लगातार चौथी बार ऑफिस बेयरर हैं, दो बार ही रह सकते हैं  

शक्तिशाली जय शाह की कुर्सी लगातार दो बार रहने के कारण जा चुकी है

GM सतीश अपराजित का CaU से इस्तीफा, नाराजगी बताई जा रही वजह 

कोषाध्यक्ष पृथ्वी और बैंक ने रोके भुगतान!

Chetan Gurung

उत्तराखंड क्रिकेट के सर्वेसर्वा लोढ़ा कमेटी-BCCI के नियमों से भी ऊपर हैं! बोर्ड के बाई लॉज में लिखा है-कोई भी शख्स लगातार दो बार से ज्यादा किसी भी ओहदे पर नहीं रह सकता है। ओहदा चाहे राज्य एसोसिएशन में रहा हो या फिर बोर्ड में। इसके बाद 3 साल का कूलिंग ऑफ अवधि उसको गुज़ारना ही होगा। ये तथ्य इसलिए सामने लाए जा रहे हैं कि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (CaU) के सचिव माहिम वर्मा का ये लगातार चौथा कार्यकाल है, जब वह किसी न किसी अहम ओहदे पर बैठे हुए हैं।

बोर्ड अध्यक्ष सौरव गांगुली की कुर्सी 27 जुलाई को जाएगी और सचिव जय शाह की 28 मई को जा चुकी है। इसी नियम के फंदे में माहिम वर्मा भी फंसते हैं।

माहिम यूं तो 2007 से ही एसोसिएशन में अहम ओहदों पर है। उससे पहले भी उनके दस्तखतों से सदस्य बनाए जाते रहे। तब वह खुद भी सदस्य नहीं थे। ये देखा जाए तो साफ तौर पर धोखाधड़ी है। अपराध है। सीएयू को पिछले साल 13 अगस्त को बीसीसीआई की मान्यता मिली तो वह संयुक्त सचिव थे। उनके ही दस्तखत से कई अहम नियुक्तियाँ मान्यता मिलने के बाद एसोसिएशन में की गईं। दिलचस्प बात ये है कि तब उनके पिता पीसी वर्मा सचिव थे और सगे चाचा सदस्य। परिवारवाद की ये अनूठी मिसाल है। वैसे वर्मा खानदान से कुल 4 लोग एसोसिएशन में है।

CAU को BCCI मान्यता मिलने में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की भी अहम भूमिका थी। उनसे चूक हुई! माहिम के पिता पीसी वर्मा को मिठाई खिलाते हुए। साथ खड़े हैं पूर्व अध्यक्ष और मंत्री रहे हीरा सिंह बिष्ट

हीरा सिंह बिष्ट मान्यता मिलने के दौरान अध्यक्ष थे। उनको किसी भी अहम फैसले में विश्वास में नहीं लिया गया। 28 सितंबर को सीएयू के चुनाव हुए। इसमें जोत सिंह गुनसोला अध्यक्ष और माहिम सचिव पद पर चुने गए। माहिम जल्द ही बीसीसीआई चले गए। तीसरा कार्यकाल उनका वहाँ बोर्ड उपाध्यक्ष के तौर पर 23 अक्टूबर को शुरू हुआ। फिर बोर्ड में न जाने क्या उठा-पटक हुई और माहिम को वापिस उत्तराखंड लौटना पड़ा। चौथी बार फिर चुनाव लड़ते हुए वह इसी साल 8 मार्च को सचिव चुने गए। ये देश में रेकॉर्ड होगा कि कोई शख्स छह महीने के भीतर चार बार कुर्सियों पर बैठा। 3 बार चुनाव लड़ना पड़ा।

BCCI के नियम:लगातार 2 बार से ज्यादा ऑफिस बेयरर नहीं रह सकते। राज्य और बोर्ड के कार्यकाल मिला के ।

