सेनिटाइजेशन से सिर्फ खर्च, कोरोना प्रकोप में लगातार इजाफा

लॉक डाउन-कर्फ़्यू से अर्थ व्यवस्था चौपट,नतीजा सिफर,GST में ही भारी नुक्सान

Chetan Gurung

देहरादून की मशहूर पलटन बाजार -धामावाला में ही रोजाना करोड़ों का कारोबार होता है

शनिवार-इतवार की बंदी से कोरोना पर अंकुश लगता दिख नहीं रहा। इस दिन लाखों खर्च कर शहर को सेनीटाइज़ किया जा रहा, लेकिन कोविड-19 पॉज़िटिव केस थम नहीं रहे। कारोबारियों और सरकार को इन दो दिनों में करोड़ों का नुक्सान जरूर पहुँच रहा। लॉक डाउन की सख्ती या सतर्कता से भी कोई नतीजा निकलता दिख नहीं रहा। अर्थ व्यवस्था जरूर चौपट हो गई।

DM Dr Ashish Shriwastav:इस शनिवार-इतवार देखें शहर बंद करते हैं या नहीं।

हर हफ्ते शनिवार और इतवार को शहर बंद कर के उसको सेनीटाइज़ करने का सरकार का फैसला कारगर साबित नहीं हो रहा। आंकड़ों पर गौर करे तो कोरोना पॉज़िटिव या नेगेटिव केस सामने आने के पीछे कहीं से भी ये दो दिनों की बंदी कारगर साबित नहीं हो रही। इससे सिर्फ कारोबारियों को कारोबार का नुक्सान उठाना पड़ रहा। सरकारी तथा गैर सरकार कंपनियों-दफ्तरों-महकमों को 22 दिन काम के बदले महीने भर की तनख्वाह देनी पड़ रही है।

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देहरादून में प्रदेश भर में सबसे ज्यादा कारोबार होता है। इसके साथ ही तमाम अहम बैठकें सरकारी महकमों में हुआ करती हैं। इनमें बड़े और जरूरी फैसले लेने होते हैं। कारोबारी डील भी देहरादून में अधिक होती है। वीकेंड में राजधानी के बाजार और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स-मॉल में जोरदार भीड़ रहती है। वीकेंड को ही खत्म कर देने के सरकार के फैसले से बाजार बहुत अधिक प्रभावित हुआ है।

मोटा अनुमान है कि शनिवार और इतवार के दिन देहरादून में करोड़ों का धंधा हर क्षेत्र में मिला के होता है। बड़ी डील के लिए भी लोग वीकेंड को ही पसंद करते हैं। साथ ही हर किस्म के दफ्तर और एटीएम तक बंद होने से कामकाज और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक फर्क पड़ रहा है। सेनिटाइजेशन के नतीजों का विश्लेषण किया जाए तो इसके प्रभावी नतीजे दिख नहीं रहे हैं। लाखों का बजट जरूर इस पर खर्च हो रहा है।

हफ्ते में दो दिन बंद करने के सरकार के फैसले का मतलब महीने में 8 दिन कोई काम नहीं। जिस दौर में अर्थ व्यवस्था और नकदी की ऐसी घोर किल्लत हो, 22 या 23 दिनों का महीना पाँव पर कुल्हाड़ी मारने से कम नहीं है। एक पूर्व मुख्य सचिव ने `Newsspace’ से कहा, `सरकार को ये नहीं भूलना चाहिए कि उसका खजाना खाली है। महीने में 8 दिन की बंदी से उसको करोड़ों रुपए की जीएसटी का नुक्सान हो रहा है। उस दिशा में वह ध्यान शायद नहीं दे रही है’।

लॉक डाउन पर भी अब खुद नौकरशाह अंगुली उठाने लगे हैं। उनके मुताबिक कोरोना को रोकना नामुमकिन हो गया है। ये इतना घातक भी नहीं है, ये साबित हो रहा है। बेहतर होगा कि अर्थ व्यवस्था ही बचा ली जाए। सतर्कता और सावधानी के साथ लोगों को अनुशासित जिंदगी जीने के लिए प्रेरित करना अधिक मुफीद होगा। केंद्र सरकार के जिम को न खोलने और राज्य सरकार के सुबह-रात की सैर और जॉगिंग को रोकने के फैसले पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बाजार खोले जा रहे हैं। शराब की दुकान खुली है। जिस जिम और जॉगिंग से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, उस पर ही रोक लगाना खराब फैसला कहा जाएगा।

इसके साथ ही ये भी तंज़ प्रशासन पर कसे जा रहे हैं कि शायद सरकार के मुताबिक कोरोना का वाइरस सिर्फ रात या सुबह ही सक्रिय रहता है। दिन भर वह सोया रहता है। शनिवार-इतवार और रात को कर्फ़्यू के फैसले पर भी एक पूर्व आला नौकरशाह ने सवाल उठाया कि कर्फ़्यू कानून-व्यवस्था के नाते लगाया जाता है। कोरोना संकट को कानून-व्यवस्था से भला किस तरफ जोड़ा जा सकता है। ये स्वास्थ्य से जुड़ा संकट है। इसका हल कर्फ़्यू नहीं हो सकता। कर्फ़्यू हल है तो फिर हफ्ते में सातों दिन कर्फ़्यू लगा दें।

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