उत्तराखंड राज्य का तोहफा देने के बावजूद हर चुनाव में सत्ता से बाहर हुई है पार्टी

मौजूदा बलबीर रोड HQ चोरी-बदनामी के अपशगुन संग आया था अस्तित्व में

Ring रोड पर नए भवन का शिलान्यास:उत्तराखंड स्थापत्य शैली अपनाई जाएगी

Chetan Gurung

उत्तराखंड राज्य देने के बावजूद BJP पहला ही विधानसभा चुनाव हार गई। हकीकत ये है कि दो दशक के सियासी इतिहास में एक बार भी वह अपनी सरकार बचा नहीं पाई। भले काँग्रेस टूटी-फूटी-हताश-पस्त दिखी हो। शनिवार को पार्टी ने रिंग रोड पर नए प्रदेश मुख्यालय भवन की बुनियाद रखी। बलबीर रोड पर स्थित मौजूदा उस मुख्यालय को BJP छोड़ रही, जो अस्तित्व में आने से पहले ही चोरी की बदनामी-अपशगुन ले के आया था। BJP उम्मीद कर रही कि नया मुख्यालय मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अगुवाई में नई तकदीर और सियासत बदलने का दौर भी लाएगा!

रिंग रोड पर नए प्रदेश बीजेपी मुख्यालय के भूमि पूजन-शिलान्यास के दौरान CM त्रिवेन्द्र सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत।

राज्य गठन से पहले BJP का उत्तरांचल प्रदेश (तब यही नाम था) मुख्यालय राजपुर रोड पर था। KFC (सचिवालय के करीब वाला) की बगल से जो रास्ता भीतर जाता है, वहाँ हुआ करता था। बलबीर रोड पर मुख्यालय के लिए मौजूदा घर खरीदने की प्रक्रिया पूरी हुई भी नहीं थी और अचानक एक दिन पता चला कि 27 लाख रुपए मुख्यालय से चोरी हो गए। पुलिस जांच रिपोर्ट का तो पता चला नहीं लेकिन पार्टी की आंतरिक जान समिति की रिपोर्ट ने साफ कर दिया था कि चोर बाहरी नहीं थे। घर के ही थे।

ये मामला लंबा चला। बीजेपी 2002 का पहला ही विधानसभा चुनाव अप्रत्याशित रूप से हार गई। उस काँग्रेस से जो पूरी तरह ना-उम्मीद थी। आखिर BJP ने उत्तरांचल प्रदेश दिया था। पहला चुनाव जीतना बीजेपी का हक बनता है। तब ये कहा जाता था। यानि, मौजूदा मुख्यालय पहले तो चोरी का शिकार हुआ। फिर इसमें बीजेपी के ही ओहदेदारों के नाम उछलने लगे। सूत्रों के मुताबिक जब बीजेपी ने चोरी के खुलासे की मांग उस वक्त सीएम हो चुके एनडी तिवारी से की थी तो उन्होंने हौले से कान में फूँक दिया था कि घर की बात घर में ही रहने दें। बीजेपी समझ गई। फिर खामोश हो गई।

काँग्रेस सरकार को 2007 में घोटालों-भ्रष्टाचार-आपसी सिर फुटव्वल के चलते विधानसभा चुनाव हार के बाहर होना ही था। हो गई। बीजेपी आई लेकिन फिर तमाम भीषण संकटों का साया बेताल की तरह उसके सिर चढ़ा रहा। बीसी खंडूड़ी चैन से एक पल भी सीएम नहीं रह पाए। फिर बीच में हटा दिए गए। उससे पहले 2009 में लोकसभा चुनाव में बीजेपी पांचों सीट हार गई। उनकी जगह डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक तख्ते ताऊस पर बैठे। उनको क्या किसी को भनक तक नहीं लगी और वह 2011 में अगले विधानसभा चुनाव से ऐन 6 महीने पहले बेहद हैरान करने वाले अंदाज में हटा दिए गए। खंडूड़ी की फिर वापसी हुई।

जिस शख्स के नाम पर चुनाव लड़ा गया। यानि खंडूड़ी है जरूरी नारा जिस पर बना। कोई यकीन न करें लेकिन वह बीसीके हार गए। बीजेपी सिर्फ उनकी सीट गँवाने के कारण सत्ता बचा नहीं पाई। 2012 के विधानसभा चुनाव में शायद किसी ने गौर नहीं किया। सच्चाई तो ये है कि खंडूड़ी अपनी सीट निकाल लेते तो काँग्रेस सत्ता से बाहर ही रहती। विजय बहुगुणा-हरीश रावत सीएम न बनते। इतने अपशगुनों के बाद कोई भी पार्टी शायद अपना मुख्यालय जरूर और जल्दी बदलती। अगर इस तरफ ध्यान जाता।

अभी तो पार्टी की नीति अपना निजी भवन बना के उस पर कार्यालय चलाने की है। दिल्ली में 5 सितारा किस्म की सुविधाओं वाला राष्ट्रीय मुख्यालय है। नया प्रदेश मुख्यालय एक साल में बन के तैयार हो जाएगा। पहाड़ी स्थापत्य शैली के भवन और मुख्यालय का निर्माण यानि अगले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तैयार होगा। मतलब-नया चुनाव-नया मुख्यालय। बीजेपी जरूर ये उम्मीद बांधे होगी कि त्रिवेन्द्र की अगुवाई में वह चुनावी समर फतह कर तकदीर भी नई लिखेगी। ऐसा होता है तो ये बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। जातीय तौर पर त्रिवेन्द्र का कद बीजेपी में ही नहीं उत्तराखंड में भी बहुत ऊंचा हो जाएगा।

पार्टी में मौजूद उनके विरोधियों के लिए भी फिर उनको डिगा पाना आसान नहीं रह जाएगा। खास बात ये है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में गोता काँग्रेस ने भी खाया है, लेकिन उसकी शिकस्त एकदम प्रत्याशित रही। जब-जब वह सरकार में रही, ये साफ दिखता रहा कि किस्मत लिखने वालों ने उसके लिए शिकस्त मोटे-मोटे हर्फों में लिख डाली है। जो पहले ही सभी पढ़ सकते थे। दूसरी तरफ बीजेपी की 2002 और 2012 की हार के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था।

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