तबादले पर DGP-DGLO से भिड़ना दुस्साहस या साहस!

Chetan Gurung

नौजवान IPS अफसर बरिंदरजीत सिंह का महज तबादले के मुद्दे पर अपने ही सीनियर IPS अफसरों से भिड़ जाना हैरान करता है। इस लिए भी कि तबादला शासन करता है। फिर पार्टी DGP-DGLO-IGP को क्यों बनाया? उन्होंने ऐसा कर के खुद के पाँव पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली? बरिंदर मामले में हाईकोर्ट का फैसला बहुत अहम रहने वाला है। ये फैसला IAS-IFS-PCS-PPS के नजरिए से भी नजीर बन सकती है। खास पहलू इस मसले का ये है कि पुलिस प्रमुख अनिल रतूड़ी का नाम उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद पहली बार विवादों में आया है। वह भी तब जब उनके रिटायरमेंट में सिर्फ चार महीने शेष हैं।

बरिंदरजीत ने कुछ मुद्दे ऐसे उठाए हैं, जिन पर हाई कोर्ट के निर्देशों का इंतजार बेसब्री से हर कैडर के अफसर करेंगे। इनमें सबसे अहम है SP-SSP के लिए तय न्यूनतम दो साल की पोस्टिंग अवधि। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को इस बात के लिए याद किया जाता है कि वह जल्दी से नौकरशाहों-अफसरों को हिलाना पसंद नहीं करते हैं। जब तक बड़ी और ठोस शिकायत न हो, वह नौकरशाहों को छेड़ने से बचते हैं। उनके वक्त में कई नौकरशाह भले शासन में हो या फिर जिलों में कलेक्टर, लंबा वक्त एक ही कुर्सी-जिले में गुजारते रहे हैं।

बरिंदरजीत को उधम सिंह नगर के SSP की कुर्सी से हटाया जाना एक पहलू विचार का हो सकता है। ये बात दीगर है कि उनको डेढ़ साल का अरसा मिला। वह भी आज के दौर में कम नहीं कहा जा सकता है। हाई कोर्ट में उन्होंने दो साल से पहले और कोरोना महामारी के मध्य हटाये जाने का भी जिक्र किया है। सबसे गंभीर आरोप तो DGP रतूड़ी-DGLO अशोक कुमार और रिटायर हो चुके IGP पर लगाए गए उत्पीड़न के हैं।

2008 बैच के 39 वर्षीय इस IPS ने अब तक हुए अपने 8 बार तबादले को भी एक किस्म से मुद्दा बनाया है। बाकी मुद्दे अभी कोर्ट में हैं। रतूड़ी-अशोक के लिए निजी तौर पर ये बेहद अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो गई है। रतूड़ी का पेशेवर जीवन एकदम बेदाग रहा है। उनकी सादगी-ईमानदारी के किस्से खूब चलते हैं। पत्नी राधा रतूड़ी का ओमप्रकाश के रिटायर होने के बाद (तकरीबन दो साल लगेंगे) अगला मुख्य सचिव बनना हर कोण से तय है। ऐसा होता है तो प्रदेश के वह पहले दंपत्ति होंगे, जो IAS-IPS के बॉस बने। दोनों इस तरह के विवाद कभी नहीं चाहेंगे।

अशोक को सबसे लोकप्रिय और मिलनसार IPS अफसरों में शुमार किया जाता है। सरगोशियों पर जाएं तो यही माना जाता है कि पुलिस महकमे को असल में वही चला रहे हैं। मीडिया और राजनेताओं की पसंद की सूची में भी वह शीर्ष पर चल रहे हैं। उनका रतूड़ी के बाद DGP बनना कहीं से भी अनिश्चित नहीं दिखाई देता है। वह कभी नहीं चाहेंगे कि बरिंदरजीत सरीखे विवादों का हिस्सा ऐसे आड़े वक्त पर बनें। वह जानते हैं कि उनके लिए ये दौर बहुत संवेदनशील है।

IAS-IPS कैडर के आला अफसरों से बात करें तो तबादले को वे मुद्दा ही नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ये तो मुख्यमंत्री-शासन का अधिकार है। शासन को अपने हिसाब से-बेहतर ढंग के साथ चलाना किस तरह है? इसके लिए किन अफसरों पर दांव खेला जा सकता है। ये सब देखने का अधिकार सरकार को है। दो साल न्यूनतम अवधि की पोस्टिंग व्यवस्था सिर्फ IPS के लिए नहीं है। IAS कैडर पर भी लागू होती है। निचले स्तर तक फील्ड पोस्टिंग वालों पर भी। इसको सख्ती-ईमानदारी से लागू किया जाना आज के दौर में मुमकिन नहीं है।

UP कैडर के IAS सूर्यप्रताप सिंह (VRS ले लिया) बेहद दबंग थे। इस लिए भी सुर्खियों में रहते थे कि वह सरकार की आँख में कांटे की तरह चुभते थे। जब वह GMVN के MD होते थे तो अक्सर कहा करते थे। 7 साल की नौकरी में 8 तबादले मेरे हो चुके हैं। बिस्तर-अटैची हमेशा तैयार रहती है। ये बात 1990 की है। UP में ही IPS अफसर अमिताभ ठाकुर सरकार और सिस्टम के खिलाफ कई बार एक्टिविस्ट तक हो जाते हैं। बरिंदरजीत ने जो कदम उठाए हैं, वह तंत्र को दुरुस्त शायद ही करे। इतना जरूर है कि इससे वह सूर्यप्रताप-अमिताभ की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे।

