CM के रुख से उम्मीदवारों की बढ़ रही अकुलाहट

डेढ़ साल ही बचा है सरकार का कार्यकाल, खाली हैं 3 कुर्सियाँ

विस्तार-फेरबदल हो तो कम से कम छह नए मंत्रियों के लिए बनेगी जगह

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को जल्दबाज़ी से बचने वाले शख्स के तौर पर भी जाना जाता है। मंत्रिपरिषद विस्तार पर तो उन्होंने उन विधायकों की बेचैनी को आसमान की ऊंचाई तक बढ़ा डाला है, जो मंत्री बनने का ख्वाब बरसों से सँजोए हैं। एक बार फिर उन्होंने शिवराज मंत्रिपरिषद के विस्तार पर प्रतिक्रिया के दौरान उत्तराखंड में भी विस्तार के बाबत पूछे गए सवाल का जवाब मुस्कान के साथ ये कहते हुए टाल दिया, `जैसे शिवराज का पता चला वैसे ही यहाँ भी मंत्रिपरिषद विस्तार हुआ तो आपको पता चल जाएगा’। पत्रकार और पार्टी विधायक इसके निहितार्थ खोज के पागल हो रहे हैं।

विधायकों की बेचैनी को समझा जा सकता है। उम्मीद करते-करते साढ़े तीन साल गुजर चुके हैं। उनको लगता था कि जिन लोगों का नंबर पहली बारी में नहीं आया उनका दूसरी बारी में मंत्री बनने का आ ही जाएगा। मंत्रिपरिषद में शुरुआत में सिर्फ दो सीटें थीं। इसके बावजूद 2 से ज्यादा लोगों की उम्मीदों को पंख लगे हुए थे। उनको लगता था कि अगला बदलाव या फिर मंत्रिपरिषद विस्तार एक-डेढ़ साल में हो जाएगा। तब तक जिन मंत्रियों का प्रदर्शन उम्मीदों के विपरीत होगा,उनको बदल के नए चेहरों को मौका दिया जाएगा। वे उसी खांचे में खुद के फिट होने की उम्मीद बांधे आज तक बैठे हैं।

त्रिवेन्द्र की एक और प्रतिष्ठा इन साढ़े तीन सालों में सामने आई है। वह नौकरशाही में झटपट या फिर फटाफट फेरबदल के समर्थक नहीं दिखे हैं। चंदेक मिसाल छोड़ दी जाए तो अधिकांश नौकरशाह लंबे समय से एक ही कुर्सी पर हैं। चाहे वह अच्छी सीट मानी जाती हो या फिर खराब। मंत्रिपरिषद सदस्यों को ले के भी उनका रुख नौकरशाही के प्रति रुख से अलग नहीं दिखा है। कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन बहुत खराब कहा जा सकता है। या फिर ऐसा नहीं है कि उनको इतने लंबे समय तक अपनी टीम का हिस्सा बनाया जाए। इसके बावजूद वे मंत्री बने हुए हैं।

वित्त-आबकारी-पेयजल-संसदीय कार्य मंत्री की कुर्सी संभाल रहे प्रकाश पंत का भी दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से देहावसान पिछले साल हो गया। इस तरह अब मंत्रियों की 3 सीटें खाली हैं। अगर मुख्यमंत्री विस्तार संग फेरबदल के विकल्प को भी आजमाते हैं तो उनके पास कम से कम 6 नए चेहरों को मंत्री बनाने की सुविधा आसानी से उपलब्ध है। मंत्री बनने वालों की लाइन में जो लोग हैं, उनमें कुछ चेहरे एकदम प्रमुख हैं। इनमें युवा पुष्कर सिंह धामी, स्वामी यतीश्वरानन्द, खजानदास, अनुभवी और वरिष्ठ बिशन सिंह चुफाल, सुरेन्द्र सिंह जीना और बलवंत सिंह भौर्याल के नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं।

