ACS मनीषा से जांच कराने पर अंगुली से CM ही निशाने पर!

जरूरी नहीं कि हर नौकरशाह जांच में दूसरे नौकरशाह को बख्श ही दें

Chetan Gurung

राज्यमंत्री रेखा आर्य और उनके ही महकमे से ताल्लुक रखने वाले नौकरशाह षणमुगम में जबर्दस्त Cold War ने ये दिखा दिया कि उत्तराखंड में अभी भी मंत्रियों-नौकरशाहों को ये नहीं मालूम कि सरकार का प्रमुख अंग होने की ज़िम्मेदारी का एहसास क्या होता है। उनका बेशर्मी की हद तक जा के नाग-नेवले की तरह भिड़ते रहना उनकी कम और सरकार की छिछालेदर अधिक कर रहा है। हालात इंगित कर रहे हैं कि दोनों को ही CM जिस भाषा-अंदाज में सबक सिखा सकते हैं, सिखाएँ। ऐसा न हो कि उनकी और सरकार की बे-इज्जती इस सीमा तक हो जाए कि फिर इज्जत वापसी का कोई दांव ही न बचा रह जाए।

बाल विकास के निदेशक और अपर सचिव षणमुगम ने बिना अपने मंत्री को बताए क्वेरेंटिन हो जाने का कदम उठाया। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने अपने सीनियर नौकरशाह को इसकी इत्तिला कर दी थी। फिर भी उनका ये फर्ज जरूर बनता था कि इसके सूचना (आधिकारिक-अनाधिकारिक) महकमे की राज्यमंत्री को जरूर देते। इसमें हर्ज भी कुछ नहीं। उन्होंने कार्मिक महकमे को भी क्वेरेंटिन में जाने के बारे में कोई सूचना नहीं दी।

`News Space’ ने कार्मिक विभाग के एक आला अफसर से बात की। उन्होंने इसकी पुष्टि की कि कार्मिक के पास अपर सचिव के छुट्टी जाने या फिर क्वेरेंटिन होने की कोई सूचना नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि कार्मिक महकमे को तब सूचित करना जरूरी होता है जब EL ली जाती है। CL के लिए इसकी जरूरत नहीं है। उनकी बात को सही माना भी जाए तो अपर सचिव को खुद के ड्यूटी से खुद को अलग करने और क्वेरेंटिन होने की जानकारी फिर भी मंत्री-कार्मिक को जरूर होनी चाहिए थी। ये कोई 1-2 दिनों की CL जैसा मसला नहीं था। बल्कि Covid-19 से जुड़े क्वेरेंटिन का मामला था।

षणमुगम ने अगर कायदों की अनदेखी की तो उनकी राज्यमंत्री ने खुद को अपरिपक्व-बचकानी हरकतों की रानी साबित कर दिया। उनका पुलिस में रिपोर्ट लिखा के अपने अपर सचिव को तलाश के पेश करने के फरमान सरीखे तहरीर में जिस जुबान का इस्तेमाल किया गया है, उसका फायदा सिर्फ आज की काँग्रेस सरीखी विपक्ष ही नहीं उठा पा रही। किसी मंत्री का ये कहना कि उनका अपर सचिव (वह भी RR वाला IAS) या तो भूमिगत (Under Ground) हो गया है या फिर अपहृत हो गया है, सीधे कानून-व्यवस्था पर निशाना है। CM के खिलाफ मोर्चा खोलना भी है। चाहे अनजाने में सही।  

दोनों आरोपों में एक भी सही होता तो त्रिवेन्द्र सरकार के लिए ये बेहद जिल्लत का मामला होता। ये तो गलत साबित हो गया कि अपर सचिव गायब है। वह घर में क्वेरेंटिन हैं। ये सरकार को आधिकारिक तौर पर मालूम चल चुका है। फिर भी सरकार की ज़लालत अवाम में जितनी हो सकती थी, मंत्री ने कर दी। माना जा रहा था कि इस मामले में BJP लीडरशिप और CM त्रिवेन्द्र सिंह रावत निस्संदेह रेखा से कुछ तो सफाई तलब करेंगे। उनसे शायद पूछा जाएगा कि ऐसी चिट्ठी, जो सरकार को ही घेर दे या फिर कानून-व्यवस्था को निशाने पर ले आए, को लिखने की वाहियात गलती आखिर कैसे कर डाली।