21 साल की नौकरी जिसकी बची हो, उसके लिए ये स्थिति ठीक नहीं। ऐसा कई पूर्व और मौजूदा आला IAS-IPS अफसर मान रहे हैं। बरिंदरजीत ने अंगुली भले अपने कैडर के आला अफसरों पर उठाई है, लेकिन इसकी आंच से शासन नहीं झुलसेगा, ये कहना अतिश्योक्ति होगी। तबादला करने का अधिकार ही गृह विभाग के पास है। बरिंदर ने शासन को अदालत में पार्टी नहीं बनाया है। इसकी भी वजह तलाशी जाने लगी है। खास तौर पर तब जबकि अदालत में जवाबी हलफनामा सरकार को ही 20 अगस्त तक दाखिल करना है। 21 अगस्त को इस पर सुनवाई तय हो गई है।

सीनियर्स से टकराव मोल लेने का नतीजा IAS हो या IPS कैडर में, कभी अच्छा नहीं रहा है। सरकार इसको कभी अच्छे संकेत और मिसाल के तौर पर नहीं लेती है। टकराव तो दूर की बात है। सीनियर के आदेशों-इच्छाओं के अनुपालन में हीला-हवाली तक बर्दाश्त नहीं की जाती है। IAS में ही देखा जाए तो सचिव विनोद रतूड़ी को उनके ईमानदारी के तमगे के बावजूद दरकिनार रखा जाता है। उनके बारे में माना जाता है कि वह किसी के दबाव में नहीं आते हैं। IPS में केवल खुराना आज कहाँ हैं, कोई नहीं जानता।

2004 बैच के केवल विजय बहुगुणा राज में सरकार की आँख के तारे थे। उस वक्त की उनकी सीनियर्स को ले के बेफिक्री और अनदेखी की कीमत वह अब भुगत रहे हैं। बरिंदरजीत के लिए अपने ही कैडर की ये मिसालें छोटी इसलिए नहीं हैं कि उत्तराखंड बहुत छोटा राज्य है। यहाँ छोटी-छोटी चीजें भी बड़ी नजर आती हैं। शासन से दो-दो हाथ करना भारी पड़ता रहा है। बहुत कम लोगों को याद होगा कि सुरजीत किशोर दास मुख्य सचिव होने से पहले प्रमुख सचिव (गृह) हुआ करते थे। निहायत शरीफ और काम से मतलब रखने वाले-पढ़ने-लिखने के शौकीन। किसी का नुक्सान करने से बचने वाले। फिर भी क्या हुआ? मिसाल पेश हैं।

राज्य के पहले DGP एके शरण सेवा विस्तार चाहते थे। शासन और सुरजीत से गुजारिश किए-उनको भरोसे में लिए बिना ही अखबारों में बयान देने लगे कि वह इसके लिए जुटे हैं। सुरजीत को ये बात अखर गई। तब गृह सचिव या प्रमुख सचिव (गृह) का जलवा हुआ करता था। सरकार-मुख्यमंत्री उनकी राय-बातों को बेहद तवज्जो दिया करते थे। UP सिस्टम उत्तराखंड में भी मरा नहीं था। सुरजीत ने भी बोल दिया-सेवा विस्तार तो तब होगा जब शासन केंद्र को इसका प्रस्ताव भेजेगा। शरण की केंद्र में जान-पहचान काम नहीं आई। खामोशी संग रिटायर हो गए। शासन से भिड़ंत का नतीजा पहली बार तभी दिख गया था।

उनकी जगह आए प्रेमदत्त रतूड़ी भी शासन को हल्के में लेने की भूल कर गए थे। जब दारोगा भर्ती घोटाला सुर्खियों में आया तो सुरजीत ही प्रमुख सचिव (गृह) थे। प्रेमदत्त को बनाए रखने में उन्होंने कोई प्रेम नहीं दिखाया। भले उनको ले के भी वही आए थे। मुख्यमंत्री एनडी तिवाड़ी ने अपने प्रमुख सचिव (गृह) की सुनी। DGP की दलील नहीं। सुरजीत ही कंचन चौधरी भट्टाचार्य को DGP ले आए थे। जिनको तिवाड़ी अच्छी तरह पहचानते भी नहीं थे। एक दिन वह कंचन को ले के मुख्यमंत्री के पास खुद गए और बोले-इनको बनाया जा सकता है DGP.प्रेमदत्त की जगह।

तिवाड़ी ने उनकी मान ली। देश की पहली महिला DGP होने का श्रेय फिर कंचन (अब मरहूम) को ही गया। भले देश की पहली महिला IPS किरण बेदी थीं। सुरजीत की इसमें भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता था। कंचन और सुरजीत एक ही साल (1973) सेवा में आए थे। दोनों में दोस्ताना रिश्ते भी थे। फिर भी कई मामलों में सुरजीत सिर्फ और सिर्फ सरकारी सेवा नियमावली को तरजीह दिया करते थे। रिश्तों के इतर। बरिंदरजीत शासन का विश्वास अगर खो देंगे तो शरण-रतूड़ी भी हो सकते हैं।

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