कई CM आए-गए:राजधानी का आधा ख्वाब `खैरासैण’ के लाल ने ही पूरा किया  

चाँद-एवरेस्ट पर पहला कदम रखने वाले-आजादी की चिंगारी सुलगाने वाले मंगल पांडे हमेशा याद किए जाते हैं

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने आज गैरसैण में देश की आजादी की 73वीं सालगिरह पर तिरंगा फहरा के इतिहास रच डाला। चमोली जिले के इस छोटे से पहाड़ी इलाके को गर्मियों की राजधानी ही सही, लेकिन घोषित और उसकी अधिसूचना जारी कर वह पहले ही महफिल लूट चुके हैं। उनको कोसने वाले भी इस तथ्य से इनकार नहीं करेंगे कि सबसे पहला कदम उठाना किस कदर मुश्किल होता है। अब तक कई CM उत्तराखंड गठन के 20 सालों में आए-गए, लेकिन गैरसैण को गर्मियों की राजधानी का दर्जा भी देने में वे हिचके रहे।

भराड़ीसैण में आज लोकार्पण करते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत। साथ खड़े हैं विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल (सबसे दाएँ)

त्रिवेन्द्र को आलोचक अन्य मुद्दों पर कुछ भी कह लें। गैरसैण मुद्दे पर उन्हें निशाने पर लेने से पहले एक बार सोचना जरूर पड़ेगा। जब वे त्रिवेन्द्र को इस लिए घेरना चाहेंगे कि सिर्फ गर्मियों की राजधानी ही क्यों! पूर्ण राजधानी क्यों नहीं घोषित की जा सकती गैरसैण, तो उनको ये भी याद करना पड़ सकता है कि उत्तराखंड में पहले भी कई दिग्गज किस्म के मुख्यमंत्री रहे हैं। सभी ने खुद की ब्रांडिंग पहाड़ के सबसे बड़े शुभचिंतक के तौर पर की। इसके बावजूद किसी की हिम्मत नहीं हुई कि गैरसैण पर कोई साफ-ठोस-निर्णायक कदम उठा सके।

स्वतन्त्रता दिवस पर चमोली की जिलाधिकारी स्वाति भदौरिया को सम्मानित करते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत

वे इस मुद्दे पर इधर-उधर की बातें कर लोगों को उलझाए रखते रहे। त्रिवेन्द्र पहले मुख्यमंत्री हैं, जिनके पास अद्भुत-ऐतिहासिक किस्म का बहुमत विधानसभा में है। वे सत्ता-राजकाज चलाने की खातिर गैरसैण का कार्ड खेलने या किसी किस्म के समझौते के लिए मजबूर नहीं हैं। न किसी को खुश करने के लिए ही बाध्य हैं। बाकी पूर्ववर्तियों की तरह वह भी चाहते तो गैरसैण से खुद को दूर ही रख सकते थे। तथ्य ये भी है कि पहाड़ से अधिक लोग मैदानों में रहते हैं। वे राजधानी के तौर पर देहरादून के बजाए गैरसैण या किसी भी अन्य जगह को कभी पसंद नहीं करेंगे। बल्कि नाखुश ही होंगे।

फिर भी त्रिवेन्द्र ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि जिन नौकरशाहों के हाथों में सत्ता की लगाम होने का शोर खूब रहता है वे भी कभी नहीं चाहते कि राजधानी गैरसैण जाए। उनको कुछ वक्त के लिए ही सही, वहाँ बैठना पड़े। ये हकीकत न जानने वाले मुट्ठी भर ही होंगे कि मंडलीय अधिकारी पौड़ी तक बैठने को राजी नहीं हैं। वे देहरादून में शिविर कार्यालय में ही मिलते हैं। यही वजह ही कि जब वे कभी पौड़ी बैठने जाते हैं तो अखबारों में सुर्खियां बनती हैं कि फलां मंडलीय अधिकारी इन दिनों आए हुए हैं। इनमें मंडलयुक्त से ले के आईजीपी (रेंज) तक शामिल हैं।