CM ने इस मामले की जांच ACS मनीषा पँवार को सौंप के रिपोर्ट तलब की है। रेखा ने इस पर भी वीडियो जारी कर सरकार और CM की मंशा को ही संदेह के घेरे में डाल दिया। रेखा ने शक जताया है कि क्या कोई नौकरशाह अन्य नौकरशाह के खिलाफ कोई जांच रिपोर्ट दे सकता है? उनका संदेह दुरुस्त भी हो सकता है, लेकिन उत्तराखंड के दो दशक का इतिहास ये भी साबित करता है कि नौकरशाह किसी जांच में अन्य फंसे नौकरशाह को मदद ही करता रहा हो, ऐसा नहीं है।

आज कल लोकपाल (बिजली के) और दो बार मुख्य सचिव रहे सुभाष कुमार को न भूलें। उन्होंने सिडकुल-पटवारी-दारोगा भर्ती घोटाले की प्रारम्भिक जांच की थी। अनेक बड़े नौकरशाहों को जांच में बुरी तरफ रगड़ के रखा। कई IAS अफसर उनकी जांच के नुकीले दांत के नीचे आए। अपने दौर के बेहद धाकड़ IAS विजेंद्र पाल ने कंप्यूटर खरीद घोटाले की जांच की थी। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक जांच रिपोर्ट में सचिव स्तर के IAS (RR वाले) को इस कदर दबोच लिया था कि फिर उस नौकरशाह को भारत सरकार में भी कभी बेहतर पोस्टिंग नहीं मिल पाई। उनका कैरियर एक किस्म से चौपट ही हो गया।

मौजूदा दौर में भी सचिव स्तर के दो IAS अफसर ऐसे हैं, जिनकी जांच रिपोर्ट IAS (RR वालों) अफसरों के ही खिलाफ रही। और भी तमाम मिसालें हैं। ऐसी कि IAS अफसरों ने जांच कर्ता IAS अफसरों से मिल के कोशिशें तक की कि उनकी गलती को माफ कर दिया जाए। फिर भी नतीजा बदलवा नहीं पाए। ऐसे में CM के आला नौकरशाह मनीषा को षणमुगम के अचानक-बिन बताए ड्यूटी से गायब होने और मंत्री के भी बर्ताव-हरकत से उत्पन्न हालात और पुलिस पत्र लेखन की जांच सौंपे जाने को एकदम से शक के दायरे में लाने को महज मंत्री की अपरिपक्वता कहा जा सकता है।

इस मामले में CM और CS ओमप्रकाश का भी खामोश मोड में चला जाना लोग समझ नहीं पा रहे। सियासी दुनिया के लोग ये कहने से नहीं चूक रहे कि विवादों का लिहाफ ओढ़ने की शौकीन रेखा को अब डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव तक टीम त्रिवेन्द्र में बनाए रखना सिर दर्द से अधिक साबित नहीं होने वाला। इस पर सभी की निगाह गड़ी है कि क्या त्रिवेन्द्र अपनी टीम की महिला मंत्री को फारिग कर सकते हैं? या फिर उनकी हरकतों को बर्दाश्त करते रहेंगे।

ये भी कहा जा रहा है कि आखिर षणमुगम को भी इतनी आजादी और छूट क्यों दी जा रही? वह मौजूदा हालात को देखने के बावजूद अपने खोल से बाहर नहीं आ रहे। सवाल है कि क्यों वह मंत्री से बात कर सूरतेहाल को सामान्य में बदलने की कोशिश कर रहे। उन्होंने बेशक खुद को क्वेरेंटिन किया हुआ है। इसके बावजूद ये सवाल तो लाजिमी है कि नौकरशाहों को ये बताने की ज़िम्मेदारी कार्मिक महकमे और CS की क्यों नहीं कि वह आखिर किस तरह के प्रोटोकॉल का पालन ऐसे मामले में करेंगे।

त्रिवेन्द्र इस बेहद संवेदनशील हो चुके विवाद को किस तरह सुलटाते हैं, उस पर भी सभी निगाहें टिकी हैं। उनको दोनों बातें ध्यान में रखनी होंगी। 1-ये देखना अहम होगा कि उनके फैसले-कदम से ये आरोप न लग जाए कि वह मंत्रियों की उद्दंडता-अपरिपक्वता या हास्यास्पद कदमों को देखते हुए भी आँखें मूँद रहे। इससे अवाम में खराब-नेगेटिव संदेश जाएगा। 2-कहीं ये संदेश न चला जाए कि सरकार वाकई नौकरशाह चला रहे हैं। ये आरोप लगातार त्रिवेन्द्र सरकार पर भी चिपकते रहे हैं। CM को ये भी देखना होगा कि सरकार के फैसले या जांच रिपोर्ट के चलते नौकरशाही ही नाराज न हो जाए। ये बात दीगर है कि नौकरशाही कम से कम 5 धड़ों में विभाजित है।

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