इस किस्म की रिपोर्ट मिली हुई है।

माना जा रहा है कि फीस राहत दी जाती तो पहले से ही बामुश्किल जिंदा रहने के लिए सांस ले रहे स्कूलों की असमय हत्या हो जाती। वे बंद हो जाते तो फिर उनके बच्चों को किसी अन्य स्कूल में भर्ती कराना भी सरकार के लिए सिर दर्द बन जाता। दो साल पहले राजधानी के एक बड़े स्कूल को जब विवाद के कारण बंद किया गया था तो उसके बच्चों को अन्य स्कूलों में प्रवेश के लिए ना-ना किस्म की ठोकरें खानी पड़ी थीं।

शासन के एक आला अफसर के मुताबिक मंत्री की सोच अच्छी है लेकिन मुख्यमंत्री व्यावहारिक ढंग से फीस राहत पर सोच रहे हैं। फीस एक्ट तभी सामने आ सकता है जब मुख्यमंत्री इसके लिए राजी हों। इसका विधेयक विधानसभा में पेश करने से पहले कैबिनेट में मंजूर कराना पड़ेगा। मंत्री पांडे की सोच ईमानदार है, लेकिन 90 फीसदी स्कूलों को बचाने के लिए फीस एक्ट पर रोक लगाने की मजबूरी सरकार के सामने है।

इस मामले में `Newsspace’ से शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम ने साफ कहा, `सरकार को कई पहलुओं पर विचार करना होता है। सिर्फ बड़े और चलने वाले-मोटी फीस लेने वाले चंदेक स्कूलों को ध्यान में रख के बड़े और अहम फैसले नहीं लिए जा सकते हैं’। उन्होंने कहा, `अधिकांश स्कूलों के सामने शिक्षकों और स्टाफ को तनख्वाह देने की भी भारी चुनौती रहती है। अभिभावकों को फीस राहत दी जाती तो उनके लिए बने रहने का संकट पैदा हो जाता ’।  

1 COMMENT

  1. Poore staff ki selry hum percents dene ko agree hai but equally, not annual dues or not maintenance fees,,,( per year profits mei jaane wale school kya last year Apne profits mei se Nahi de sakte staff ki selry,,,,,?) Per month Moti income Hoti hai hai school ki I know it,, but no we are middle class, and we have not right that we think about good education of our children ,,,,, (government schools is best I think about it )

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