बोर्ड और एसोसिएशन के बाई लॉज में साफ लिखा हुआ है, `कोई भी ऑफिस बेयरर लगातार दो बार ही किसी ओहदे पर रह सकता है। तीसरी बार चुनाव लड़ने से पहले उसको कूलिंग ऑफ अवधि में जाना पड़ेगा। ये अवधि 3 साल की होगी। ये भी लिखा गया है कि कोई भी व्यक्ति जिंदगी में 3 बार से ज्यादा किसी भी ओहदे पर नहीं रह सकता। ये भी तय है कि एक कार्यकाल 3 साल से ज्यादा का नहीं होगा। लगातार दो बार किसी ओहदे पर रहते हैं तो फिर ये नहीं दिखा जाएगा कि उसने कितना वक्त किस ओहदे पर गुजारा है।  
कूलिंग ऑफ अवधि में ऐसा शख्स गवर्निंग काउंसिल या फिर किसी कमेटी में भी रहने के लिए पात्र नहीं होगा। सौरव गांगुली की कुर्सी पर तलवार इसलिए लटकी है कि वह बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन में अध्यक्ष रह चुके हैं। इसके बाद उनके पास सिर्फ 9 महीने ही बोर्ड अध्यक्ष के लिए बच गए थे। जय शाह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन में थे। वह मई में 8 महीने गुजार के ही बोर्ड से हट चुके हैं। गुजरात-बोर्ड में मिला के उनके भी 6 साल हो गए थे। छह साल लगातार अहम ओहदे पर रहने की अंतिम सीमा है। चाहे ओहदा राज्य और बोर्ड में अलग-अलग हो। दोनों जोड़ के छह साल होते हैं तो प्रतिबंध लागू हो जाएगा।

इसी प्रावधान में माहिम की कुर्सी और निर्वाचन को चुनौती मिलने वाली है। वह देश के इकलौते ओहदेदार हैं जो लगातार चार बार अहम ओहदों पर काबिज हैं। त्रिवेन्द्र सरकार पर भी क्रिकेट में चल रही धांधलियों-गड़बड़ियों को ले के काफी दबाव आ रहा है। सरकार का सीधा दखल भले सीएयू में नहीं है। उसके पास तमाम ऐसे रास्ते हैं, जो इन शिकायतों पर संज्ञान लेने के लिए उसको अधिकृत करते हैं। त्रिवेन्द्र सरकार का समर्थन ही सीएयू को बोर्ड की मान्यता मिलने की बहुत बड़ी वजह थी।

इस बीच एसोसिएशन की अंदरूनी व्यवस्था से खफा जीएम विंग कमांडर (रि) सतीश अपराजित ने इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, `Newsspace’ से उन्होंने इस्तीफे की वजह निजी कारण बताए। सूत्रों के मुताबिक कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी ने भी आज बिलों को ले के आए अकाउंटेंट को दस्तखत से मना कर दिया। वह वस्तुस्थिति साफ होने तक किसी भी बिल पर दस्तखत से बच रहे हैं। बैंक में भुगतानों को ले के शिकायत के बाद वह सतर्क हो गए हैं। उनसे इस बारे में संपर्क किया गया।  उन्होंने ये कहते हुए पुष्टि करने से इनकार किया कि बयान देने के लिए अध्यक्ष या सचिव ही अधिकृत हैं।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय स्टेट बैंक ने भी बिना नेगी के दस्तखत के भुगतान पर रोक लगा दी है। कोषाध्यक्ष के दस्तखत के बिना ही करोड़ों के भुगतान करने पर बैंक भी अनियमितता बरतने संबंधी आरोपों के निशाने पर है। इन मामलों में सीएजी प्रतिनिधि डिप्टी एजी योगेश अग्रवाल की भूमिका भी सवालों के दायरे में है। माना जा रहा है कि वह हिसाब-किताब संबंधी मामलों में अपनी भूमिका उस तरह नहीं निभा रहे, जैसा बोर्ड में नियुक्त सीएजी प्रतिनिधि अल्का रेहानी भारद्वाज कर रही। वह हर मामले में मूक सहमति दे देते हैं।

अल्का ने गांगुली-जय शाह के कार्यकाल खत्म होने और बोर्ड की एपेक्स काउंसिल की बैठक में उनकी आगे मौजूदगी पर सवाल उठा दिया है। उनके इस कदम की तारीफ की जा रही है। इसे साहसिक और फर्ज को ले कर ईमानदार रुख करार दिया जा रहा है।

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