Home उत्तराखंड Cricket उत्तराखंड::फिर मनमर्जियाँ हावी:डिप्टी AG-कोषाध्यक्ष-VP के विरोध दरकिनार:एजेंडा पास

Cricket उत्तराखंड::फिर मनमर्जियाँ हावी:डिप्टी AG-कोषाध्यक्ष-VP के विरोध दरकिनार:एजेंडा पास

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अध्यक्ष-सचिव की जुगलबंदी का विरोध:अग्रवाल-नेगी ने किया एपेक्स में निष्ठा-ज्ञानेन्द्र की मौजूदगी को गलत करार दिया 

नैनीताल में ऑफिस खोलने-कंपनी एक्ट में रजिस्ट्रेशन-SBI से खाता हटाने के फैसले का भी करारा विरोध

Chetan Gurung

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड में अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला-सचिव माहिम वर्मा की मनमानियों का सिलसिला और उनके तानाशाहीपूर्ण ढंग से लिए जा रहे फैसलों का कड़ा विरोध जारी है। एपेक्स काउंसिल की ताजा बैठक में भी ये सब कायम रहा। खास बात ये रही कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नियुक्त Accountant General के प्रतिनिधि डिप्टी AG योगेश अग्रवाल-उपाध्यक्ष संजय रावत और कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी के कठोर एतराजों को भी हवा में उड़ा के फैसले किए गए। बैठक में तीनों ने पूर्व खिलाड़ी निष्ठा फ़रासी और ज्ञानेन्द्र पांडे की एपेक्स काउंसिल में मौजूदगी को अवैध करार दिया।

होटल मधुबन में हुई बैठक में अध्यक्ष और सचिव ने एजेंडा के वे सभी बिन्दु पास करा लिए, जो वे चाहते थे। इसमें वे किसी भी तार्किक विरोध को मानने के लिए राजी नहीं हुए। एजेंडे से बाहर के तमाम बिन्दुओं पर भी फैसले किए। जिन पर खूब विरोध हुआ। एजेंडे में CaU को सोसायटी एक्ट से कंपनी एक्ट में रजिस्टर्ड कराने, नैनीताल में भी एसोसिएशन का एक दफ्तर खोलने और खाता SBI से अन्य बैंक में ले जाने का प्रस्ताव था। इस बात पर भी ऐतराज जताया गया कि अध्यक्ष-सचिव ने किसी भी प्रस्ताव के समर्थन में कोई भी कारण या तर्क पेश ही नहीं किया।

डिप्टी AG योगेश अग्रवाल-कोषाध्यक्ष नेगी और उपाध्यक्ष रावत ने तीनों विवादित प्रस्तावों पर ये कहते हुए एतराज किए कि आखिर इसकी जरूरत ही कहाँ आई है। अग्रवाल ने काफी तीखे मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड छोटा राज्य है। यहाँ दो दफ्तर क्यों चाहिए। कई बड़े और पुराने राज्यों में एक ही दफ्तर है। बैंक खाता बदलने और कंपनी एक्ट में जाने की जरूरत एक साल में ही क्यों पड़ गई। इसकी कोई बाध्यता और मजबूरी है नहीं। फिर क्यों ये कदम उठाए जाने की जरूरत दिखाई दे रही है।

खास पहलू ये है कि डिप्टी AG को सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ इसी लिए रखवाया है कि एसोसिएशन में किसी प्रकार का घपला-घोटाला आकार न ले सके। मनमाने ढंग से गैर जरूरी खर्चें न हों। इन पर अंकुश लगे। अग्रवाल ने एपेक्स काउंसिल में निष्ठा और ज्ञानेन्द्र की मौजूदगी पर ये कहते हुए आपत्ति की कि वे सरकारी कर्मचारी हैं। उनके पास अपने महकमे की NoC भी नहीं है। दोनों ही हितों के टकराव (Conflict of Interest) की मिसाल हैं। उनके इस आपत्ति पर कोषाध्यक्ष ने भी सहमति जताई। अध्यक्ष-सचिव इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं दे पाए। निष्ठा ने ये कह के अपना बचाव करने की कोशिश की कि उनको ICA ने मनोनीत किया है। अग्रवाल ने इस तर्क को खारिज किया।

अग्रवाल और बाकी एपेक्स सदस्यों ने अपने एतराजों पर जब कोई सहमति अध्यक्ष-सचिव की नहीं देखि तो कह दिया कि उनकी आपत्तियों को मिनट्स में शामिल किया जाए। बैठक में एसोसिएशन में रखे गए नए अध्यक्षों-कर्मचारियों की तनख्वाह की जानकारी भी पेश की गई। ये मुद्दा एक बार फिर अनौपचारिक तौर पर भी उठाया गया कि वेंडर्स के भुगतानों के चेकों पर कोषाध्यक्ष दस्तखत करें। अध्यक्ष ने इस बारे में कोषाध्यक्ष से कहा भी। नेगी ने कहा कि उनको भुगतानों पर कोई एतराज नहीं है। न भुगतानों से कभी इनकार ही किया है। उनके पास जितने भी भुगतान संबंधी फाइल वाउचर के साथ आएंगे, उन पर दस्तखत कर दिए जाएंगे। बिना वाउचर दस्तखत वह नहीं कर सकेंगे।

एपेक्स काउंसिल के एक सदस्य के मुताबिक बैठक में कई ऐसी समितियों के गठन का भी फैसला किया गया, जिसमें कोषाध्यक्ष को ही शामिल नहीं किया गया है। ये इसलिए अहम है कि उन समितियों में अध्यक्ष-सचिव शामिल हैं। साथ ही बड़े-बड़े (लाखों में) काम बिना टेंडर के करने के अधिकार भी दिए गए हैं। अध्यक्ष-सचिव ने इन समितियों में कोषाध्यक्ष की मौजूदगी को अनिवार्य नहीं माना। इस तरह के अध्यक्ष-सचिव के रुख से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। CaU में हाल ही में हुई नियुक्तियों पर भी जबर्दस्त अंगुली उठाई जा रही है।

आरोप लगाए जा रहे हैं कि मेलों और IPL में टैंट लगाने वालों को लाखों रुपए महीने की तनख्वाह पर बड़े ओहदे में नियुक्त किया गया है। अपने चेलों को ही मोटी तनख्वाहों पर नियुक्ति दी गई है। उपनल से उत्तराखंड तकनीकी विवि में नियुक्त कई लोगों को CaU में भी नौकरी दी गई है। वे दो-दो जगह से वेतन उठा रहे हैं। मुख्य प्रशिक्षक वासिम जाफर को 45 लाख रुपए सालाना में रखा गया है, लेकिन वह ज़्यादातर वक्त राज्य के लिए उपलब्ध ही नहीं हैं। उनकी नियुक्ति भी अवैध रूप से किए जाने के आरोप हैं।

जाफ़र को सचिव वर्मा ने खुद ही बिना किसी औपचारिकता के रख दिया। वर्मा कभी भी जिला स्तर पर भी क्रिकेटर नहीं रहे। इसलिए जाफ़र सरीखे बड़े खिलाड़ी का इंटरव्यू करने की काबिलियत वह रखते हैं, इसको ले के सवाल उठाए जा रहे हैं। नियुक्ति का अधिकार सिर्फ क्रिकेट एड्वाइजरी कमेटी को था। नियुक्ति के वक्त कमेटी का गठन ही नहीं हुआ था। नियुक्ति के बाद जब मामला उछला तब आनन-फानन कमेटी का गठन कर उसकी मंजूरी जाफ़र की बाबत ली गई।  

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