बहुगुणा-गोयल में सिमट रहा फैसला!बिहार चुनाव के चलते प्रत्याशी के ऐलान में देरी

Chetan Gurung

एक तरफ आड़े वक्त पर BJP के काम आए पूर्व सीएम विजय बहुगुणा तो दूसरी तरफ तय शिकस्त दिखाई देने के बावजूद बार-बार शहादत देने को आगे आने वाले अनिल गोयल। राज्यसभा चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी का टिकट की जंग लगता है इन दो नामों में सिमटती जा रही। प्रत्याशी के ऐलान में देरी के लिए बिहार चुनाव में आला नेताओं के व्यस्त रहने को जिम्मेदार समझा जा रहा है। बीजेपी टिकट देते समय ये भी जरूर देखेगी कि भविष्य में उसको किसी दल की मदद की दरकार सरकार बनाने में होती है तो उस पर कम से कम अहसान फरामोश होने का ठप्पा न लगा हो।

बतौर टिकट दावेदार बलराज पासी-नरेश बंसल और महेंद्र पांडे के भी नाम उछाले जा रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय सचिव पांडे के बारे में माना जा रहा है कि वह टिकट के लिए कतई उत्सुक नहीं हैं। भले उनका नाम उछाला जा रहा हो। वह मूल रूप से अल्मोड़ा के हैं। कर्मभूमि हिमाचल रही है। पासी-बंसल पर पार्टी आला कमान वाकई बहुत गंभीर है, ऐसा पार्टी के जिम्मेदार लोग ही नकार रहे हैं। बंसल हालांकि जम के कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह टिकट हासिल हो जाए।

Anil Goyal

टिकट ही असली मामला है। फतह तो स्वर्ण तश्तरी में सजा के रखी हुई है। असल में जिन दो नामों को ले के गंभीरता झलक रही है, उनमें बहुगुणा और गोयल ही शुमार नजर आते हैं। पहले बात बहुगुणा की की जाए। बहुगुणा ने काँग्रेस छोड़ के बीजेपी जॉइन किया था। काँग्रेस की हरीश रावत सरकार को एक बार के लिए तो बहुगुणा ने मटियामेट कर ही दिया था। उत्तराखंड में भविष्य की सियासत के बारे में अभी से अंदाज लगा पाना किसी के बूते का नहीं दिख रहा। ये फर्ज कर लिया जाए कि डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव में किसी भी वजह से विखंडित जनादेश आता है तो बीजेपी किस मुख से गैर बीजेपी विधायकों से समर्थन मांग सकेगी!

सियासत का कुछ कहा नहीं जा सकता है। ऐसे में बीजेपी को अन्य पार्टी के विधायकों या निर्दलियों के समर्थन की दरकार हुई तो उसके पास उनका विश्वास जीतने के लिए कोई तो बड़ी वजह होनी चाहिए। बहुगुणा हो या फिर पूर्व में काँग्रेस-विधायकी छोड़ के आए तेजपाल सिंह रावत। या फिर आज के मंत्री यशपाल आर्य-डॉ. हरक सिंह रावत-सुबोध उनियाल-सतपाल महाराज-रेखा आर्य। किसी की भी हैसियत वैसी तो कहीं से नहीं है, जैसी काँग्रेस में रहने के दौरान उनकी हुआ करती थी। बीजेपी में आने के बाद मंत्री बनने के बावजूद उनका रसूख-कद गिरा है।

उनियाल काँग्रेस राज में बहुगुणा के सीएम रहने के दौरान उनके सबसे करीबी थे। विधायक तक नहीं थे। फिर भी उनकी डुगडुगी पर अच्छे-अच्छे नौकरशाह-मंत्री नृत्य करने को राजी हो जाया करते थे। बहुगुणा के हाथ तो सिवाय बेटे सौरभ को विधायकी के टिकट के कुछ नहीं लगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में जरूरत पड़ने पर अन्य पार्टी विधायकों को फुसलाने और लालच दे के सरकार बनाने की कोशिश बीजेपी को करनी पड़ी, तो ये नजीरें उसके खिलाफ जा सकती हैं। बहुगुणा को राज्यसभा टिकट से भी दरकिनार करना भारी साबित हो सकता है। ये समझा जाएगा कि बीजेपी इस्तेमाल करो और फेंक दो की नीति अपनाती है। ऐसे में भविष्य में कठिन-चुनौतीपूर्ण हालात सामने आने पर उसके साथ कोई भी खड़ा होना पसंद नहीं करेगा।

पार्टी नेतृत्व को ये भी अंदेशा है कि गोयल को टिकट न देने से कहीं गलत ध्वनि न पैदा हो जाए। ऐसा न हो कि इसके चलते पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष उत्पन्न हो। इसको पार्टी निष्ठा-सेवा के साथ खिलवाड़ के तौर पर भी ले लिया जा सकता है। उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी के खामोशी संग प्रवेश और उसको ले के लोगों में गंभीरता दिखने के दौर में ये ठीक न होगा। आने वाले सालों में `आप’ दिल्ली की तर्ज पर अपने पाँव उत्तराखंड में सुनियोजित ढंग से पसार सकता है या फिर डैने फैला लेता है तो किसी को हैरानी नहीं होगी।

ये भी पार्टी को याद रखना ही पड़ेगा कि अनिल ने साल 2012 और 2016 का राज्यसभा चुनाव पूरे जोश से लड़ा था। तब काँग्रेस की जीत तय थी। पहली बार महेंद्र सिंह माहरा और दूसरी बार प्रदीप टम्टा को काँग्रेस ने राज्यसभा भेजा था। पार्टी के आदेश पर गोयल ने चुनाव लड़ने के आदेश को शिरोधार्य करना पसंद किया था। उनकी शहादत को पुरस्कार से नवाजने का भी वक्त आ गया है। ऐसा पार्टी के ही लोग भी कहने से नहीं हिचक रहे।  

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