त्रिवेन्द्र की प्रतिष्ठा दबाव में न आने वाले शख्स के तौर पर है। उन्होंने गैरसैण में पिछली विधानसभा सत्र के दौरान अचानक सदन में ये ऐलान कर सभी को खुशी के एहसास के साथ अवाक सा कर दिया था कि गैरसैण गर्मियों की विधिवत राजधानी होगी। उनके इस ऐलान की अहमियत को इससे समझा जा सकता है कि उस दिन फिर सदन के भीतर तो तत्काल और उसके बाद बाहर उत्सव सा माहौल बन गया था। होली-दिवाली सा माहौल नजर आ रहा था। विपक्षी दल के विधायक और आलोचक भी मुख्यमंत्री का आभार जताते और बधाई देते नजर आए थे।  

गैरसैण को स्थाई राजधानी गोशीत करने की भावनात्मक मांग का सम्मान किया जाना चाहिए। इस बाबत ये कहा जा सकता है कि कई तथ्य हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। गैरसैण के मौसम, भौगोलिक विषम परिस्थितियों और तत्काल बुनियादी सुविधाओं के सर्वथा अभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती है। राजधानी गठन आयोग की सिफ़ारिश में देहरादून को स्थाई राजधानी के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन पहलुओं से एकदम ध्यान हटाना त्रिवेन्द्र क्या किसी भी मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा। ये भी हकीकत है कि जरा सी बारिश में पहाड़-सड़कें धंस और दरक जाती हैं। कई दिनों तक राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। सिर्फ हवाई सेवा के जरिये राजधानी को चलाया जाना मुमकिन नहीं।

गैरसैण को समर कैपिटल बनाने के बाद स्थाई राजधानी के लिए उसको तैयार करते रहा जा सकता है। वहाँ सभी तरह की जरूरतों और ढांचागत सुविधाओं को विकसित करने पर द्रुत गति से कार्य करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। तिरंगा फहरा के त्रिवेन्द्र ने ये तो साबित कर दिया है कि उन्होंने गैरसैण पर कोई भी फैसला दिमाग से नहीं दिल से किया है। मुख्यमंत्री खुद स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने गर्मियों की राजधानी वाला फैसला उसी दिन अचानक लिया था। ये पूर्व नियोजित नहीं था। उनके कैबिनेट के साथी और आला नौकरशाहों, पार्टी के प्रमुख लोगों को भी इस बारे में भनक तक नहीं थी। उनके दिल से आवाज आई और उन्होंने ऐलान सदन में कर दिया।

इतना तो तय है कि जब भी उत्तराखंड की अहम घटनाओं पर भविष्य में चर्चा होगी, तो खैरासैण के लाल कहे जाने वाले त्रिवेन्द्र का नाम भी प्रमुखता से लिया जाएगा। चाँद पर सबसे पहला कदम रखने, एवरेस्ट पर सबसे पहले सफल चढ़ाई करने वालों या फिर स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिंगारी फूंकने वाले ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही मंगल पांडे को सदा ही याद किया जाता है। ये बेहद खुशनुमा-अद्भुत-हैरतनाक संयोग है कि जिस दिन त्रिवेन्द्र ने ये ऐलान किया, उसी दिन चंद घंटे पहले `News Space’ ने इसी मुद्दे पर स्टोरी कर उनका ध्यान इस तरफ खींचा था। त्रिवेन्द्र को गैरसैण पर उठाए गए कदमों (इसकी घोषणा-पेपरलेस सचिवालय ले जाने-तिरंगा फहराने) से किसी किस्म का सियासी फायदा डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव में हासिल होगा या नहीं, कोई नहीं जानता।

देश के सियासी विश्लेषकों के लिए उत्तराखंड की अवाम को समझ पाना आज तक सबसे कठिन टास्क साबित हुआ है। यहाँ के वोटर अबूझ ही साबित हुए हैं। इसके बावजूद ये कहा जा सकता है कि त्रिवेन्द्र और बीजेपी इस मुद्दे पर न सिर्फ अंक तो बटोर ही सकते हैं बल्कि विपक्षी दलों पर भारी न भी पड़े तो हल्के भी साबित नहीं होंगे। अभी तक के चुनावों में सत्तारूढ़ दल विपक्ष के सामने शिकस्त खाते रहने का इतिहास कायम रखते आए हैं। त्रिवेन्द्र इस परंपरा को तोड़ने में सफल होते हैं तो उनके उत्तराधिकारी की चर्चा तक भी शायद ही होगी।

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