हरीश रावत की सरकार गिरा दी लेकिन बदले में सिर्फ बेटे को विधायकी का टिकट मिला

दावेदारों में श्याम जाजू-विजयवर्गीय-नरेश-पासी-गोयल भी:बाहरी पर दांव जोखिम का सौदा

विस चुनाव के चलते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र की राय भी बहुत अहम

Chetan Gurung

राज्य सभा चुनाव को ले के बीजेपी में जबर्दस्त सरगर्मी का आलम है। जिसको टिकट मिलेगा, उसका राज्य सभा पहुंचना सौ फीसदी तय है। लिहाजा दावेदारों में जंग सिर्फ टिकट हासिल करने की है। इसके लिए वे सभी जंगजू बने हुए हैं। ये सवाल बहुत मौजूं बन जाता है कि विजय बहुगुणा को राज्यसभा भेज के बीजेपी उनका लंबित कर्ज चुकाएगी या अब भी उनको टरकाया जाएगा। ये बहुगुणा ही थे, जिन्होंने पिछली काँग्रेस सरकार गिरा के तब के सीएम हरीश रावत का हौसला-आत्म विश्वास बुरी तरह मथ डाला था। उस एपिसोड के बाद बहुगुणा को बीजेपी ने लगता है भुला सा दिया है।

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बीजेपी ने बहुगुणा के लिए बाद में कुछ नहीं किया। सिवाय बेटे सौरभ को विधायकी का टिकट देने के। एक जमी-जमाई विरोधी पार्टी की सरकार को तहस-नहस कर डालने और बेहद चतुर किस्म के मुख्यमंत्री हरीश रावत को सकपका-भरभरा देने वाले पूर्व मुख्यमंत्री के साथ बीजेपी का ऐसा उपेक्षाभरा बर्ताव किसी की समझ से बाहर नजर आ रहा है। पहले तो ये माना जा रहा था कि उनको इस महान बीजेपी सेवा की एवज में बहुत बड़ा पारितोषिक मिलेगा।

नरेश बंसल

सरगोशियाँ तो ये थी कि वीबी को किसी राज्य में बतौर राज्यपाल भेजा जा सकता है। उनके बेटे को मंत्रिपरिषद में जगह दी जा सकती है। ऐसा कुछ नहीं हुआ। सौरभ चुनाव जीते तो इसके पीछे बहुगुणा खानदान की मेहनत का बहुत हाथ था। सौरभ मंत्री भी नहीं बने। उनके पिता खामोशी अपना के सियासी तस्वीर से कहीं दूर ओझल किस्म के हो गए हैं। एक शख्स जो अपने साथ सत्ताधारी पार्टी के 9 विधायकों का जबर्दस्त मारक दस्ता ले के आया हो, उसके साथ कोई भी पार्टी ऐसा रुख अपना सकती है, यकीन नहीं होता।

बलराज पासी

अंदरखाने की सुगबुगाहट के मुताबिक मुमकिन है इस बार बहुगुणा के लिए बीजेपी आला कमान कुछ खास सोचे बैठी हो। क्या मालूम कि इस बार उनको उत्तराखंड से राज्यसभा भेज ही दें। अगर कहीं राज्यपाल नहीं बनाए जा रहे हैं तो संसद के उच्च सदन में बहुगुणा को कुर्सी दिया जाना कोई बड़ा सौदा नहीं है। नाम तो श्याम जाजू और कैलाश विजयवर्गीय के भी उछल रहे। काँग्रेस ने राज बब्बर को टिकट दिया था तो बीजेपी ने उनको बाहरी बता के खूब गरियाया था। अब खुद की बारी आने पर जाजू-विजयवर्गीय को टिकट दे के बीजेपी किसी को ये बोलने का मौका शायद न दें कि गैर उत्तराखंडी को राज्यसभा भेजने की क्या मजबूरी बीजेपी आला कमान के सामने थी।

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एक बात और। जाजू के पास फिलहाल बीजेपी में कोई ज़िम्मेदारी नहीं हैं। इसका मतलब पीएम नरेंद्र मोदी-शक्तिशाली गृह मंत्री अमित शाह-पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और संघ की गुड बुक्स में वह नहीं हैं। ऐसे में उनकी कुर्सी राज्यसभा में आखिर किस गणित से लगाई जा सकती है, इस गुत्थी को कोई नहीं सुलझा पा रहा। संभावना तो ये ही है कि किसी उत्तराखंडी को ही राज्यसभा भेजा जाएगा। अगर बहुगुणा नहीं तो फिर कौन? जो अन्य नाम राज्य के हैं, उनमें बहुगुणा के अलावा बाकी नामों में नरेश बंसल-बलराज पासी-अनिल गोयल हैं।

कद और उपलब्धियों को मानक बनाया जाता है तो इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो बहुगुणा के आसपास भी टिकते हों। गोयल से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू ये है कि जब भी बीजेपी की शिकस्त राज्यसभा में सुनिश्चित दिखी, उनको ही चुनावी समर भूमि में पराजय का वरण करने के लिए आगे किया गया। अब जबकि सीट सोने की तश्तरी में सजी है, तो उनके नाम पर खुद पार्टी गंभीर नहीं दिख रही। बंसल दो बार के प्रदेश महामंत्री (संगठन) हैं। फिर भी उनको टिकट मिलना अजूबा ही होगा। वैसे दिल्ली की दौड़ धूप उनकी पूरी चल रही है। किसी जमाने में एनडी तिवारी जैसे दिग्गज को लोकसभा चुनाव में पटखनी दे के जबर्दस्त सुर्खियां लूटने वाले बलराज भी टिकट के दौड़ में बहुत आगे नहीं दिख रहे हैं।

उत्तराखंड सियासत में शायद उनका दौर अब गुजर चुका है। भले वह कोशिशों से पीछे न हटने वालों में से हैं। इतना तय है कि टिकट देते समय मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र की राय को बहुत तवज्जो मिलेगी। विधानसभा चुनाव के लिए डेढ़ साल ही रह गए हैं। इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि अच्छे-बुरे चुनावी नतीजों के लिए त्रिवेन्द्र ही जिम्मेदार होंगे। आला कमान कभी नहीं चाहेगा कि चुनाव नतीजे उम्मीदों के मुताबिक नहीं आते हैं तो मुख्यमंत्री के पास बचाव का एक भी बहाना हो। जब तमाम फैसले सीएम की इच्छा से हो रहे हों तो फिर राज्यसभा सीट के लिए ही उनकी राय को शायद ही नजरअंदाज किया जाए।

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