ऐसा भी संदेश मीडिया न दें-जो देवभूमि की सेवा में हैं, वे लायक नहीं

नितिन-स्वाति-सविन-धिराज का भी कलेक्टरी में डंका है पहाड़ों में  

Chetan Gurung

शानदार युवा नौकरशाह मंगेश घिल्डियाल की PMO पोस्टिंग अहम तो है लेकिन इस दौर में उनकी जरूरत उत्तराखंड को अधिक थी। ये वक्त मंगेश के लिए बड़े व अहम जिलों में कलेक्टरी के जरिये लोगों की सेवा करने और खुद को और बड़ा ब्रांड बनाने का है। देवभूमि के लिए नुक्सान ये है कि इतने प्रतिभावान और पहाड़ की पीड़ा ले के कार्य करने वाला नौकरशाह कम से कम चार साल के लिए तो हाथ से निकल गया।

रुद्रप्रयाग DM के तौर पर केदारनाथ पुनर्निर्माण प्रोजेक्ट में मंगेश के काबिले-तारीफ जज्बे और लगन के साथ काम करने को PM नरेंद्र मोदी देख-सराहते रहे हैं। ऐसे में उनका PMO में बुलाया जाना चौंकाता नहीं है। मोदी हर उस नौकरशाह को अपने पास बुलाना और बड़ी पोस्टिंग देने में यकीन रखते हैं, जो अपनी काबिलियत-प्रतिभा-मेहनत से उनको प्रभावित करते हैं। कुछ दिनों पहले ही उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे उत्पल कुमार सिंह को लोकसभा में सचिव बनाया जाना भी इसकी ही मिसाल है।

गुजरात के नौकरशाहों पर वह खास तौर से मेहरबान रहते हैं। मंगेश के कामकाज को PM करीब से देख-समझ चुके हैं। उनकी ही इच्छा से इस नौजवान नौकरशाह की देश के सबसे शक्तिशाली दफ्तर में तैनाती हुई है। मंगेश 2012 बैच के IAS हैं। रुद्रप्रयाग-टिहरी के DM के तौर पर वे प्रतिष्ठा को अपनी मेहनत से चार-चाँद लगा चुके हैं। PMO इतनी जल्दी जाना उनके लिए फायदे का सौदा शायद ही हो। Under Secretary के तौर पर उनके पास PMO में ऐसी हैसियत नहीं होगी कि वह उत्तराखंड या देश से जुड़े बड़े-नीतिगत मुद्दों पर अहम भूमिका निभा सके।

भारत सरकार में संयुक्त सचिव की भूमिका और हैसियत बहुत बड़ी व अहम होती है। उस स्तर पर प्रतिनियुक्ति खुद और काडर राज्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। मंगेश अभी सेवा के शुरुआती दौर से ही गुजर रहे हैं। ये वक्त किसी भी नौकरशाह के लिए अधिक से अधिक कलेक्टरी की पोस्टिंग अहम जिलों में हासिल कर के लोगों को सीधे फायदा पहुंचाने का होता है। फील्ड में उनकी अधिक जरूरत होती है। न कि नीति निर्धारक के कम अहम कुर्सी पर बैठने की।

मंगेश के पास उत्तराखंड में अभी चार बड़े मैदानी जिलों (नैनीताल-हरिद्वार-उधम सिंह नगर-देहरादून) और पहाड़ के बड़े जिलों (पौड़ी-अल्मोड़ा) की कलेक्टरी करने का मौका बचा हुआ था। मालूम नहीं कि वह उत्तराखंड कब लौटेंगे, लेकिन कम से कम पाँच साल तो शायद ही लगेंगे ही। तब तक उनके DM बनने और लोगों से सीधे जुड़ के कार्य करने का दौर खत्म हो चुका होगा। IAS का मतलब ही पूरी दुनिया कलेक्टरी मानती है। केंद्र सरकार में जाने से मंगेश के हाथों से ये पल निकल जाएंगे।

PMO का ये अनुभव भी भविष्य में उनको केंद्र सरकार में अहम पोस्टिंग (सचिव स्तर) में शायद बहुत मदद न करें। 26 साल की आयु में वह IAS बने। ऐसे में उनके पास कुल 34 साल की सेवा का मौका है। केंद्र में सचिव बनने के लिए 36-37 साल की सेवा आईएएस में होना फायदा देता है। वह दिल्ली से लौटेंगे तो सीधे कम से कम प्रभारी सचिव पर या फिर सचिव की कुर्सी इंतजार कर रही होगी। DM शिप का वक्त निकल चुका होगा। ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कलेक्टरी की कुर्सी ही थी, जिस पर कार्य करने के चलते मंगेश यकायक चारों ओर छा गए।

फिर उत्तराखंड जिस दौर से गुजर रहा है, उसको अभी मंगेश सरीखे नौकरशाहों की पूरी खेप चाहिए। वह भी चले गए। ये राज्य का नुक्सान है। एक पहलू और सामने आ रहा है। मंगेश की PMO में पोस्टिंग को लोग इस तरह पेश कर रहे हैं, जैसे बाकी कलेक्टर नाकारा या कम काबिल हैं। या उनकी प्रतिष्ठा-छवि अच्छी नहीं है। इससे उनके मनोबल-हौसले पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। उत्तराखंड में और भी कई कलेक्टर ऐसे हैं जो लंबे समय से पहाड़ों में हैं। अच्छी प्रतिष्ठा अपने काम-काज-व्यवहार से हासिल किए हुए हैं।

चमोली की स्वाति भदौरिया-उनके पति और अल्मोड़ा के नितिन भदौरिया, पौड़ी के धिराज गर्ब्याल, नैनीताल के सविन बंसल भी बतौर कलेक्टर बेहतरीन कार्य करने वालों में शुमार किए जाते हैं। उनकी भी प्रतिष्ठा निस्संदेह बहुत अच्छी है। भले उनकी ब्रांडिंग नहीं हो पा रही है। और भी कुछ कलेक्टर बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। हरिद्वार के रविशंकर और पिथौरागढ़ के विजय जोगदंड भी कम अच्छे नाम नहीं हैं। सो बहुत निराश होने की भी जरूरत नहीं है।

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