तकदीर साथ दें तो विनोद कंडारी सरीखे जोशीले युवा और घिसे हुए विधायक गणेश जोशी और मुन्ना सिंह चौहान की भी लॉटरी लग सकती है। खास पहलू ये है कि मुख्यमंत्री ने अधिकांश मौकों पर मंत्रिपरिषद विस्तार पर हमेशा जुबान खोलने पर मुस्कान को तरजीह देना पसंद किया है। त्रिवेन्द्र की तकदीर इस लिहाज से बहुत अच्छी है कि उनके साथ न सिर्फ आला कमान का आशीर्वाद है, बल्कि 57 विधायकों वाला बहुमत भी विधानसभा में हैं। कुछ छोटे और चंदेक मामलों को छोड़ दें तो उन पर बहुत बड़े आरोप किसी मामले में लगे नहीं हैं।

पार्टी में अलबत्ता, उनको कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। माना जाता है कि बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में त्रिवेन्द्र से खार खाए धड़े ने उनके एक भी करीब को जगह नहीं लेने दी। ये बात ताज्जुब वाली इसलिए है कि उनके रिश्ते बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत से बहुत अच्छे हैं। ये भी कहा जाता है कि अध्यक्ष के चयन में त्रिवेन्द्र की ही चली। कार्यकारिणी गठन में उनको कामयाबी न मिलने की वजह अलग है। सूत्रों के मुताबिक स्थानीय संघ पदाधिकारी और एक सांसद उनसे खासे खार खाए हुए हैं। उन्होंने अपनी भड़ास कार्यकारिणी गठन में निकाली।

इसके बावजूद इस बात के कहीं कोई आसार नहीं दिख रहे कि त्रिवेन्द्र किसी दबाव में आएंगे। ये भी कि वह पार्टी के भीतर अपने समीकरण ठोस करने के लिए शायद ही समझौते करेंगे। मंत्रिपरिषद विस्तार या फेरबदल को किसी और की इच्छा से अंजाम देना भी पसंद नहीं करेंगे। पार्टी में मौजूद कुछ बड़े लोग और सियासी समीक्षकों को अलबत्ता, लगता है कि मंत्रिपरिषद विस्तार या फेरबदल जरूरी है। इससे उनके खिलाफ अगर असंतोष है तो वह दूर होगा। उनकी अपनी निजी मजबूत टीम बनेगी।

इससे इतर एक जुदा राय भी है। जो दूसरी पारी में भी मंत्री नहीं बन पाएंगे, जो कि कईयों के साथ मुमकिन है, वे बहुत ज्यादा खार खा जाएंगे। फिर वह आंतरिक सियासत का हिस्सा बन जाएंगे। त्रिवेन्द्र के खिलाफ भी जा सकते हैं। मंत्री बनने की बेचैनी इतनी अधिक क्यों? इसकी वजह उत्तराखंड का सियासी इतिहास है। कोई भी सरकार, भले मुख्यमंत्री बीच में बदल दे, बहुत अच्छा काम कर के भी लगातार दो बार नहीं आई।

मंत्री बनने के लिए बेचैन विधायकों को लगता है कि अभी मौका न मिला तो इतिहास के मुताबिक उनका नंबर अगली से अगली बार ही आएगा। वह भी तकदीर मेहरबान हुई तो। विधानसभा चुनाव में पार्टी के फिर से जीतना तो जरूर है ही। सबसे बड़ा सवाल लेकिन ये होता है कि साढ़े छह साल बाद क्या वे खुद फिर चुनाव जीत जाएंगे? इसकी गारंटी कहाँ है? बस यहीं उनका डर और बेचैनी एक स्थान पर ठहर जाता है। इतना जरूर है कि मंत्री किसको बनाना है या बाहर करना है, इसमें त्रिवेन्द्र की राय ही अहम रहेगी। ये भी कि विस्तार या फेरबदल की जरूरत है भी या नहीं, इस मुद्दे पर भी उनकी राय ही मायने रखेगी।

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